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Lord Kartikeya: कैसे हुआ भगवान कार्तिकेय का जन्म? दक्षिण भारत में लोकप्रिय क्यों हैं शिव-पार्वती के पुत्र?

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
साक्षी
सार

Lord Kartikeya: हिंदू धर्म में भगवान कार्तिकेय युद्ध और विजय के देवता हैं, उन्हें स्कंद, मुरुगन, सुब्रह्मण्य, शण्मुख, या कुमार के नाम से भी जाना जाता है।

भगवान कार्तिकेय
Lord Kartikeya: हिंदू धर्म में भगवान कार्तिकेय युद्ध और विजय के देवता हैं, उन्हें स्कंद, मुरुगन, सुब्रह्मण्य, शण्मुख, या कुमार के नाम से भी जाना जाता है। वे भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र हैं और दक्षिण भारत में विशेष रूप से पूजनीय हैं। भगवान कार्तिकेय को विषेश रूप से दक्षिण भारत में पूजा जाता है। उनके जन्म की कथा भी काफी रोचक है। ऐसे में चलिए जानते हैं कि क्या है भगवान कार्तिकेय के जन्म की पौराणिक कथा और दक्षिण भारत में उनकी व्यापक लोकप्रियता क्यों है।
भगवान कार्तिकेय

भगवान कार्तिकेय का जन्म

विशेष रूप से स्कंद पुराण और शिव पुराण में भगवान कार्तिकेय के जन्म की कथा वर्णित है। उनकी उत्पत्ति एक दैवीय उद्देश्य से जुड़ी है, जो दैत्य तारकासुर के वध और धर्म की रक्षा से संबंधित है। प्राचीन काल में तारकासुर नामक एक शक्तिशाली राक्षस ने अपनी तपस्या से ब्रह्माजी को प्रसन्न किया और एक वरदान प्राप्त किया कि उसे केवल भगवान शिव का पुत्र ही मार सकता है। उस समय भगवान शिव गहन तप में लीन थे और उनकी पत्नी सती ने दक्ष यज्ञ में आत्मदाह कर लिया था। तारकासुर को यह विश्वास था कि शिव के संन्यासी जीवन के कारण उनका पुत्र कभी जन्म नहीं लेगा और वह निर्भय होकर तीनों लोकों में अत्याचार करने लगा।

देवताओं की पुकार पर माता पार्वती ने भगवान शिव की कठिन तपस्या की और उनसे विवाह का सौभाग्य प्राप्त किया। इस पवित्र विवाह का लक्ष्य था एक ऐसे पुत्र का जन्म, जो दैत्य तारकासुर का संहार कर सके। शिव और पार्वती के मिलन से उत्पन्न हुई अलौकिक ऊर्जा इतनी तीव्र थी कि उसे कोई भी धारण करने में असमर्थ था। इस ऊर्जा को अग्निदेव ने ग्रहण किया, किंतु वे भी इसे संभाल न सके और इसे गंगा नदी में प्रवाहित कर दिया। गंगा ने इस तेज को सरकंडों के समीप छोड़ा, जहां से एक तेजस्वी बालक का प्रादुर्भाव हुआ। इस बालक का नाम स्कंद रखा गया।

सरकंडों के पास जन्म लेने के बाद छह कृतिका ने इस बालक का पालन-पोषण किया। कृतिकाओं के दूध पीने के कारण उन्हें कार्तिकेय यानी कृतिका का पुत्र कहा गया। उनके छह सिर और बारह भुजाएं थीं, जो उनकी छह माताओं का प्रतीक थीं। कार्तिकेय को देवताओं ने सेनापति नियुक्त किया। उन्होंने अपनी माता पार्वती से प्राप्त शक्ति के साथ तारकासुर का वध किया और धर्म की पुनर्स्थापना की। इस युद्ध में उनकी वीरता और नेतृत्व ने उन्हें युद्ध के देवता के रूप में स्थापित किया।

दक्षिण भारत में कार्तिकेय की लोकप्रियता

दक्षिण भारत में भगवान कार्तिकेय को मुरुगन या सुब्रह्मण्य के नाम से पूजा जाता है और वे तमिल संस्कृति का एक अभिन्न अंग हैं। उनकी लोकप्रियता के कई कारण हैं। तमिल साहित्य में मुरुगन को एक प्राचीन तमिल देवता माना जाता है, जिन्हें प्रारंभ में एक पहाड़ी देवता के रूप में पूजा जाता था। तमिल संगम साहित्य, जैसे तिरुमुरुगात्रुपदई में मुरुगन की महिमा का वर्णन है। उनकी छह पवित्र तीर्थस्थलों में तिरुपरंकुंद्रम, तिरुचेंद्र, पलनी, स्वामिमलई, तिरुत्तनी और पझमुदिरचोलाई शामिल हैं। ये तीर्थस्थल तमिलनाडु में लाखों भक्तों को आकर्षित करते हैं।
भगवान कार्तिकेय

युद्ध और विजय के प्रतीक

दक्षिण भारत में मुरुगन को युद्ध और विजय का प्रतीक माना जाता है। तमिल समुदाय ऐतिहासिक रूप से योद्धा परंपरा से जुड़ा रहा है, वह मुरुगन को अपनी शक्ति और साहस का स्रोत मानता है। उनकी शक्ति और मोर वाहन युद्ध में गति और शक्ति का प्रतीक हैं। मुरुगन को एक युवा, सुंदर और शक्तिशाली देवता के रूप में चित्रित किया जाता है, जो युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत हैं। उनकी वीरता और आकर्षण उन्हें दक्षिण भारतीय समाज में विशेष रूप से लोकप्रिय बनाते हैं।

भक्ति परंपरा और त्योहार

दक्षिण भारत में मुरुगन से जुड़े कई त्योहार, जैसे थाईपुसम और स्कंद षष्ठी, भक्तों के बीच उत्साह पैदा करते हैं। थाईपुसम में भक्त कावड़ी लेकर मुरुगन के मंदिरों तक जाते हैं और अपनी भक्ति को दर्शाते हैं। ये उत्सव तमिल समुदाय की एकता और भक्ति को मजबूत करते हैं। मुरुगन की पूजा ने वैदिक और तमिल परंपराओं को एकीकृत किया है। वे वैदिक स्कंद और तमिल मुरुगन के संयोजन का प्रतीक हैं।
भगवान कार्तिकेय

मंदिरों और कला में चित्रण

दक्षिण भारत के मंदिरों में मुरुगन की मूर्तियां और चित्रण उनकी लोकप्रियता को दर्शाते हैं। पलनी मंदिर में उनकी दंडायुधपाणि रूप की पूजा और स्वामिमलई में गुरु रूप की पूजा भक्तों को आकर्षित करती है। तमिल कला, नृत्य और संगीत में भी मुरुगन की कहानियां प्रचलित हैं। मुरुगन केवल युद्ध के देवता नहीं हैं, बल्कि वे ज्ञान, भक्ति और तप के भी प्रतीक हैं। स्वामिमलई में उन्हें गुरु के रूप में पूजा जाता है, जहां उन्होंने अपने पिता शिव को "ॐ" के अर्थ की शिक्षा दी थी। उनकी पूजा भक्तों को बुराइयों पर विजय प्राप्त करने की प्रेरणा देती है।

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