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Kajari Teej 2025: कजरी तीज क्यों मनाई जाती हैं, कैसे शुरू हुई व्रत रखने की परंपरा?

JeevanjaliPublished by:
नीरज पटेल
सार

Kajari Teej Vrat: कजरी तीज के दिन सुहागिन महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं और शाम को चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोलती हैं। इस दिन नीमड़ी माता (नीम की डालियों की पूजा) और गाय की पूजा करने का भी विशेष महत्व है। 

कजरी तीज क्यों मनाई जाती हैं, कैसे शुरू हुई व्रत रखने की परंपरा?
Kajari Teej 2025 Parampara: हिन्दू धर्म में कजरी तीज को बड़ी तीज या सातुड़ी तीज भी कहा जाता है। ये पर्व बड़े ही उत्साह से हर साल भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। यह पर्व मुख्य रूप से सुहागिन महिलाओं द्वारा पति की लंबी आयु और सुख-समृद्धि के लिए रखा जाता है। कुंवारी लड़कियां भी इस व्रत को मनचाहा वर पाने के लिए करती हैं। कजरी तीज का पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के प्रेम और समर्पण का प्रतीक है। इस व्रत के पीछे कई पौराणिक मान्यताएं हैं।

कजरी तीज तिथि 

पंचांग के अुसार, कजरी तीज की तिथि 11 अगस्त को सुबह 10 बजकर 33 मिनट पर शुरू होगी और तिथि का समापन 12 अगस्त को सुबह 8 बजकर 40 मिनट पर होगा। उदयातिथि के अनुसार, कजरी तीज 12 अगस्त 2025 को ही मनाया जाएगा।

माता पार्वती का कठोर तप

पौराणिक कथा के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए 108 जन्मों तक कठोर तपस्या की थी। उन्होंने हर जन्म में बहुत कष्ट सहे, लेकिन अपनी श्रद्धा नहीं छोड़ी। अंत में, उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया। यह माना जाता है कि कजरी तीज के दिन ही माता पार्वती का भगवान शिव से पुनर्मिलन हुआ था। इसलिए, यह व्रत उनके पवित्र प्रेम और समर्पण का प्रतीक है।

व्रत की परंपरा कैसे हुई शुरू?

व्रत रखने की परंपरा की शुरुआत भी माता पार्वती के तप से ही मानी जाती है। मान्यताओं के अनुसार, सबसे पहले स्वयं माता पार्वती ने ही यह व्रत रखा था। उन्होंने भगवान शिव को पाने के लिए यह व्रत किया था, जिसके बाद से यह परंपरा शुरू हो गई।

एक अन्य प्रचलित कथा के अनुसार, एक गांव में एक गरीब ब्राह्मण दंपति रहते थे। एक बार भाद्रपद मास की कजरी तीज आई, तो ब्राह्मणी ने व्रत रखा और अपने पति से व्रत खोलने के लिए चने का सत्तू लाने को कहा। ब्राह्मण के पास पैसे नहीं थे, तो वह रात में एक साहूकार की दुकान से चोरी से सत्तू लेने गया। जब वह पकड़ा गया, तो उसने साहूकार को अपनी पत्नी के व्रत के बारे में बताया। ब्राह्मण की ईमानदारी से प्रभावित होकर साहूकार ने उसे सत्तू के साथ-साथ बहुत सारा धन भी दिया। इस घटना के बाद से यह मान्यता है कि कजरी तीज का व्रत करने से भक्तों के कष्ट दूर होते हैं और उनका जीवन सुख-समृद्धि से भर जाता है।

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