Devi Chitralekha Ji: संवाद के दौरान देवी चित्रलेखा ने कहा कि अध्यात्म का अर्थ केवल मंदिर जाना, पूजा-अर्चना करना या धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। उनके अनुसार अध्यात्म व्यक्ति के विचारों, संस्कारों और जीवन जीने की दिशा से जुड़ा हुआ विषय है।
Devi Chitralekha Ji: देहरादून में आयोजित 'अमर उजाला संवाद 2026' के मंच पर अध्यात्म, संस्कृति और जीवन के वास्तविक उद्देश्य को लेकर प्रसिद्ध कथावाचिका एवं आध्यात्मिक वक्ता देवी चित्रलेखा ने अपने विचार साझा किए। 'सतत विकास' की थीम पर आयोजित इस विशेष कार्यक्रम में उन्होंने जीवन की सफलता और सार्थकता के बीच के अंतर को सरल उदाहरणों के माध्यम से समझाया और कहा कि केवल उपलब्धियां हासिल करना ही जीवन का लक्ष्य नहीं होना चाहिए, बल्कि जीवन को अर्थपूर्ण बनाना भी उतना ही आवश्यक है। कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए देवी चित्रलेखा ने सभी उपस्थित लोगों का अभिवादन "सुप्रभात देवभूमि" कहकर किया। इसके बाद उन्होंने धर्म, संस्कृति और मानवीय मूल्यों पर विस्तार से चर्चा की।
अध्यात्म केवल पूजा-पाठ नहीं, जीवन जीने की कला है
संवाद के दौरान देवी चित्रलेखा ने कहा कि अध्यात्म का अर्थ केवल मंदिर जाना, पूजा-अर्चना करना या धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। उनके अनुसार अध्यात्म व्यक्ति के विचारों, संस्कारों और जीवन जीने की दिशा से जुड़ा हुआ विषय है। उन्होंने कहा, "मनुष्य के जीवन में अध्यात्म का अर्थ केवल पूजा-अर्चना नहीं, बल्कि अच्छे संस्कार, सही विचार और जीवन को सही दिशा देने की प्रेरणा भी है।" अपने विचारों को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने जीवन को दो भागों में विभाजित करते हुए कहा, "हमारा जीवन दो तरह का है। एक है सफल जीवन और एक है सार्थक जीवन।"
सफलता जरूरी है, लेकिन सार्थकता उससे भी अधिक महत्वपूर्ण
देवी चित्रलेखा ने कहा कि वर्तमान समय में सफलता की परिभाषा लगातार बदल रही है। आज लोग प्रसिद्धि, धन, पद और सोशल मीडिया पर मिलने वाली लोकप्रियता को सफलता का पैमाना मानने लगे हैं। सफलता प्राप्त करना गलत नहीं है, लेकिन जीवन की वास्तविक उपलब्धि सार्थकता में छिपी होती है।
उन्होंने कहा, "इस दुनिया में सफल होने की सबकी अलग-अलग परिभाषा है। मुझे लगता है कि सफल जीवन जरूरी है, लेकिन सफल जीवन से ज्यादा जरूरी सार्थक जीवन होता है। सफल होना आवश्यक है, लेकिन उससे कहीं अधिक जरूरी जीवन को सार्थक बनाना है।" उन्होंने कहा कि आज लोग सोशल मीडिया पर बढ़ते फॉलोअर्स और लोकप्रियता को उपलब्धि मान लेते हैं, जबकि जीवन का वास्तविक मूल्य इससे कहीं आगे है।
भगवान ने जीवन एक उद्देश्य के लिए दिया है
अपने संबोधन में देवी चित्रलेखा ने कहा कि मानव जीवन ईश्वर की अमूल्य देन है और इसे व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए। उन्होंने कहा कि भगवान ने प्रत्येक व्यक्ति को किसी विशेष उद्देश्य के साथ इस संसार में भेजा है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे विद्यालय में अवकाश के समय विद्यार्थियों को कुछ कार्य दिए जाते हैं। कुछ विद्यार्थी उन्हें समय पर पूरा कर आगे बढ़ जाते हैं, जबकि कुछ लोग लापरवाही के कारण पीछे रह जाते हैं। ठीक इसी प्रकार मनुष्य को भी जीवन रूपी अवसर मिला है, जिसका सदुपयोग करना आवश्यक है। उन्होंने कहा, "भगवान ने हमें यह अनमोल मानव जीवन किसी उद्देश्य के लिए दिया है। जिस व्यक्ति का जीवन सार्थक होता है, उसके भीतर आनंद स्वतः दिखाई देता है।"
ईश्वर मनुष्य से पूछेंगे दो महत्वपूर्ण प्रश्न
देवी चित्रलेखा ने जीवन के अंतिम सत्य को समझाते हुए कहा कि जब मनुष्य इस संसार से विदा होकर ईश्वर के समक्ष पहुंचेगा, तब भगवान उससे दो महत्वपूर्ण प्रश्न करेंगे। उन्होंने कहा, "जब मनुष्य इस संसार को छोड़कर ईश्वर के पास जाएगा, तब भगवान उससे दो महत्वपूर्ण प्रश्न करेंगे। पहला प्रश्न होगा, मैंने तुम्हें इतना अनमोल जीवन दिया, क्या तुमने इसे आनंद के साथ जिया?"
उन्होंने आगे कहा कि यदि व्यक्ति ने जीवन को आनंदपूर्वक जिया होगा, तभी उसका जीवन सार्थक माना जाएगा। इसके बाद उन्होंने भगवान के दूसरे प्रश्न का उल्लेख करते हुए कहा, "जो आनंद तुम्हें मिला, क्या तुमने उसे दूसरों के साथ बांटा?" देवी चित्रलेखा ने कहा कि यदि इन दोनों प्रश्नों का उत्तर सकारात्मक होगा, तभी ईश्वर को लगेगा कि मनुष्य ने अपने जीवन का सही उपयोग किया है।
गंगा दशहरा पर दिया विशेष संदेश
कार्यक्रम के दौरान देवी चित्रलेखा ने सभी लोगों को गंगा दशहरा की शुभकामनाएं भी दीं। इस अवसर पर उन्होंने जीवन को केवल उपलब्धियों तक सीमित न रखने की बात कही। उन्होंने कहा, "हमें अपने जीवन को केवल सफल नहीं, बल्कि सार्थक बनाने का प्रयास करना चाहिए।" साथ ही उन्होंने भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत पर गर्व व्यक्त करते हुए कहा, "मनुष्य जैसा जन्म, भारत जैसा देश और सनातन जैसा धर्म मिलना अपने आप में बहुत बड़ा सौभाग्य है। इससे अधिक भाग्यशाली स्थिति और कुछ नहीं हो सकती।"
सबसे बड़ी पूंजी है मानव जीवन
देवी चित्रलेखा ने कहा कि मनुष्य अक्सर धन को अपनी सबसे बड़ी संपत्ति मानता है, जबकि वास्तव में सबसे बड़ी पूंजी उसका शरीर और उसका जीवन है। उन्होंने कहा कि आज के दौर में लोग धन कमाने की दौड़ में इतने व्यस्त हो गए हैं कि परिवार और रिश्तों के लिए समय ही नहीं बचा पाते। कई बार व्यक्ति पूरी जिंदगी आर्थिक सफलता के पीछे भागता रहता है और जब उसके पास समय आता है, तब तक जीवन के कई महत्वपूर्ण पल उससे दूर जा चुके होते हैं। उन्होंने कहा कि कई माता-पिता बच्चों के लिए मेहनत करते हुए उनके साथ समय नहीं बिता पाते और जब समय मिलता है, तब तक बच्चे अपनी अलग जिम्मेदारियों और जीवन की दौड़ में आगे बढ़ चुके होते हैं।
समाज के प्रति कर्तव्यों को समझना भी जरूरी
अपने संबोधन में देवी चित्रलेखा ने कहा कि धन कमाना आवश्यक है, लेकिन केवल अपने लिए जीना पर्याप्त नहीं है। समाज ने हमें जो कुछ दिया है, उसके प्रति हमारी जिम्मेदारियां भी हैं। उन्होंने कहा, "कमाई करना जरूरी है, लेकिन हमें यह भी समझना चाहिए कि समाज से जो कुछ हमें मिला है, उसके प्रति अपने कर्तव्यों को निभाना भी उतना ही आवश्यक है।" उन्होंने बताया कि जीवन की हर चीज को धन से नहीं तौला जा सकता। इस संसार में दान के अनेक स्वरूप हैं, जिनमें कन्यादान, अन्नदान, रक्तदान और सेवा विशेष महत्व रखते हैं।
रोजाना करना चाहिए रक्तदान
रक्तदान के विषय पर चर्चा करते हुए देवी चित्रलेखा ने इसका व्यापक अर्थ समझाया। उन्होंने कहा कि रक्तदान केवल किसी अस्पताल में रक्त देने तक सीमित नहीं है। उन्होंने कहा, "रक्तदान केवल शरीर से दिया जाने वाला दान ही नहीं होता, बल्कि दूसरों के जीवन में खुशी और उत्साह भरना भी एक तरह का रक्तदान है।"
उन्होंने एक महापुरुष की वाणी का उल्लेख करते हुए कहा कि जब व्यक्ति प्रसन्न रहता है तो उसके शरीर में रक्त का संचार बेहतर होता है. इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन ऐसा कोई कार्य अवश्य करना चाहिए, जिससे किसी दूसरे के चेहरे पर मुस्कान आए। उनके अनुसार किसी को खुशी देना, निराश व्यक्ति को उत्साहित करना और किसी दुखी व्यक्ति के जीवन में आशा का संचार करना भी सेवा का महत्वपूर्ण रूप है।
बांटना ही मनुष्य का सबसे बड़ा गुण
संवाद के अंतिम चरण में देवी चित्रलेखा ने साझा करने की भावना को मानव जीवन का सबसे महत्वपूर्ण गुण बताया। उन्होंने कहा कि व्यक्ति जीवन के अधिकांश गुण समाज और परिवार से सीखता है, लेकिन दूसरों की सहायता करना और खुशियां बांटना ऐसा गुण है जिसे स्वयं अपनाना पड़ता है। उन्होंने कहा, "मनुष्य अपने जीवन के अधिकांश गुण दूसरों से सीखता है, लेकिन एक गुण ऐसा है जो व्यक्ति को स्वयं अपनाना होता है और वह है दूसरों की सहायता करना तथा अपने हिस्से की खुशियां बांटना।"
उन्होंने आगे कहा कि जीवन की असली सुंदरता इसी में है कि व्यक्ति अपनी अच्छाइयों और खुशियों को दूसरों के साथ साझा करे। इस संदर्भ में उन्होंने गंगा और यमुना का उदाहरण देते हुए कहा कि ये नदियां इसलिए पूजनीय हैं, क्योंकि वे बिना किसी भेदभाव के निरंतर सबको देती रहती हैं। उनका स्वभाव केवल बांटना है और इसी कारण उन्हें सम्मान और श्रद्धा प्राप्त होती है। देवी चित्रलेखा ने कहा कि जो व्यक्ति बांटना जानता है, वही वास्तव में मधुर स्वभाव वाला होता है और समाज में सबसे अधिक सम्मान भी उसी को प्राप्त होता है।