Balaram Jayanti: भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई और बल के स्वरूप माने जाने वाले भगवान बलराम की पूजा का विशेष महत्व है। बलराम जी को हलधर, बलदाऊ और बलभद्र जैसे नामों से भी जाना जाता है। मान्यता है कि उनकी पूजा और व्रत कथा के पाठ से जीवन में शक्ति, सुख-शांति और समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है। बलराम जयंती के अवसर पर भक्त भगवान बलराम का पूजन करने के साथ उनकी जन्म कथा का पाठ भी करते हैं, लेकिन क्या आपको पता है कि भगवान बलराम का जन्म किस तरह हुआ और उन्हें संकर्षण नाम क्यों मिला? आइए जानते हैं बलराम जयंती की पावन व्रत कथा।
देवकी के गर्भ में आए बलराम
पौराणिक कथा के अनुसार, मथुरा का राजा कंस अपनी बहन देवकी और उनके पति वसुदेव से बहुत भयभीत रहता था। आकाशवाणी में कंस को बताया गया था कि देवकी की आठवीं संतान उसका वध करेगी। इसके बाद कंस ने देवकी और वसुदेव को कारागार में बंद कर दिया। कंस देवकी की संतानों को जन्म लेते ही मारने लगा। इसी बीच भगवान विष्णु ने अपनी योगमाया की शक्ति से देवकी के गर्भ में स्थित सातवें गर्भ को रोहिणी के गर्भ में पहुंचा दिया। रोहिणी उस समय नंद बाबा के यहां रह रही थीं। गर्भ के इस प्रकार एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने के कारण ही भगवान बलराम का एक नाम ‘संकर्षण’ पड़ा। श्रीगर्ग संहिता में भगवान बलराम के जन्म का यह प्रसंग विस्तार से मिलता है।
रोहिणी के घर हुआ जन्म
जब भगवान बलराम का जन्म हुआ तो उनके प्रकट होने से पूरे वातावरण में आनंद छा गया। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भाद्रपद शुक्ल षष्ठी के दिन रोहिणी के गर्भ से भगवान बलराम का प्राकट्य हुआ। उन्हें भगवान विष्णु के शेषनाग स्वरूप से भी जोड़ा जाता है। भगवान बलराम के हाथ में हल और मूसल को उनका प्रमुख आयुध माना जाता है। इसी कारण उन्हें हलधर और हलायुध भी कहा जाता है। वे श्रीकृष्ण के बड़े भाई होने के साथ-साथ उनकी अनेक लीलाओं में उनके साथ रहे।
बलराम जी के जन्म से छाया आनंद
मान्यता है कि भगवान बलराम के प्राकट्य के बाद व्रज में उत्सव का वातावरण बन गया। नंद बाबा के घर और आसपास रहने वाले लोगों में खुशी छा गई। बालक बलराम अपनी शक्ति, सरल स्वभाव और बाल लीलाओं के कारण सभी के प्रिय बन गए। आगे चलकर बलराम जी ने श्रीकृष्ण के साथ अनेक लीलाएं कीं। उन्होंने कई दैत्यों का संहार कर व्रजवासियों की रक्षा की। उनके पराक्रम के कारण ही उन्हें बल और शक्ति का प्रतीक माना जाता है।
ऐसे पढ़ें बलराम जयंती की कथा
बलराम जयंती के दिन सुबह स्नान करके भगवान बलराम का स्मरण करें। पूजा स्थान पर भगवान बलराम की तस्वीर या प्रतिमा स्थापित करें। इसके बाद दीप जलाकर उन्हें फल, फूल और नैवेद्य अर्पित करें। पूजन के बाद श्रद्धा के साथ भगवान बलराम की जन्म कथा का पाठ करना शुभ माना जाता है। कथा पढ़ते समय भगवान बलराम के नामों का स्मरण करें और परिवार की सुख-शांति की कामना करें। धार्मिक मान्यता के अनुसार, व्रत और पूजन के साथ कथा का श्रवण या पाठ करने से पूजा का फल प्राप्त होता है।
कथा का फल
धार्मिक मान्यता है कि भगवान बलराम की कथा का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से मनुष्य को मानसिक और आध्यात्मिक बल मिलता है। परिवार में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहे, इसके लिए भी भक्त बलराम जी का पूजन करते हैं। बलराम जयंती से जुड़ी परंपराओं में संतान की सुख-समृद्धि और परिवार के कल्याण की कामना भी की जाती है। कई क्षेत्रों में बलराम जयंती से जुड़ा हल षष्ठी या हलछठ का पर्व भी संतान के कल्याण और परिवार की खुशहाली से जुड़ा माना जाता है।
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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)