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Govardhan Puja: गोवर्धन पूजा पर क्यों लगाया जाता है अन्नकूट का भोग? जानें धार्मिक मान्यता

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
नीरज के. पटेल
सार

Annakut Festival: अन्नकूट का भोग केवल भगवान को भोजन अर्पित करने की परंपरा नहीं है, बल्कि यह अन्न के प्रति सम्मान और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का भी प्रतीक है। 

Annakut Festival
Annakut Puja Tradition: हिंदू धर्म में गोवर्धन पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। दिवाली के अगले दिन यानी कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को गोवर्धन पूजा का त्योहार मनाया जाता है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण और गोवर्धन पर्वत की पूजा की जाती है। गोवर्धन पूजा को अन्नकूट पर्व के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन भगवान कृष्ण को तरह-तरह के पकवानों और मिठाइयों का भोग लगाया जाता है। 

धार्मिक मान्यता है कि अन्नकूट का भोग लगाने से भगवान श्रीकृष्ण प्रसन्न होते हैं और भक्तों के घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि गोवर्धन पूजा पर अन्नकूट का भोग लगाने की परंपरा कैसे शुरू हुई? आइए जानते हैं इसके पीछे की पौराणिक कथा और धार्मिक महत्व।

अन्नकूट का क्या अर्थ होता है?

अन्नकूट दो शब्दों से मिलकर बना है। इसमें अन्न का अर्थ भोजन और कूट का अर्थ पहाड़ या ढेर होता है। यानी अन्नकूट का अर्थ है तरह-तरह के खाद्य पदार्थों का बड़ा ढेर। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण को अनेक प्रकार के पकवान, मिठाइयां, सब्जियां, दाल, चावल और अन्य व्यंजनों का भोग लगाया जाता है। कई मंदिरों में इस अवसर पर छप्पन भोग भी तैयार किया जाता है। इसके बाद भगवान को भोग अर्पित करके प्रसाद भक्तों के बीच बांटा जाता है। मान्यता है कि अन्नकूट का भोग लगाने से घर में अन्न की कमी नहीं होती और परिवार पर भगवान कृष्ण की कृपा बनी रहती है।

क्यों लगाया जाता है अन्नकूट का भोग?

पौराणिक कथा के अनुसार, द्वापर युग में ब्रज के लोग वर्षा के देवता इंद्र की पूजा किया करते थे। उनका मानना था कि इंद्र देव की कृपा से वर्षा होती है और अच्छी फसल पैदा होती है। एक बार भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को समझाया कि उन्हें गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए, क्योंकि यह पर्वत उन्हें पशुओं के लिए चारा, जल और जीवन के लिए कई जरूरी चीजें प्रदान करता है। भगवान कृष्ण की बात मानकर ब्रजवासियों ने इंद्र देव की पूजा के बजाय गोवर्धन पर्वत की पूजा की। इस अवसर पर उन्होंने तरह-तरह के पकवान बनाकर गोवर्धन पर्वत को अर्पित किए। भगवान कृष्ण ने भी इस भोग को स्वीकार किया।

कहा जाता है कि इससे क्रोधित होकर इंद्र देव ने ब्रज में भयंकर बारिश शुरू कर दी। तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठा लिया और सभी ब्रजवासियों को उसके नीचे शरण दी। लगातार सात दिनों तक भगवान ने पर्वत को उठाए रखा और सभी की रक्षा की। अंत में इंद्र देव को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने भगवान कृष्ण से क्षमा मांगी।

तभी से शुरू हुई अन्नकूट भोग की परंपरा

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गोवर्धन पर्वत की पूजा के दौरान ब्रजवासियों ने भगवान कृष्ण को तरह-तरह के पकवानों का भोग लगाया था। इसी घटना की याद में हर साल गोवर्धन पूजा के दिन अन्नकूट का आयोजन किया जाता है। इस दिन मंदिरों में विशेष रूप से अन्नकूट तैयार किया जाता है और भगवान श्रीकृष्ण को अर्पित किया जाता है।

अन्नकूट भोग का धार्मिक महत्व

अन्नकूट का भोग केवल भगवान को भोजन अर्पित करने की परंपरा नहीं है, बल्कि यह अन्न के प्रति सम्मान और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का भी प्रतीक है। हिंदू धर्म में अन्न को भगवान का स्वरूप माना गया है। इसलिए भोजन का सम्मान करना और जरूरतमंदों को भोजन कराना पुण्य का कार्य माना जाता है। मान्यता है कि गोवर्धन पूजा के दिन भगवान कृष्ण को अन्नकूट का भोग लगाने से परिवार में सुख-शांति और खुशहाली आती है। इस दिन प्रसाद बांटने और गरीबों को भोजन कराने का भी विशेष महत्व है। यह पर्व हमें सिखाता है कि प्रकृति, अन्न और पशुधन हमारे जीवन के आधार हैं और हमें हमेशा इनके प्रति कृतज्ञ रहना चाहिए।

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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।

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