Parama Ekadashi Vrat Katha: सनातन धर्म में एकादशी तिथि का विशेष महत्व माना गया है। प्रत्येक एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित होती है, लेकिन अधिकमास के कृष्ण पक्ष में आने वाली परमा एकादशी का स्थान अत्यंत श्रेष्ठ बताया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन विधिपूर्वक व्रत, पूजन और परमा एकादशी व्रत कथा का श्रवण अथवा पाठ करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं और साधक को अक्षय पुण्य फल की प्राप्ति होती है। पद्म पुराण में इस एकादशी का विस्तृत वर्णन मिलता है, जहां भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को इस व्रत का महत्व और इसकी पौराणिक कथा सुनाई थी।
परमा एकादशी का महत्व
अधिकमास को भगवान विष्णु का प्रिय मास माना जाता है। इसी अधिकमास में आने वाली परमा एकादशी को सभी पापों का नाश करने वाली और महान पुण्य प्रदान करने वाली एकादशी कहा गया है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार इस दिन व्रत रखकर भगवान विष्णु की पूजा करने तथा रात्रि जागरण करने से मनुष्य को दुर्लभ पुण्य प्राप्त होता है। विशेष रूप से परमा एकादशी की कथा का श्रवण और पाठ इस व्रत को पूर्ण फलदायी बनाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, इस व्रत के प्रभाव से निर्धनता दूर होती है, जीवन में सुख-समृद्धि आती है और भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
परमा एकादशी व्रत कथा
पद्म पुराण में वर्णित कथा के अनुसार प्राचीन काल में कापिल्य नगर में सुमेधा नाम का एक ब्राह्मण रहता था। वह अत्यंत विद्वान, धर्मपरायण और सदाचारी था। उसकी पत्नी का नाम पवित्रा था। पवित्रा भी पतिव्रता, धर्मनिष्ठ और भगवान में गहरी आस्था रखने वाली स्त्री थी।
यद्यपि दोनों पति-पत्नी धार्मिक जीवन व्यतीत करते थे, फिर भी उनके जीवन में अत्यंत गरीबी थी। सुमेधा भिक्षा मांगकर जैसे-तैसे अपने परिवार का पालन-पोषण करता था। कई बार ऐसी स्थिति आ जाती थी कि घर में भोजन तक उपलब्ध नहीं होता था। पवित्रा स्वयं भूखी रह जाती, लेकिन अपने पति को कभी इसका आभास नहीं होने देती थी।
समय बीतने के साथ गरीबी और अधिक बढ़ती गई। एक दिन सुमेधा ने अपनी पत्नी से कहा कि वह किसी दूसरे प्रदेश में जाकर धन कमाने का प्रयास करना चाहता है, क्योंकि यहां रहने पर परिवार का भरण-पोषण करना कठिन होता जा रहा है।
पत्नी पवित्रा ने पति को समझाया
सुमेधा की बात सुनकर पवित्रा ने अत्यंत विनम्रता से कहा कि मनुष्य को जो सुख और दुख प्राप्त होते हैं, वे उसके पूर्व जन्मों के कर्मों के अनुसार ही मिलते हैं। यदि भाग्य में धन लिखा होगा तो वह यहीं प्राप्त हो जाएगा और यदि भाग्य में नहीं होगा तो दूर देश में जाने पर भी नहीं मिलेगा। पवित्रा ने अपने पति से कहा कि वह उसे छोड़कर कहीं न जाए। पति-पत्नी दोनों ने मिलकर कठिन परिस्थितियों में भी धर्म और भगवान की भक्ति का मार्ग नहीं छोड़ा।
ऋषि कौण्डिन्य का आगमन
एक दिन उनके घर महान तपस्वी ऋषि कौण्डिन्य पधारे। दोनों पति-पत्नी ने श्रद्धा और भक्ति से उनका स्वागत किया। घर में भोजन की कमी होने के बावजूद उन्होंने अपनी सामर्थ्य के अनुसार ऋषि की सेवा की। ऋषि कौण्डिन्य उनकी सेवा और विनम्रता से अत्यंत प्रसन्न हुए। तब पवित्रा ने हाथ जोड़कर उनसे कहा कि वे कोई ऐसा व्रत या उपाय बताएं, जिससे उनकी दरिद्रता दूर हो सके और भगवान की कृपा प्राप्त हो। पवित्रा की प्रार्थना सुनकर ऋषि कौण्डिन्य ने कहा कि अधिकमास के कृष्ण पक्ष में आने वाली परमा एकादशी का व्रत अत्यंत पुण्यदायी है। इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और उसे धन, सुख तथा समृद्धि की प्राप्ति होती है।
ऋषि ने बताया परमा एकादशी का महात्म्य
ऋषि कौण्डिन्य ने कहा कि परमा एकादशी का व्रत स्वयं देवताओं द्वारा भी प्रशंसित है। इस व्रत के साथ पंचरात्र व्रत करने का भी विशेष महत्व बताया गया है। उन्होंने कहा कि जो श्रद्धापूर्वक परमा एकादशी का उपवास करता है, भगवान विष्णु उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। ऋषि ने अनेक प्राचीन उदाहरणों का उल्लेख करते हुए बताया कि राजाओं, ऋषियों और भक्तों ने इस व्रत के प्रभाव से महान सिद्धियां और समृद्धि प्राप्त की थी।
सुमेधा और पवित्रा ने किया व्रत
ऋषि कौण्डिन्य के उपदेश को सुनकर सुमेधा और पवित्रा ने पूर्ण श्रद्धा के साथ परमा एकादशी का व्रत करने का संकल्प लिया। अधिकमास की परमा एकादशी आने पर दोनों ने नियमपूर्वक उपवास किया, भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना की और पूरी रात्रि जागरण कर हरि-नाम का स्मरण किया। उन्होंने ऋषि के निर्देशानुसार व्रत के सभी नियमों का पालन किया। उनकी भक्ति और श्रद्धा से भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न हुए।
भगवान विष्णु की कृपा से बदला भाग्य
परमा एकादशी व्रत के प्रभाव से शीघ्र ही उनके जीवन में परिवर्तन आने लगा। कुछ समय बाद एक राजकुमार वहां आया। उसने सुमेधा की धर्मनिष्ठा और सदाचार से प्रभावित होकर उन्हें रहने के लिए सुंदर गृह प्रदान किया। इसके साथ ही जीवनयापन के लिए पर्याप्त धन और आवश्यक वस्तुओं की व्यवस्था भी कर दी। धीरे-धीरे सुमेधा और पवित्रा का जीवन सुख, समृद्धि और सम्मान से भर गया। धार्मिक ग्रंथों में वर्णन मिलता है कि परमा एकादशी व्रत के पुण्य प्रभाव से दोनों ने इस लोक में सुखों का उपभोग किया और अंत समय में भगवान विष्णु के परम धाम को प्राप्त हुए।
कथा श्रवण का महत्व