Hariyali Teej : सावन आते ही देशभर में हरियाली तीज की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। चारों तरफ हरियाली, पेड़ों पर पड़ते झूले, हाथों में मेहंदी, हरे रंग के कपड़े, सोलह श्रृंगार और तीज के लोकगीत इस पर्व की पहचान बन चुके हैं।
Hariyali Teej : सावन आते ही देशभर में हरियाली तीज की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। चारों तरफ हरियाली, पेड़ों पर पड़ते झूले, हाथों में मेहंदी, हरे रंग के कपड़े, सोलह श्रृंगार और तीज के लोकगीत इस पर्व की पहचान बन चुके हैं। खासतौर पर सुहागिन महिलाएं पति की लंबी उम्र, सुखी दांपत्य जीवन और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए हरियाली तीज का व्रत रखती हैं। वहीं कुंवारी कन्याएं भी अच्छे जीवनसाथी की कामना से यह व्रत करती हैं। लेकिन सवाल यह है कि आखिर हरियाली तीज की परंपरा शुरू कैसे हुई और सबसे पहले यह व्रत किसने रखा था? चलिए इस लेख बताते हैं
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, हरियाली तीज का संबंध भगवान शिव और माता पार्वती से है। इसे शिव-पार्वती के पुनर्मिलन और माता पार्वती की भक्ति का प्रतीक माना जाता है। हरियाली तीज श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाई जाती है। इसे कई जगह छोटी तीज, श्रावणी तीज और सिंधारा तीज के ना म से भी जाना जाता है।
सबसे पहले किसने रखा था हरियाली तीज का व्रत?
पौराणिक मान्यता के अनुसार, हरियाली तीज का व्रत सबसे पहले माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए रखा था। कथा के अनुसार, माता पार्वती भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त करना चाहती थीं। इसके लिए उन्होंने कठोर तपस्या की। मान्यता है कि उनकी तपस्या इतनी कठिन थी कि उन्होंने अन्न-जल तक का त्याग कर दिया था। लंबे समय तक भगवान शिव की आराधना और ध्यान में लीन रहकर उन्होंने अपने संकल्प को पूरा करने का प्रयास किया। एक प्रचलित कथा में बताया जाता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए अनेक कठिनाइयां सहन कीं। उनकी तपस्या और अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और उनकी इच्छा स्वीकार की। इसी वजह से तीज के व्रत को पति-पत्नी के बीच प्रेम, समर्पण और अटूट वैवाहिक संबंध का प्रतीक माना जाता है।
माता पार्वती की तपस्या से जुड़ी है कथा
धार्मिक कथा में भगवान शिव स्वयं माता पार्वती को उनके पूर्व जन्म और तपस्या की याद दिलाते हैं। मान्यता है कि माता पार्वती ने हिमालय पर भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तप किया था। इस दौरान उन्होंने भोजन तक का त्याग किया और कठिन परिस्थितियों में भी अपनी साधना जारी रखी।कहा जाता है कि माता पार्वती का संकल्प इतना मजबूत था कि उन्होंने मौसम और दूसरी कठिनाइयों की भी परवाह नहीं की। उनकी इसी कठोर तपस्या से भगवान शिव प्रसन्न हुए।मान्यता है कि तृतीया तिथि पर माता पार्वती ने भगवान शिव की आराधना और व्रत किया था। तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें मनचाहा वर प्रदान किया। इसी कथा को तीज व्रत की धार्मिक पृष्ठभूमि से जोड़ा जाता है।
हरियाली तीज नाम क्यों पड़ा?
हरियाली तीज सावन के महीने में आती है। सावन बारिश और हरियाली का महीना है। बारिश के बाद धरती हरे रंग की चादर ओढ़ लेती है। पेड़-पौधों पर नई हरियाली आती है और वातावरण बेहद खूबसूरत हो जाता है।इसी प्राकृतिक हरियाली के कारण सावन की तीज को हरियाली तीज कहा जाने लगा। इस पर्व में प्रकृति और नारी जीवन, दोनों का उत्सव देखने को मिलता है।हरियाली तीज के दौरान महिलाएं हरे रंग की साड़ी या लहरिया पहनती हैं, हाथों में मेहंदी लगाती हैं, चूड़ियां पहनती हैं और सोलह श्रृंगार करती हैं। कई इलाकों में पेड़ों पर झूले लगाए जाते हैं और महिलाएं पारंपरिक तीज गीत गाते हुए झूला झूलती हैं।
सुहागिन महिलाओं के लिए क्यों खास है तीज?
हरियाली तीज को सुहागिन महिलाओं के लिए विशेष पर्व माना जाता है। महिलाएं इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा कर पति की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी दांपत्य जीवन की कामना करती हैं।कई महिलाएं निर्जला व्रत भी रखती हैं, हालांकि व्रत रखने का तरीका परंपरा, स्वास्थ्य और व्यक्तिगत क्षमता के अनुसार अलग-अलग हो सकता है। पूजा के दौरान शिव-पार्वती की आराधना की जाती है और तीज की कथा सुनी जाती है।
क्या कुंवारी लड़कियां भी रखती हैं हरियाली तीज का व्रत ?
हरियाली तीज सिर्फ विवाहित महिलाओं का पर्व नहीं है। कई जगह कुंवारी कन्याएं भी इस दिन व्रत रखती हैं। मान्यता है कि माता पार्वती ने जिस तरह भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए तपस्या की थी, उसी तरह कन्याएं भी अच्छे और मनचाहे जीवनसाथी की कामना से तीज का व्रत करती हैं। यही कारण है कि हरियाली तीज को विवाह और दांपत्य सुख से जोड़कर देखा जाता है। यह भी पढ़ें- Shivling Parikrama: शिवलिंग की परिक्रमा पूरी क्यों नहीं की जाती? जानें धार्मिक मान्यता और इसका कारण
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)