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Karwa Chauth Vrat: क्या कुंवारी कन्याएं भी रख सकती हैं करवा चौथ का व्रत, जानिए नियम

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
कोमल शर्मा
सार

Karwa Chauth Vrat:  विवाहित महिलाओं के लिए करवा चौथ का त्योहार बहुत महत्वपूर्ण है। यह हर साल कार्तिक महीने में कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है; इस वर्ष यह शुभ तिथि गुरुवार 29 अक्टूबर को पड़ रही है।

 Karwa Chauth Vrat: 
 Karwa Chauth Vrat:  विवाहित महिलाओं के लिए करवा चौथ का त्योहार बहुत महत्वपूर्ण है। यह हर साल कार्तिक महीने में कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है इस वर्ष यह शुभ तिथि गुरुवार 29 अक्टूबर को पड़ रही है। इस पवित्र दिन पर, विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और कुशलता की कामना करते हुए निर्जला व्रत रखती हैं। वे चंद्रमा को 'अर्घ्य' देने के बाद ही अपना व्रत खोलती हैं। आजकल केवल विवाहित महिलाएं ही नहीं बल्कि कई अविवाहित युवतियां भी यह व्रत रखने लगी हैंअक्सर अपने होने वाले पति या वर्तमान प्रेमी के लिए। ऐसे में सवाल उठता है क्या अविवाहित महिलाओं को करवा चौथ का व्रत रखना चाहिए? इस बारे में हमारे शास्त्र क्या कहते हैं?

शास्त्र क्या कहते हैं?

अधिकांश धार्मिक ग्रंथों में करवा चौथ का व्रत विशेष रूप से विवाहित महिलाओं के लिए बताया गया है। इस व्रत का मुख्य आधार 'पतिव्रत्य धर्म' है यानी अपने पति के प्रति पूर्ण समर्पण जो केवल विवाह के बाद ही संभव है। 'पतिव्रत्य' शब्द 'पति' और 'व्रत'  से मिलकर बना है जिसका अर्थ है अपने पति के प्रति निष्ठा, कर्तव्य और समर्पण। चूंकि विवाह से पहले यह प्रतिबद्धता लागू नहीं होती इसलिए शास्त्रों में अविवाहित महिलाओं द्वारा इस व्रत को रखने का कोई उल्लेख नहीं है यह पूरी तरह से विवाहित महिलाओं के लिए है।

विवाहित और अविवाहित दोनों के लिए आशीर्वाद

समय के साथ परंपराओं में बदलाव आया है और कई जगहों पर अविवाहित युवतियां भी करवा चौथ का व्रत रखने लगी हैं। इस दिन व्रत रखकर और भगवान शिव तथा माता पार्वती की पूजा करके वे एक योग्य जीवनसाथी पाने की प्रार्थना करती हैं। अविवाहित महिलाओं के व्रत रखने पर कोई रोक नहीं है और उन्हें भी इसका शुभ फल मिल सकता है। इस प्रकार इस त्योहार का महत्व केवल पति की लंबी उम्र की प्रार्थना तक ही सीमित नहीं है यह विवाहित और अविवाहित, दोनों तरह की महिलाओं के लिए आशीर्वाद का एक स्रोत है। 

अविवाहित लड़कियों के लिए करवा चौथ के नियम

विवाहित महिलाओं और अविवाहित लड़कियों के व्रत की परंपराओं में कुछ अंतर होता है। विवाहित महिलाएं छलनी से चंद्रमा को देखकर और फिर अपने पति का चेहरा देखकर अपना व्रत खोलती हैं जबकि अविवाहित लड़कियां तारों को देखकर अपना व्रत खोलती हैं। हालांकि वे चंद्रमा को 'अर्घ्य' दे सकती हैं।
विवाहित महिलाएं अपने पति की भलाई और अच्छे स्वास्थ्य की कामना के लिए करवा चौथ का व्रत रखती हैं जबकि अविवाहित लड़कियां इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की विशेष पूजा करती हैं। माना जाता है कि इस पूजा और व्रत से उन्हें अपनी पसंद का जीवनसाथी पाने में मदद मिलती है।
करवा चौथ पर विवाहित महिलाएं 'सोलह श्रृंगार' करती हैं और करवा माता की पूजा में भाग लेती हैं। इसमें 'करवे' का आदान-प्रदान करना और 'थाली' घुमाना जैसी रस्में शामिल होती हैं। अविवाहित लड़कियों को इन परंपराओं का पालन करने की आवश्यकता नहीं होती उनके लिए सोलह श्रृंगार करना अनिवार्य नहीं है, और न ही उन्हें करवे बदलने या थाली घुमाने जैसी रस्में करनी चाहिए। इसके अलावा, उन्हें 'सुहाग' से जुड़ी वस्तुओं को उपहार के रूप में नहीं लेना चाहिए।
इसके अतिरिक्त 'सरगी' की परंपरा केवल विवाहित महिलाओं के लिए है अविवाहित लड़कियों के लिए नहीं। व्रत के दौरान, अविवाहित लड़कियां दिन में एक बार फल खा सकती हैं या पानी पी सकती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, व्रत को सफलतापूर्वक पूरा करने के लिए इस दिन 'तामसिक'  भोजन और अन्य चीजों के सेवन से बचना चाहिए।
विवाहित महिलाएं 'निर्जला' व्रत रखती हैं और शाम को चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही अपना व्रत खोलती हैं। अविवाहित लड़कियों के लिए ऐसी कोई बाध्यता नहीं है वे दिन में एक बार फल खा सकती हैं और उनके लिए निर्जला व्रत रखना अनिवार्य नहीं है।
विवाहित महिलाएं करवा चौथ की व्रत कथा सुनती हैं और अविवाहित लड़कियां भी उनके साथ बैठकर यह कथा सुन सकती हैं। इस दौरान वह देवी माँ के सामने अपनी इच्छा ज़ाहिर कर सकती है कि वह कैसा पति पाना चाहती है।

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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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