Mysterious Kali Temple in Kalsi: उत्तराखंड की वादियों में बह रही ठंडी हवाएं जब दिल और आत्मा को सुकून देती हैं, तो वहां के पहाड़ों और घाटियों में छिपे आध्यात्मिक रहस्य और भी ज्यादा आकर्षित करते हैं।
Mysterious Kali Temple in Kalsi: उत्तराखंड की वादियों में बह रही ठंडी हवाएं जब दिल और आत्मा को सुकून देती हैं, तो वहां के पहाड़ों और घाटियों में छिपे आध्यात्मिक रहस्य और भी ज्यादा आकर्षित करते हैं। इन्हीं रहस्यों में से एक है देहरादून के जौनसार-बावर क्षेत्र का कालसी, जहां प्रकृति की खूबसूरती के बीच मां काली का बेहद प्राचीन मंदिर स्थित है।
चकराता रोड पर बहने वाली अमलावा नदी के तट पर स्थित यह मंदिर न सिर्फ धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि इतिहास और पौराणिक कथाओं से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। इस मंदिर का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा हुआ माना जाता है। आइए, जानते हैं इससे जुड़े कुछ रोचक रहस्य।
पांडवों ने की पूजा, प्रकट हुईं मां काली
चकराता रोड पर स्थित मां काली का यह मंदिर अद्भुत और चमत्कारी शक्तियों से जुड़ा हुआ है। ऐसा माना जाता है कि महाभारत काल में अपने अज्ञातवास के दौरान पांचों पांडव यहां पहुंचे थे। पौराणिक कथाओं के अनुसार उन्होंने अपने अज्ञातवास के दौरान कुछ समय राजा विराट की नगरी विराटनगर में बिताया था।
मान्यता है कि उस दौरान पांचों भाई कुछ पलों के लिए इस स्थान पर भी आए थे। विपरीत परिस्थितियों और कठिन रास्तों के चलते पांडवों ने अपनी कुलदेवी मां काली की आराधना की थी। कहा जाता है कि मां काली उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर प्रकट हुई थीं।
द्वापर युग में पांडव एक गुफा में रहते थे
दर्शन देते हुए मां काली ने पांडवों को आशीर्वाद दिया था कि वे हर परिस्थिति में विजयी होंगे। खास बात यह है कि उस समय पांडवों को यह भी नहीं पता था कि भविष्य में उन्हें महाभारत जैसे युद्ध का सामना करना पड़ेगा।
मंदिर के मुख्य पुजारी भारत भूषण शर्मा के अनुसार उस समय मंदिर के पास एक गुफा थी, जो अब पूरी तरह से बंद हो चुकी है। माना जाता है कि पांडवों ने कुछ दिनों तक उसी गुफा में विश्राम किया था। इसका प्रमाण पुराणों और लोककथाओं में मिलता है। मुख्य पुजारी के अनुसार आज भी मंदिर परिसर में गुफा का मुख्य द्वार दिखाई देता है, जो इस किवदंती की सत्यता की ओर इशारा करता है।
यहां का चमत्कारी पेड़ पूरी करता है मनोकामनाएं
मंदिर परिसर में एक चमत्कारी पेड़ भी है, जिसके प्रति भक्तों की गहरी आस्था है। मान्यता है कि अगर कोई भक्त इस पेड़ पर धागा या चुनरी बांधकर मनोकामना करता है तो उसकी मनोकामना अवश्य पूरी होती है। मनोकामना पूरी होने पर भक्त प्रसाद चढ़ाकर मां काली को धन्यवाद देते हैं।
माना जाता है कि यह मंदिर महाभारत काल से ही अस्तित्व में है। युद्ध समाप्त होने के बाद जब पांडव स्वर्ग के लिए प्रस्थान कर गए तो यमुनोत्री जाने से पहले एक बार फिर इस स्थान पर आए थे।