facebook pixel
विज्ञापन
Home  dharm  jitiya vrat katha kyo rakha jata hai jitiya vrat janiye katha

Jitiya Vrat Katha : क्यों रखा जाता है जितिया व्रत, जानिए कथा

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
कोमल शर्मा
सार

Jitiya Vrat Katha :  इस साल जितिया व्रत 3 अक्टूबर, 2026 को रखा जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो महिला जीवित्पुत्रिका व्रत रखती है, उसके बच्चों पर कभी कोई बड़ा संकट नहीं आता

Jitiya Vrat Katha : 
Jitiya Vrat Katha :  इस साल जितिया व्रत 3 अक्टूबर, 2026 को रखा जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो महिला जीवित्पुत्रिका व्रत रखती है, उसके बच्चों पर कभी कोई बड़ा संकट नहीं आता और उनका जीवन खुशियों से भरा रहता है। यह व्रत निर्जला रखा जाता है, यानी इसमें न तो कुछ खाया जाता है और न ही पानी पिया जाता है। पूजा के दौरान, महिलाएं कुश घास से बनी जीमूतवाहन की मूर्ति की पूजा करती हैं। वे मिट्टी और गाय के गोबर से मादा चील और मादा सियार की मूर्तियां भी बनाती हैं। फिर, शुभ समय पर वे पूजा-पाठ करती हैं और जितिया की कथा सुनती हैं। आइए जानते हैं कि जितिया व्रत के दौरान कौन सी कथा सुनाई जाती है।

जितिया व्रत की कथा

जितिया की कथा के अनुसार, एक बार जंगल में एक मादा चील और एक मादा सियार रहती थीं। उनमें गहरी दोस्ती थी और वे हर काम साथ मिलकर करती थीं। एक बार, कुछ महिलाएं जंगल में जीवित्पुत्रिका व्रत के बारे में बात कर रही थीं। चील को उस व्रत के बारे में जानने की उत्सुकता हुई और वह महिलाओं के पास जाकर उनके बारे में पूछने लगी। महिलाओं ने उसे जितिया व्रत के रीति-रिवाजों और नियमों के बारे में बताया।

तब चील ने अपनी सहेली सियार को उस व्रत के बारे में बताया। इसके बाद, दोनों ने व्रत रखने और जितिया माता की पूजा करने का फैसला किया। उन्होंने जितिया माता का व्रत रखने का संकल्प लिया और शाम को पूजा की। हालांकि, पूजा के कुछ ही देर बाद दोनों को भूख लगने लगी।

सियार भूख बर्दाश्त नहीं कर पाई और शिकार करने के लिए जंगल चली गई। जब सियार मांस खा रही थी, तो चील ने उसे देख लिया और उसे खूब डांटा। चील ने सभी तय नियमों के साथ व्रत पूरा किया। अगले जन्म में, सियार और चील एक शक्तिशाली राजा के घर बहनों के रूप में पैदा हुईं। सियार की शादी एक राजकुमार से हुई, जबकि चील की शादी राज्य के मंत्री के बेटे से हुई। कुछ समय बाद, सियार ने एक बेटे को जन्म दिया, लेकिन जन्म के कुछ ही दिनों बाद उसकी मृत्यु हो गई। इसके बाद, चील ने भी एक बेटे को जन्म दिया, जो जीवित और स्वस्थ रहा। यह देखकर सियार अपनी बहन चील से जलने लगी। ईर्ष्या से भरी मादा सियार ने अपनी बहन के बेटे और पति को मरवाने की कोशिश की, लेकिन वे दोनों बच गए। एक दिन, देवी ने मादा सियार के सपने में आकर कहा, "यह तुम्हारे पिछले जन्म के कर्मों का फल है; अगर तुम अपनी स्थिति सुधारना चाहती हो, तो व्रत रखो और देवी जितिया की पूजा करो।"

सुबह उठने पर मादा सियार ने अपने पति को सपने के बारे में बताया। यह सुनकर उसके पति ने उसे व्रत रखने के लिए प्रोत्साहित किया और अपनी बहन, चील, से माफ़ी मांगने को कहा। इसके बाद, सियार चील के घर गई और अपनी पिछली गलतियों के लिए माफ़ी मांगी। सियार का पछतावा देखकर चील ने उसे माफ़ कर दिया।

अगले साल, जब जितिया का त्योहार आया, तो सियार और उसकी बहन चील, दोनों ने मिलकर व्रत रखा। खुश होकर देवी जितिया ने सियार को पुत्र का वरदान दिया। कुछ समय बाद, सियार ने एक सुंदर बेटे को जन्म दिया। तब से, दोनों बहनें खुशी-खुशी और प्यार से साथ रहने लगीं।

जितिया व्रत की दूसरी कथा

जब जीमूतवाहन के पिता ने बुढ़ापे में अपना राज्य त्यागकर जीवन के वानप्रस्थ चरण में जाने का फैसला किया, तो जीमूतवाहन की राजा बनने की कोई इच्छा नहीं थी। नतीजतन, उन्होंने राज्य अपने भाइयों को सौंप दिया और अपने पिता की सेवा करने के लिए जंगल चले गए। जीमूतवाहन ने मलयवती नाम की राजकुमारी से शादी की। एक दिन जंगल में घूमते हुए उन्हें एक बूढ़ी औरत रोती हुई मिली। उन्हें पता चला कि वह नाग कुल की थी। बूढ़ी औरत ने बताया कि नागों ने पक्षियों के राजा गरुड़ को रोज़ाना अपने ही कुल के एक सदस्य की बलि देने का वचन दिया था और अब उसके बेटे शंखचूड़ की बलि देने की बारी थी।

यह सुनकर जीमूतवाहन ने उस औरत से कहा कि वह बलि के लिए खुद को पेश करेंगे। उन्होंने शंखचूड़ से लाल कपड़ा लिया और एक चट्टान पर लेट गए, बलि के लिए तैयार हो गए। जब गरुड़ आए, तो उन्होंने लाल कपड़े से ढकी आकृति देखी और उसे पहाड़ की चोटी पर ले गए। गरुड़ के पंजों में जकड़े होने के कारण, तेज़ दर्द से कराहते हुए जीमूतवाहन पर गरुड़ की नज़र पड़ी। गरुड़ ने पूछा कि वह कौन है और नागों के निवास-स्थान पर क्या कर रहा है। तब जीमूतवाहन ने गरुड़-राज को पूरी घटना सुनाई। जीमूतवाहन की बहादुरी और त्याग की भावना से गरुड़ बहुत प्रसन्न हुए।

इसके बाद, गरुड़-राज ने न केवल जीमूतवाहन की जान बख्श दी, बल्कि यह भी संकल्प लिया कि वे भविष्य में कभी भी नागों की बलि स्वीकार नहीं करेंगे। कहा जाता है कि इसी घटना के बाद से जीमूतवाहन की पूजा करने की परंपरा शुरू हुई।


यह भी पढ़ें-

Shivling Parikrama: शिवलिंग की परिक्रमा पूरी क्यों नहीं की जाती? जानें धार्मिक मान्यता और इसका कारण 

Shivling Puja: शिवलिंग पर क्यों चढ़ाया जाता है कच्चा दूध? जानिए धार्मिक महत्व 

Sawan 2026: सावन में शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने का सही नियम क्या है? जानिए धार्मिक मान्यता 

(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

धार्मिक कहानियां सुनने और पढ़ने के लिए हमारे WhatsApp चैनल से जुड़ें।

WhatsApp Channel