Mithun Sankranti 2025: हिंदू धर्म में संक्रांति का विशेष स्थान है और मिथुन संक्रांति उन बारह संक्रांतियों में से एक है, जो सूर्य के राशि परिवर्तन के साथ मनाई जाती हैं। इस वर्ष 2025 में मिथुन संक्रांति 15 जून, रविवार को पूरे देश में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जाएगी। यह वह शुभ दिन है, जब सूर्य देव वृषभ राशि से निकलकर बुध की राशि मिथुन में प्रवेश करते हैं। यह पर्व न केवल धार्मिक, बल्कि ज्योतिषीय, सांस्कृतिक और कृषि दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। आइए जानते हैं मिथुन संक्रांति का महत्व और पूजन विधि...
मिथुन संक्रांति की तिथि (Mithun Sankranti Date)
हिंदू पंचांग के अनुसार, मिथुन संक्रांति तब होती है, जब सूर्य देव वृषभ राशि से मिथुन राशि में गोचर करते हैं। 2025 में मिथुन संक्रांति 15 जून को होगी। पंचांग के अनुसार सूर्य देव 15 जून 2025 को प्रातः लगभग 06:53 बजे मिथुन राशि में प्रवेश करेंगे, जिसके साथ ही मिथुन संक्रांति शुरु हो जाएगी। पुण्य काल प्रातः 06:53 बजे से दोपहर 02:29 बजे तक रहेगा, जिसमें दान और पूजा-पाठ का विशेष फल मिलता है। यह दिन ओडिशा, बंगाल और पूर्वी भारत में खास उत्साह के साथ मनाया जाता है, जहां इसे राजा संक्रांति या राजा परब के नाम से भी जाना जाता है।
क्यों मनाई जाती है मिथुन संक्रांति? (Why Mithun Sankranti Celebrated)
मिथुन संक्रांति सूर्य के राशि परिवर्तन का उत्सव है, जो ज्योतिषीय और पर्यावरणीय बदलावों का प्रतीक है। हिंदू मान्यता में सूर्य को आत्मा, यश, सम्मान और शक्ति का कारक माना जाता है। इस दिन सूर्य की पूजा और दान-पुण्य करने से जीवन में सकारात्मकता, स्वास्थ्य और समृद्धि आती है। खास तौर पर यह पर्व वर्षा ऋतु की शुरुआत से जुड़ा है। मान्यता है कि मिथुन संक्रांति के साथ धरती मां वर्षा के लिए तैयार होती हैं, जिससे किसानों को अच्छी फसल की उम्मीद बंधती है। ओडिशा में इसे तीन दिनों तक राजा परब के रूप में मनाया जाता है, जिसमें धरती माता और सूर्य देव की कृपा से प्रकृति और मानव जीवन के सामंजस्य का जश्न मनाया जाता है।
मिथुन संक्रांति का महत्व (Mithun Sankranti Importance)
धार्मिक महत्व: सूर्य देव को जीवन का आधार माना जाता है। इस दिन उनकी पूजा से कुंडली में सूर्य की स्थिति मजबूत होती है, जिससे आत्मविश्वास, नेतृत्व क्षमता और स्वास्थ्य में सुधार होता है। दान-पुण्य से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।
ज्योतिषीय महत्व: मिथुन राशि बुध ग्रह द्वारा शासित है। मिथुन राशि बुद्धि, संचार और चतुराई का प्रतीक है। सूर्य का मिथुन में गोचर सभी राशियों पर प्रभाव डालता है, खासकर मिथुन, कन्या और धनु राशि वालों के लिए यह विशेष रूप से शुभ हो सकता है। इस दौरान नक्षत्रों की दिशा में बदलाव भी फसल और मौसम को प्रभावित करता है।
सांस्कृतिक महत्व: यह पर्व वर्षा ऋतु के आगमन का संकेत देता है। ओडिशा में राजा परब के दौरान लोग लोकगीत, जैसे राजगीता गाते हैं और नृत्य करते हैं। यह किसानों के लिए खुशी का अवसर है, क्योंकि बारिश अच्छी फसल का वादा करती है। धरती माता को सिल-बट्टे के रूप में पूजने की परंपरा भी इसे अनोखा बनाती है।
पूजन विधि (Mithun Sankranti Worship Method)
सुबह सूर्योदय से पहले नहाएं।
एक साफ चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं। सूर्य देव की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। पास में भगवान विष्णु और धरती माता यानी सिल-बट्टे की पूजा के लिए स्थान तैयार करें।
घी या तिल के तेल का दीपक जलाएं और अगरबत्ती प्रज्वलित करें।
सूर्योदय के समय तांबे के लोटे में जल, गुड़, लाल चंदन और लाल फूल डालकर सूर्य देव को अर्घ्य दें। 'ॐ सूर्याय नमः' या 'ॐ घृणि सूर्याय नमः' मंत्र का 108 बार जाप करें।
सूर्य देव को लाल फूल, चंदन, रोली, गुड़, गेहूं और फल अर्पित करें। ओडिशा में सिल-बट्टे को दूध और जल से स्नान कराकर, फूल, सिन्दूर और चंदन से सजाया जाता है।
इस दिन गरीबों को मसूर की दाल, गुड़, लाल वस्त्र, गेहूं, तिल और चावल का दान करें। जरूरतमंदों की मदद से अक्षय पुण्य मिलता है।
मिथुन संक्रांति की कथा सुनें और सूर्य देव के भजन, जैसे- 'आदित्य हृदय स्तोत्र' का पाठ करें।
शाम को चंद्रमा को अर्घ्य देना भी शुभ माना जाता है।
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