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Nirjala ekadashi Upay: निर्जला एकादशी पर करें ये उपाय , मिलेगा भगवान विष्णु का आशीर्वाद ||

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
कोमल
सार

Nirjala ekadashi Upay: सनातन धर्म में निर्जला एकादशी का विशेष महत्व है। यह सबसे कठिन व्रतों में से एक है। ज्येष्ठ माह में पड़ने वाली इस एकादशी को भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है। इस व्रत में भक्त पूरे 24 घंटे तक अन्न-जल ग्रहण नहीं करते हैं

Nirjala ekadashi Upay:
Nirjala ekadashi Upay: सनातन धर्म में निर्जला एकादशी का विशेष महत्व है। यह सबसे कठिन व्रतों में से एक है। ज्येष्ठ माह में पड़ने वाली इस एकादशी को भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है। इस व्रत में भक्त पूरे 24 घंटे तक अन्न-जल ग्रहण नहीं करते हैं। इस तिथि पर श्री हरि की विधि-विधान से पूजा की जाती है। निर्जला एकादशी के दिन नारायण की कृपा पाने के लिए आप कुछ खास उपाय भी कर सकते हैं।आइए जानते हैं

 निर्जला एकादशी के दिन क्या करें (Nirjala Ekadashi Ke Din Kya Kare) 


आपको बता दें कि निर्जला एकादशी के दिन 24 एकादशियों के समान फल मिलता है। निर्जला एकादशी के दिन भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर के सामने घी का दीपक जलाएं। इससे मनचाहा फल मिलेगा। इस एकादशी पर तुलसी के पास घी या तिल का दीपक जलाएं, इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा आएगी। निर्जला एकादशी के दिन मुख्य द्वार पर दीपक जलाने से सारी नकारात्मकता दूर होती है। इससे देवी लक्ष्मी का आगमन होता है।

इस दिन आप पीपल के पेड़ के पास भी दीपक जला सकते हैं। इससे पितरों का आशीर्वाद मिलता है। साथ ही जीवन में सुख-समृद्धि आती है। इस दिन ज्येष्ठ अमावस्या पर सुबह ब्रह्म मुहूर्त में या दिन में कभी भी पवित्र नदी में स्नान किया जा सकता है।

निर्जला एकादशी इस दिन दीपक से जुड़े उपाय करने के फायदे ( Nirjala Ekadashi Ke Din Kare Ye Upay)


इस उपाय को करने से घर की ऊर्जा सकारात्मक बनती है। साथ ही जीवन में सुख-शांति और समृद्धि आती है। इससे घर में देवी लक्ष्मी का आगमन होता है।

निर्जला एकादशी मंत्र - (Nirjala Ekadashi Mantra)

शान्ताकारम् भुजगशयनम् पद्मनाभम् सुरेशम्
विश्वाधारम् गगनसदृशम् मेघवर्णम् शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तम् कमलनयनम् योगिभिर्ध्यानगम्यम्
वन्दे विष्णुम् भवभयहरम् सर्वलोकैकनाथम्॥

दन्ताभये चक्र दरो दधानं, कराग्रगस्वर्णघटं त्रिनेत्रम्।
धृताब्जया लिंगितमब्धिपुत्रया, लक्ष्मी गणेशं कनकाभमीडे।।
ॐ देवानां च ऋषीणां च गुरु कांचन संन्निभम्।
बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम्।।

 

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