Vishwakarma Puja: विश्वकर्मा पूजा हर साल कन्या संक्रांति के दिन श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जाती है। भगवान विश्वकर्मा को देवताओं का शिल्पकार और दिव्य निर्माण कला का जनक माना गया है। मान्यता है कि उन्होंने देवताओं के लिए भव्य महलों, अस्त्र-शस्त्रों और कई दिव्य नगरों का निर्माण किया था। यही वजह है कि इस दिन कारखानों, कार्यस्थलों, दुकानों और निर्माण से जुड़े औजारों की पूजा की जाती है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भगवान विश्वकर्मा की पूजा की परंपरा आखिर कैसे शुरू हुई? इसके पीछे कौन सी पौराणिक कथा जुड़ी है? आइए जानते हैं।
देवताओं के शिल्पकार हैं भगवान विश्वकर्मा
पौराणिक मान्यताओं में भगवान विश्वकर्मा को सृष्टि का महान शिल्पकार बताया गया है। उन्हें वास्तुकला, निर्माण कला और शिल्प विद्या का ज्ञाता माना जाता है। धार्मिक ग्रंथों में उनके द्वारा देवताओं के लिए अनेक दिव्य भवनों और नगरों के निर्माण का वर्णन मिलता है। मान्यता है कि भगवान विश्वकर्मा ने देवताओं के लिए ऐसे भवन और नगर बनाए, जिनकी सुंदरता और भव्यता अद्भुत थी। इसी कारण उन्हें देवताओं का वास्तुकार और शिल्पकार कहा जाता है। उनके सम्मान में विश्वकर्मा पूजा की परंपरा चली आ रही है।
स्वर्ग लोक के निर्माण से जुड़ी कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान विश्वकर्मा ने देवताओं के लिए स्वर्ग लोक को सुंदर और भव्य रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्होंने देवताओं के रहने के लिए दिव्य भवनों का निर्माण किया। इन भवनों में सुंदर वास्तुकला के साथ-साथ कई प्रकार की अद्भुत कलाकृतियां भी थीं। भगवान विश्वकर्मा को केवल भवन निर्माण तक सीमित नहीं माना जाता। मान्यता है कि उन्होंने देवताओं के लिए कई दिव्य वस्तुओं और अस्त्र-शस्त्रों का भी निर्माण किया था। इसी वजह से निर्माण और शिल्प कार्य से जुड़े लोग उन्हें अपना आराध्य मानते हैं।
लंका के निर्माण की मान्यता
भगवान विश्वकर्मा से जुड़ी एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा सोने की लंका से भी जुड़ी है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, लंका का निर्माण भगवान विश्वकर्मा ने किया था। कहा जाता है कि उन्होंने लंका को अत्यंत भव्य और सुंदर बनाया था। बाद में यह लंका रावण के अधिकार में आई। कुछ पौराणिक कथाओं में बताया जाता है कि भगवान शिव के कहने पर भगवान विश्वकर्मा ने लंका का निर्माण किया था। लंका की भव्यता ऐसी थी कि उसे सोने की लंका के नाम से जाना जाने लगा।
द्वारका नगरी से भी संबंध
भगवान विश्वकर्मा का संबंध भगवान श्रीकृष्ण की नगरी द्वारका के निर्माण से भी बताया जाता है। मान्यता है कि जब श्रीकृष्ण मथुरा से समुद्र के किनारे आए, तब उनके लिए एक भव्य नगरी का निर्माण भगवान विश्वकर्मा ने किया था। पौराणिक कथा के अनुसार, समुद्र से भूमि प्राप्त होने के बाद भगवान विश्वकर्मा ने वहां द्वारका नगरी का निर्माण किया। द्वारका को सुंदर महलों, भव्य भवनों और व्यवस्थित मार्गों से सजाया गया था। इस कथा के कारण भी भगवान विश्वकर्मा को महान वास्तुकार के रूप में पूजा जाता है।
दिव्य अस्त्र-शस्त्र बनाने की मान्यता
भगवान विश्वकर्मा को दिव्य अस्त्र-शस्त्रों का निर्माता भी माना गया है। पौराणिक कथाओं में उनके द्वारा देवताओं के लिए कई शक्तिशाली अस्त्रों का निर्माण किए जाने का उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि भगवान इंद्र का प्रसिद्ध वज्र भी भगवान विश्वकर्मा ने बनाया था। इसके लिए ऋषि दधीचि की अस्थियों का उपयोग किए जाने की कथा प्रचलित है। इसके अलावा सूर्य देव के तेज को कम करने के बाद उससे दिव्य अस्त्रों के निर्माण की कथा भी भगवान विश्वकर्मा से जुड़ी हुई है।
इन्हीं कारणों से शुरू हुई पूजा की परंपरा
भगवान विश्वकर्मा को निर्माण, शिल्प और तकनीकी कला का देवता माना जाता है। प्राचीन समय में शिल्पकार, कारीगर और निर्माण कार्य से जुड़े लोग उन्हें विशेष रूप से पूजते थे। धीरे-धीरे यह परंपरा अन्य कार्यक्षेत्रों तक भी फैल गई। विश्वकर्मा पूजा के दिन मशीनों, औजारों, वाहनों और काम में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों की साफ-सफाई करके उनकी पूजा की जाती है। कारखानों और औद्योगिक संस्थानों में भी इस दिन विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है।
कन्या संक्रांति पर होती है पूजा
विश्वकर्मा पूजा सूर्य के कन्या राशि में प्रवेश करने के समय मनाई जाती है। इसे कन्या संक्रांति भी कहा जाता है। इसी दिन भगवान विश्वकर्मा की पूजा करने की परंपरा है। इस अवसर पर भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित कर विधि-विधान से पूजा की जाती है। इसके बाद औजारों, मशीनों और कार्यस्थल में इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं की पूजा की जाती है। मान्यता है कि भगवान विश्वकर्मा की आराधना करने से कार्य में कुशलता और सफलता का आशीर्वाद मिलता है।
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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)