Jaya Kishori motivation: प्रसिद्ध कथावाचक एवं आध्यात्मिक वक्ता जया किशोरी ने बच्चों की परवरिश को लेकर माता-पिता को महत्वपूर्ण प्रेरणादायी बातें बताई, जिससे आने वाले समय में बच्चों को खुद को संभालने की सीख मिले।
Jaya Kishori Event for Life Changes: वाराणसी में आयोजित अमर उजाला, जीवांजलि "विचारों से बदलाव तक" के प्रेरणादायी कार्यक्रम में प्रसिद्ध कथावाचक एवं आध्यात्मिक वक्ता जया किशोरी ने बच्चों की परवरिश को लेकर माता-पिता को महत्वपूर्ण संदेश दिया। उन्होंने कहा कि बच्चों को हर कदम पर रोकने या दबाव में रखने के बजाय उन्हें समझदार बनाना जरूरी है। बच्चों को अपनी गलतियों से सीखने का अवसर देना चाहिए, ताकि माता-पिता की मौजूदगी में वे गिरें, संभलें और आगे बढ़ना सीख सकें। 19 सितंबर दिन शनिवार को अमर उजाला और हरे कृष्णा ज्वेलर्स के संयुक्त नेतृत्व में वाराणसी में चौकाघाट स्थित गिरिजा देवी सांस्कृतिक संकुल में आयोजित जीवांजलि कार्यक्रम में जया किशोरी ने बदलते पारिवारिक रिश्तों, बच्चों की परवरिश, संस्कार, मोबाइल के बढ़ते प्रभाव और भारतीय परंपराओं पर विस्तार से बात की।
जया किशोरी ने कहा कि आज परिवारों में दो पीढ़ियों के बीच सोच का अंतर बढ़ रहा है। माता-पिता को लगता है कि उन्होंने जीवन में अधिक अनुभव हासिल किया है, जबकि बच्चों को लगता है कि उनका समय और उनकी सोच सबसे बेहतर है। यही अंतर कई बार बातचीत को समाधान की जगह विवाद में बदल देता है। उन्होंने कहा कि माता-पिता और बच्चों के बीच संवाद की दूरी तभी खत्म हो सकती है, जब दोनों पक्ष इसके लिए प्रयास करें। बच्चों को हर बात में आदेश देने के बजाय उन पर विश्वास करना चाहिए और उन्हें निर्णय लेने की जिम्मेदारी भी देनी चाहिए।
बच्चों को दें जिम्मेदारी
अपने बचपन का उदाहरण देते हुए जया किशोरी ने बताया कि उनके माता-पिता किसी बात को समझाते समय सीधे यह नहीं कहते थे कि उन्हें क्या करना है। वे परिस्थिति समझाकर कहते थे, ‘तुम समझदार हो, अब तुम बताओ कि क्या सही रहेगा।’ उन्होंने कहा कि जब किसी बच्चे को समझदार कहकर उससे निर्णय पूछा जाता है तो उसमें आत्मविश्वास बढ़ता है और वह जिम्मेदारी महसूस करता है। माता-पिता का उद्देश्य बच्चों को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि उन्हें इतना सक्षम बनाना चाहिए कि वे खुद सही और गलत के बीच अंतर कर सकें।
सख्ती बढ़ेगी तो बच्चे झूठ बोलने लगेंगे
जया किशोरी ने माता-पिता को चेताते हुए कहा कि बच्चों पर जरूरत से ज्यादा सख्ती करने से समस्या कम होने के बजाय बढ़ सकती है। जितनी अधिक सख्ती बढ़ेगी, उतनी ही संभावना है कि बच्चे अपनी बातें छिपाने और झूठ बोलने लगेंगे। उन्होंने कहा कि बच्चों को गलती पर नीचा दिखाने के बजाय सम्मान के साथ समझाना चाहिए। गलती के बाद सीख देना जरूरी है, लेकिन बच्चे की गरिमा बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। सम्मान हर व्यक्ति को अच्छा लगता है और बच्चे भी इससे अलग नहीं हैं।
माता-पिता की मंशा गलत नहीं होती
जया किशोरी ने कहा कि माता-पिता का तरीका कई बार गलत हो सकता है, लेकिन बच्चों की उन्नति की उनकी मंशा गलत नहीं होती। हर मां-बाप चाहते हैं कि उनके बच्चे उनसे बेहतर जीवन जिएं और उनसे अधिक सुख प्राप्त करें। उन्होंने कहा कि माता-पिता अपने अनुभव के आधार पर बच्चों को बेहतर रास्ता दिखाने की कोशिश करते हैं, लेकिन हर जिम्मेदारी माता-पिता नहीं उठा सकते। बच्चों को भी धीरे-धीरे अपनी जिम्मेदारियां संभालना सीखना होगा।
‘जिस गड्ढे में हम गिर चुके, उसमें बच्चे न गिरें’
नई पीढ़ी की सोच पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि बच्चों को लगता है कि उनकी नई सोच होने के कारण उनकी हर बात सही है, लेकिन नई सोच भी एक तरह का प्रयोग है। माता-पिता जीवन में अच्छे और बुरे दोनों अनुभवों से गुजर चुके होते हैं। उन्होंने कहा कि जब माता-पिता किसी बच्चे को किसी रास्ते पर जाने से रोकते हैं तो कई बार उनका उद्देश्य सिर्फ इतना होता है कि जिस गड्ढे में वे खुद गिर चुके हैं, उसमें उनके बच्चे न गिरें। इसलिए बच्चों को माता-पिता की बात को भी उनके अनुभव के नजरिए से समझने की कोशिश करनी चाहिए।
बचपन में दिए संस्कार ज्यादा प्रभावी
जया किशोरी ने कहा कि बच्चों को संस्कार देने का सबसे अच्छा समय बचपन है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जब मिट्टी गीली होती है, तभी उसे मनचाहा आकार दिया जा सकता है। उसी तरह बचपन में दिए गए संस्कार बच्चे के व्यक्तित्व का आधार बनते हैं। उन्होंने कहा कि बच्चों की निगरानी का उद्देश्य केवल यह नहीं होना चाहिए कि वे माता-पिता के सामने अच्छा व्यवहार करें। असली उद्देश्य यह होना चाहिए कि माता-पिता की गैरमौजूदगी में भी बच्चे सही निर्णय लेने में सक्षम हों। उन्होंने बच्चों को किताबों से जोड़ने की जरूरत पर भी जोर दिया। उनके अनुसार, एक अच्छी किताब के माध्यम से व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के वर्षों के अनुभव को कम समय में समझ सकता है। उन्होंने बताया कि उनके माता-पिता ने बचपन में उन्हें शास्त्रों की बातें कहानियों के माध्यम से समझाईं।
बच्चों की मासूमियत को प्रभावित कर रहा मोबाइल
मोबाइल फोन के बढ़ते इस्तेमाल पर जया किशोरी ने कहा कि बच्चों के समय से पहले समझदार होने के लिए केवल उन्हें दोष देना उचित नहीं है। कई बार माता-पिता खुद बच्चों के हाथ में मोबाइल दे देते हैं, ताकि वे व्यस्त रहें और माता-पिता अपने काम या दोस्तों के साथ समय बिता सकें। उन्होंने कहा कि मोबाइल के अत्यधिक इस्तेमाल ने बच्चों की मासूमियत को प्रभावित किया है। इसलिए बच्चों को छोटी उम्र से ही किताबों, कथा, परिवार और भारतीय परंपराओं से जोड़ने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि बच्चों को केवल यह बताना पर्याप्त नहीं है कि उन्हें क्या करना चाहिए। उन्हें यह भी समझाना जरूरी है कि किसी काम के पीछे कारण क्या है। जब बच्चा कारण समझता है, तो उसके लिए सही निर्णय लेना आसान हो जाता है।
आज का युद्ध बाहर नहीं, मन के भीतर है
कार्यक्रम के दौरान जया किशोरी ने लोगों के सवालों के जवाब भी दिए। उन्होंने कहा कि आज का संघर्ष केवल बाहर नहीं है, बल्कि मनुष्य के भीतर भी चल रहा है। तनाव और मानसिक दबाव के बीच व्यक्ति को भीतर से मजबूत होने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि आध्यात्मिक होने का अर्थ केवल कपड़े बदलना या पूजा-पाठ तक सीमित रहना नहीं है। आध्यात्मिकता का वास्तविक अर्थ भीतर से परिवर्तन लाना और जीवन की परिस्थितियां बदलने पर भी स्वयं को मजबूत बनाए रखना है।
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शास्त्र सिखाते हैं जीवन जीने की पद्धति
जया किशोरी ने कहा कि शास्त्र केवल पूजा-पाठ की बातें नहीं बताते, बल्कि जीवन जीने की पद्धति भी सिखाते हैं। वहीं किसी चीज को प्राप्त करने का माध्यम धर्मसम्मत होना चाहिए। उन्होंने कहा कि देश में संविधान है, इसलिए व्यवस्था संविधान के अनुसार चलनी चाहिए, जबकि जीवन के मूल्यों के लिए शास्त्रों से प्रेरणा ली जा सकती है। कार्यक्रम के अंत में दर्शकों की मांग पर जया किशोरी ने भजन ‘किशोरी कुछ ऐसा काम हो जाए...’ प्रस्तुत किया। भजन के दौरान पूरा माहौल भक्तिमय हो गया।