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Bramha Ka Vardan: अनन्त शेष का तप, ब्रह्मा का वरदान और पृथ्वी धारण की कथा

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
कोमल शर्मा
सार

Bramha Ka Vardan: महायशस्वी भगवान शेषनाग ने एक समय अपनी माता कद्रू और भाइयों का साथ छोड़ दिया और कठोर तपस्या में लीन हो गए।

Bramha Ka Vardan

Bramha Ka Vardan: महायशस्वी भगवान शेषनाग ने एक समय अपनी माता कद्रू और भाइयों का साथ छोड़ दिया और कठोर तपस्या में लीन हो गए। वे अत्यंत संयमी थे-केवल वायु पर जीवन यापन करते, इन्द्रियों को वश में रखते और नियमपूर्वक व्रत का पालन करते थे। वे गन्धमादन पर्वत, बदरिकाश्रम, गोकर्ण, पुष्कर, हिमालय के तटवर्ती प्रदेशों तथा अनेक पवित्र तीर्थों में एकान्तवास करते हुए निरंतर तप करते रहे। उनका शरीर अत्यंत क्षीण हो गया था- मांस, त्वचा और नाड़ियाँ सूख गई थीं। सिर पर जटाएँ और शरीर पर वल्कल वस्त्र धारण किए हुए वे पूर्णतया मुनिवृत्ति में स्थित थे।  

जब ब्रह्मा जी ने उनकी यह कठोर तपस्या देखी, तो वे स्वयं उनके पास आए और बोले, “शेष! तुम यह कैसी तपस्या कर रहे हो? इससे तो समस्त प्रजा संतप्त हो रही है। तुम जो चाहो, मुझसे वर माँगो।” शेषनाग ने विनम्रता से उत्तर दिया, “भगवन्! मेरे भाई अत्यंत मंदबुद्धि और परस्पर द्वेष रखने वाले हैं। वे सदा एक-दूसरे के दोष निकालते रहते हैं। विनता और उसके पुत्र गरुड़ से भी वे ईर्ष्या करते हैं। इन सब कारणों से मैं उनके साथ रहना नहीं चाहता। इसलिए मैंने तपस्या का मार्ग अपनाया है, ताकि उनसे दूर रह सकूँ। मैं तो इस शरीर का त्याग करना चाहता हूँ, जिससे उनका संग कभी न हो।”  

ब्रह्मा जी ने उन्हें समझाते हुए कहा, “शेष! मैं तुम्हारे भाइयों की प्रवृत्ति भली-भाँति जानता हूँ। उनके कर्मों का फल उन्हें अवश्य मिलेगा। तुम उनके लिए शोक मत करो। तुम धर्म में स्थित हो- यह अत्यंत शुभ है। अब तुम मुझसे कोई वर माँगो।” शेषनाग ने कहा, “हे पितामह! मुझे यही वर दीजिए कि मेरी बुद्धि सदा धर्म, मनोनिग्रह और तपस्या में स्थिर रहे।” ब्रह्मा जी अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले- “शेष! तुम्हारा संयम और धैर्य अद्वितीय है। अब तुम मेरे लिए एक महत्वपूर्ण कार्य करो। यह पृथ्वी पर्वतों, वनों, सागरों और नगरों सहित निरंतर हिलती-डुलती रहती है। तुम इसे धारण करके स्थिर करो।”  

शेषनाग ने आज्ञा स्वीकार करते हुए कहा, “प्रजापते! आप समस्त जगत के स्वामी हैं। आपकी आज्ञा का पालन करते हुए मैं इस पृथ्वी को स्थिर रूप से धारण करूँगा। आप इसे मेरे सिर पर स्थापित करें।” तब ब्रह्मा जी ने कहा- “नागराज! तुम पृथ्वी के नीचे पाताल लोक में जाओ। यह स्वयं तुम्हें मार्ग देगी। वहाँ जाकर इस पृथ्वी को धारण करो।” शेषनाग ने “बहुत अच्छा” कहकर आज्ञा स्वीकार की। वे पृथ्वी के नीचे गए और समुद्रों से घिरी इस पृथ्वी को अपने अनन्त फणों पर धारण कर लिया। तभी से यह पृथ्वी स्थिर हो गई।  

इसके बाद ब्रह्मा जी ने कहा,“हे नागश्रेष्ठ! तुम वास्तव में ‘अनन्त’ हो। तुम अकेले ही इस पृथ्वी को उसी प्रकार धारण कर रहे हो, जैसे मैं या इन्द्र।” ब्रह्मा जी ने आगे शेषनाग की सहायता के लिए विनतानन्दन गरुड़ को भी नियुक्त किया। शेषनाग के पाताल लोक में जाने के बाद नागों ने उनके बड़े भाई वासुकि को नागराज के पद पर अभिषिक्त किया, जैसे देवताओं ने इन्द्र को अपना राजा बनाया था। इस प्रकार भगवान अनन्त शेष आज भी पाताल लोक में निवास करते हुए अपनी दिव्य शक्ति से इस पृथ्वी को धारण किए हुए हैं।

आनंद पाराशर 

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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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