Krishna Janmashtami: भगवान श्रीकृष्ण जब गोकुल में नंद बाबा और यशोदा मैया के घर रहने लगे, तब उनकी बाल लीलाएं धीरे-धीरे सभी को आकर्षित करने लगीं, लेकिन कंस को जब यह पता चला कि देवकी का आठवां पुत्र जीवित है तो उसकी चिंता बढ़ गई।
Krishna Janmashtami: श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं सुनाई और पढ़ी जाती हैं। इनमें शकटासुर वध की कथा विशेष रूप से वर्णित है। यह प्रसंग उस समय का है, जब कंस को यह भय सताने लगा था कि देवकी का आठवां पुत्र ही उसके अंत का कारण बनेगा। श्रीकृष्ण के जन्म के बाद जब उन्हें गोकुल पहुंचाया गया, तब कंस लगातार उन्हें मारने के लिए अलग-अलग असुरों को भेजने लगा। इन्हीं में एक था शकटासुर, जिसने बाल गोपाल को मारने के लिए एक अनोखा रूप धारण किया था।
भागवत पुराण में वर्णित इस प्रसंग के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण जब गोकुल में नंद बाबा और यशोदा मैया के घर रहने लगे, तब उनकी बाल लीलाएं धीरे-धीरे सभी को आकर्षित करने लगीं, लेकिन कंस को जब यह पता चला कि देवकी का आठवां पुत्र जीवित है और गोकुल में नंद के घर पल रहा है, तो उसकी चिंता बढ़ गई। उसने श्रीकृष्ण का वध करने के लिए कई असुरों को भेजा।
शकटासुर को मिला श्रीकृष्ण के वध का आदेश
कंस ने जिस शकटासुर को श्रीकृष्ण को मारने के लिए भेजा था, वह एक शक्तिशाली असुर था। पौराणिक कथा के अनुसार, शकटासुर ने अपनी मायावी शक्ति से एक भारी-भरकम शकट यानी बैलगाड़ी का रूप धारण कर लिया। उसका उद्देश्य था कि बालकृष्ण को इस तरह कुचल दिया जाए कि किसी को उसके असुर होने का पता भी न चले। उस समय गोकुल में नंद बाबा के घर किसी विशेष अवसर पर उत्सव का वातावरण था। घर में बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे और यशोदा मैया भी विभिन्न कार्यों में व्यस्त थीं। बालकृष्ण उस समय बहुत छोटे थे। उन्हें एक गाड़ी के नीचे सुला दिया गया था। उस गाड़ी पर घर-गृहस्थी का सामान रखा हुआ था।
शकटासुर ने धारण किया गाड़ी का रूप
शकटासुर उसी गाड़ी में समा गया और अपने असली स्वरूप को छिपाकर बालकृष्ण के पास पहुंच गया। वह इस इंतजार में था कि जैसे ही अवसर मिलेगा, वह भारी गाड़ी को बालकृष्ण के ऊपर गिराकर उनका वध कर देगा। कथा के अनुसार, बालकृष्ण उस समय अपनी बाल लीलाओं में मग्न थे। कुछ देर बाद उन्हें भूख लगी और उन्होंने रोना शुरू कर दिया। यशोदा मैया दूसरे कामों में व्यस्त थीं, इसलिए तत्काल उनके पास नहीं पहुंच सकीं। बालकृष्ण ने अपने छोटे-छोटे पैरों को ऊपर की ओर उठाना शुरू किया।
किसी को नहीं था बालकृष्ण की शक्ति का अनुमान
गोकुल के लोगों के लिए श्रीकृष्ण उस समय केवल नंद बाबा और यशोदा मैया के छोटे से पुत्र थे। कोई यह कल्पना भी नहीं कर सकता था कि इतने छोटे बालक में असाधारण शक्ति है। दूसरी ओर शकटासुर इसी बात का फायदा उठाकर बालकृष्ण को मारने की प्रतीक्षा कर रहा था, तभी बालकृष्ण ने खेल-खेल में अपने पैर से उस गाड़ी को छू दिया। उनके पैर का स्पर्श होते ही भारी शकट उलट गया। उस पर रखा सारा सामान नीचे गिर पड़ा और शकट के टुकड़े-टुकड़े हो गए।
शकटासुर का हुआ संहार
जैसे ही गाड़ी उलटी, उसमें छिपा शकटासुर अपने वास्तविक असुर स्वरूप में आ गया। श्रीकृष्ण के पैर के स्पर्श से उसकी मायावी शक्ति समाप्त हो गई और उसका अंत हो गया। गोकुल में मौजूद लोग यह देखकर स्तब्ध रह गए कि इतनी भारी गाड़ी आखिर अचानक कैसे टूटकर गिर गई। जब यशोदा मैया को इस घटना का पता चला तो वह तुरंत बालकृष्ण के पास पहुंचीं। उन्होंने अपने लाडले को उठाकर गोद में लिया और उनकी कुशलता देखी। गोकुल के लोगों के लिए यह घटना बेहद आश्चर्यजनक थी। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि आखिर इतनी भारी गाड़ी बालकृष्ण के छोटे से पैर के स्पर्श मात्र से कैसे पलट गई।
गोकुलवासियों ने मानी दैवी शक्ति की बात
शकट के टूटने और उसके भीतर से असुर के प्रकट होने की घटना ने गोकुलवासियों को हैरान कर दिया। कथा में बताया गया है कि वहां मौजूद कुछ बालकों ने कहा कि श्रीकृष्ण ने अपने पैर से गाड़ी को मारा था और उसी के बाद वह उलट गई। हालांकि बड़े लोगों के लिए इस बात पर विश्वास करना आसान नहीं था कि एक छोटा बच्चा इतनी भारी गाड़ी को केवल पैर से पलटा सकता है। यशोदा मैया ने बालकृष्ण की रक्षा के लिए उन्हें गोद में लेकर उनकी नजर उतारी और भगवान का स्मरण किया। गोकुल में मौजूद लोगों ने भी बालकृष्ण की कुशलता के लिए मंगलकामना की।
शकटासुर वध के पीछे कंस की साजिश
शकटासुर वध की कथा का संबंध सीधे कंस की उस लगातार चल रही साजिश से जुड़ा है, जिसमें वह श्रीकृष्ण को समाप्त करने के लिए एक के बाद एक असुरों को गोकुल भेज रहा था। इससे पहले भी कंस ने पूतना को श्रीकृष्ण के पास भेजा था। बाद में तृणावर्त सहित कई अन्य असुर भी बालकृष्ण को मारने के उद्देश्य से गोकुल पहुंचे। शकटासुर ने भी इसी उद्देश्य से गोकुल में प्रवेश किया था, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण ने बाल रूप में ही उसका अंत कर दिया। इस घटना के समय श्रीकृष्ण की आयु बहुत कम थी, फिर भी उनकी बाल लीला में उनकी दिव्य शक्ति का स्वरूप दिखाई देता है।
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बाल गोपाल की बाल लीला में छिपा था असुर का अंत
शकटासुर वध की कथा श्रीकृष्ण की उन बाल लीलाओं में शामिल है, जिनमें भगवान ने सामान्य बालक की तरह व्यवहार करते हुए असुरों का संहार किया। यहां भी उन्होंने किसी अस्त्र-शस्त्र का प्रयोग नहीं किया। बालकृष्ण ने केवल अपने पैर के स्पर्श से उस विशाल शकट को उलट दिया और उसके भीतर छिपे शकटासुर का अंत कर दिया। श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन भागवत पुराण सहित वैष्णव परंपरा के ग्रंथों में मिलता है। शकटासुर वध का प्रसंग विशेष रूप से इस कारण महत्वपूर्ण माना जाता है कि इसमें भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप और उनकी दिव्य शक्ति दोनों का वर्णन एक साथ मिलता है।
जन्माष्टमी पर सुनाई जाती है शकटासुर वध की कथा
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर भगवान के जन्म से जुड़ी कथाओं के साथ उनकी बाल लीलाओं का भी पाठ किया जाता है। इसी क्रम में शकटासुर वध की कथा सुनाई जाती है। इसमें बताया जाता है कि कैसे कंस की ओर से भेजा गया असुर मायावी गाड़ी का रूप धारण करके नंद भवन पहुंचा और बालकृष्ण को मारने की योजना बनाई, लेकिन भगवान ने अपने पैर के स्पर्श मात्र से उसका अंत कर दिया।
(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)