facebook pixel
विज्ञापन
Home  dharm  festivals  kali jayanti kab manayi jayegi know date shubh muhurat dharmik mahatva puja vidhi vrat katha

Kali Jayanti: कब मनाई जाएगी काली जयंती? जानें तिथि, शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Kali Jayanti: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां काली को दस महाविद्याओं में प्रथम महाविद्या माना गया है। देवी भागवत पुराण और अन्य शाक्त परंपराओं में देवी के विभिन्न स्वरूपों का वर्णन मिलता है। 

Kali Jayanti
Kali Jayanti: हिंदू धर्म में मां काली को शक्ति के उग्र और प्रभावशाली स्वरूप के रूप में पूजा जाता है। देवी काली की आराधना विशेष रूप से साधना, शक्ति उपासना और तंत्र परंपरा से जुड़ी मानी जाती है। हर साल श्रावण मास की कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि को काली जयंती मनाई जाती है। इस दिन भक्त मां काली की विधि-विधान से पूजा करते हैं और उनके स्वरूप का ध्यान करते हैं। साल 2026 में काली जयंती किस दिन मनाई जाएगी? इस दिन कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि कब से कब तक रहेगी और पूजा के लिए कौन सा समय शुभ रहेगा? आइए जानते हैं काली जयंती की तिथि, शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व...

कब है काली जयंती

पंचांग के अनुसार, साल 2026 में काली जयंती 4 सितंबर, शुक्रवार को मनाई जाएगी। इस दिन श्रावण मास की कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि रहेगी। पंचांग के अनुसार कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 4 सितंबर को रात 2 बजकर 25 मिनट से शुरू होगी और 5 सितंबर की रात 12 बजकर 13 मिनट तक रहेगी। 

निशिता काल में होगी पूजा

मां काली की उपासना में रात्रि का समय विशेष माना जाता है। काली जयंती पर निशिता काल में पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। निशिता काल लगभग रात 11 बजकर 57 मिनट से 5 सितंबर की रात 12 बजकर 43 मिनट तक रहेगा। काली जयंती पर साधक और भक्त इसी रात्रिकालीन समय में मां काली की पूजा, मंत्र जाप और ध्यान करते हैं। विशेष रूप से मां काली की साधना करने वाले लोगों के लिए यह तिथि महत्वपूर्ण मानी जाती है।

 

Goddess Kali

दस महाविद्याओं में प्रथम हैं मां काली

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां काली को दस महाविद्याओं में प्रथम महाविद्या माना गया है। देवी भागवत पुराण और अन्य शाक्त परंपराओं में देवी के विभिन्न स्वरूपों का वर्णन मिलता है। मां काली का स्वरूप अत्यंत उग्र माना गया है और उन्हें भगवान शिव की शक्ति के रूप में भी पूजा जाता है। मां काली के स्वरूप का वर्णन करते हुए उन्हें काले वर्ण वाली देवी बताया गया है। इसी कारण उनका नाम काली पड़ा। शाक्त परंपरा में मां काली की उपासना को विशेष स्थान प्राप्त है और देश के अलग-अलग हिस्सों में उनके मंदिरों में इस दिन विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।

मां काली के प्रकट होने की धार्मिक कथा

पौराणिक कथाओं में मां काली के प्राकट्य से जुड़ी कई कथाएं मिलती हैं। देवी के उग्र स्वरूप का संबंध असुरों के संहार और धर्म की रक्षा से जोड़ा गया है। देवी के इसी स्वरूप में उन्हें दुष्ट शक्तियों का विनाश करने वाली शक्ति के रूप में पूजा जाता है। धार्मिक ग्रंथों में मां काली के रौद्र स्वरूप का वर्णन विशेष रूप से मिलता है। देवी का यह स्वरूप इतना प्रचंड माना गया है कि देवता भी उनकी शक्ति का स्मरण करते हैं। मां काली की आराधना में इसी उग्र शक्ति और दिव्य स्वरूप का ध्यान किया जाता है।

 

Kali Jayanti

काली जयंती पर क्यों होती है मां काली की पूजा

काली जयंती मां काली की आराधना के लिए विशेष तिथि मानी जाती है। इस दिन भक्त मां काली के मंदिरों में दर्शन करते हैं और घर पर भी उनकी पूजा करते हैं। मां काली को लाल फूल, फल, नैवेद्य आदि अर्पित किए जाते हैं। कई स्थानों पर इस दिन विशेष अनुष्ठान और रात्रि पूजा भी की जाती है। शाक्त परंपरा में काली जयंती की रात को साधना के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। साधक इस अवसर पर मां काली के मंत्रों का जाप और ध्यान करते हैं। हालांकि तांत्रिक साधनाओं के अपने अलग नियम होते हैं, इसलिए ऐसी साधना योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही करने की परंपरा है।

मां काली के किन स्वरूपों की होती है पूजा

मां काली को अलग-अलग नामों और स्वरूपों से पूजा जाता है। दक्षिणा काली, श्मशान काली, भद्रकाली और महाकाली उनके प्रमुख स्वरूपों में माने जाते हैं। अलग-अलग परंपराओं में देवी के स्वरूप और पूजा विधि में अंतर देखने को मिलता है। दस महाविद्याओं की परंपरा में मां काली का स्थान सबसे पहले माना गया है। इसलिए काली जयंती को शाक्त साधना और देवी उपासना की महत्वपूर्ण तिथि माना जाता है।

 

Goddess Kali

काली जयंती और काली पूजा में अंतर

काली जयंती और काली पूजा को कई बार एक ही पर्व समझ लिया जाता है, लेकिन दोनों की तिथि अलग होती है। काली जयंती श्रावण मास की कृष्ण पक्ष अष्टमी को मनाई जाती है, जबकि प्रसिद्ध काली पूजा दीपावली के समय कार्तिक अमावस्या की रात को मनाई जाती है। साल 2026 में काली जयंती 4 सितंबर को है, जबकि काली पूजा 8 नवंबर को होगी, इसलिए दोनों पर्वों की पूजा तिथि और धार्मिक परंपरा को अलग-अलग समझना जरूरी है।

काली जयंती पर क्या करें

काली जयंती के दिन सुबह स्नान करके मां काली का स्मरण करना शुभ माना जाता है। इसके बाद मां काली की प्रतिमा या चित्र के सामने दीपक जलाकर पूजा की जाती है। मां को लाल फूल, फल और नैवेद्य अर्पित किया जाता है। भक्त मां काली के मंत्रों का जाप करते हैं और उनकी आराधना करते हैं। जो लोग रात्रि पूजा करना चाहते हैं, वे निशिता काल में मां काली की पूजा कर सकते हैं। विशेष साधना करने वाले साधक अपनी परंपरा और गुरु द्वारा बताए गए नियमों के अनुसार पूजा करते हैं।

काली जयंती का धार्मिक महत्व

धार्मिक दृष्टि से काली जयंती मां काली की शक्ति और उनके उग्र स्वरूप की आराधना से जुड़ी महत्वपूर्ण तिथि है। मां काली को दस महाविद्याओं में प्रथम स्थान प्राप्त है और शाक्त परंपरा में उनकी पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। इस दिन मां के स्वरूप का ध्यान, पूजा और मंत्र जाप करने की परंपरा है। काली जयंती पर विशेष रूप से रात्रि के समय मां काली की आराधना की जाती है। 


यह भी पढ़ें-

Shivling Parikrama: शिवलिंग की परिक्रमा पूरी क्यों नहीं की जाती? जानें धार्मिक मान्यता और इसका कारण 

Shivling Puja: शिवलिंग पर क्यों चढ़ाया जाता है कच्चा दूध? जानिए धार्मिक महत्व 

Sawan 2026: सावन में शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने का सही नियम क्या है? जानिए धार्मिक मान्यता 

(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।) 

धार्मिक कहानियां सुनने और पढ़ने के लिए हमारे WhatsApp चैनल से जुड़ें।

WhatsApp Channel