Bhagvan Shiv : क्या आपने कभी सोचा है कि जिस भगवान को पूरे संसार का पालनहार माना जाता है, उन्हें गुलाब, चमेली या कमल जैसे सुंदर और सुगंधित फूलों की बजाय धतूरा और आक जैसे जहरीले और कांटेदार पौधे क्यों प्रिय हैं
Bhagvan Shiv: क्या आपने कभी सोचा है कि जिस भगवान को पूरे संसार का पालनहार माना जाता है, उन्हें गुलाब, चमेली या कमल जैसे सुंदर और सुगंधित फूलों की बजाय धतूरा और आक जैसे जहरीले और कांटेदार पौधे क्यों प्रिय हैं आखिर इन साधारण दिखने वाले पौधों में ऐसा क्या रहस्य छिपा है कि आज भी लाखों श्रद्धालु सावन के महीने में इन्हें भगवान शिव पर अर्पित करते हैं इस सवाल का जवाब सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि एक ऐसी कथा में छिपा है जो हमें जीवन का बहुत बड़ा संदेश देती है। आइए इस लेख में जानते हैं।
धतूरा और आक भगवान शिव को क्यों प्रिय हैं?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब देवताओं और असुरों ने समुद्र मंथन किया, तब अमृत से पहले एक भयानक विष निकला। इस विष का नाम था हलाहल। यह इतना घातक था कि उसकी गर्मी और जहरीली गैसों से तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। देवता, ऋषि और मनुष्य सभी भयभीत हो गए। किसी के पास इस विष को रोकने का उपाय नहीं था।तब सभी देवता भगवान शिव की शरण में पहुंचे।भगवान शिव ने संसार की रक्षा के लिए बिना एक पल सोचे उस विष को अपने हाथों में लिया और पी गए। लेकिन माता पार्वती ने तुरंत उनका गला पकड़ लिया, जिससे वह विष उनके कंठ से नीचे नहीं उतर पाया। इसी कारण भगवान शिव का कंठ नीला पड़ गया और वे नीलकंठ कहलाए।
हलाहल विष उनके गले में तो रुक गया, पर उसकी अग्नि पूरे शरीर में फैलने लगी। विष की तपन इतनी भयंकर थी कि देवता भी उसे शांत नहीं कर पा रहे थे। सभी चिंतित थे कि आखिर अब भगवान शिव की यह पीड़ा कैसे दूर होगी? तभी ऋषियों ने जंगलों में ऐसे पौधों की खोज शुरू की जिनमें विष को शांत करने की क्षमता हो।काफी खोज के बाद उन्हें दो विशेष पौधे मिले धतूरा और आक इन दोनों पौधों को स्वभाव से विषैला माना जाता है, लेकिन आयुर्वेद में इनका उपयोग अनेक औषधियों में भी किया जाता है। मान्यता है कि इन पौधों की शीतल प्रकृति और विशेष गुणों ने भगवान शिव के शरीर में फैल रही विष की तपन को कम करने में सहायता की।तब देवताओं ने श्रद्धा से धतूरे के फल और आक के फूल भगवान शिव को अर्पित किए।कहा जाता है कि भगवान शिव इस भावना से इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने आशीर्वाद दिया "जो भी भक्त सच्चे मन से मुझे धतूरा और आक अर्पित करेगा, उसकी भक्ति मैं अवश्य स्वीकार करूंगा।"
धतूरा और आक से जुड़े नियम
धतूरा और आक दोनों ही विषैले पौधे हैं। इन्हें केवल पूजा के लिए ही प्रयोग करना चाहिए। बिना किसी विशेषज्ञ या वैद्य की सलाह के इनका सेवन कभी नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह स्वास्थ्य के लिए गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं।
आज भी सावन, महाशिवरात्रि और सोमवार के दिन शिव मंदिरों में धतूरा और आक चढ़ाने की परंपरा पूरे श्रद्धाभाव से निभाई जाती है। भक्त मानते हैं कि इससे भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और जीवन की कठिनाइयों को दूर करने का आशीर्वाद देते हैं।
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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)