राम नवमी की आरती
राम नवमी के दिन पूजा के अंत में भगवान राम की आरती करना बेहद जरूरी होता है। आरती से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा फैलती है और मन में भक्ति की भावना बढ़ती है। आरती करते समय दीपक घुमाते हुए पूरे परिवार के साथ भगवान का गुणगान करें। इससे घर में सुख-शांति बनी रहती है।
भगवान राम की पहली आरती
श्री रामचंद्र कृपालु भजु मन, हरण भवभय दारुणम्।
नवकंज लोचन, कंज मुख, कर कंज, पद कंजारुणम्॥
कंदर्प अगणित अमित छवि, नव नील नीरद सुन्दरम्।
पट पीत मानहु तड़ित रुचि शुचि, नौमि जनक सुतावरम्॥
भजु दीनबन्धु दिनेश दानव, दैत्य वंश निकन्दनम्।
रघुनन्द आनन्दकन्द कोशल चन्द, दशरथ नन्दनम्॥
सिर मुकुट कुण्डल तिलक चारु, उदारु अङ्ग विभूषणम्।
आजानुभुज शर चाप धर, सङ्ग्राम जित खर-दूषणम्॥
इति वदति तुलसीदास, शङ्कर शेष मुनि मन रञ्जनम्।
मम हृदय कञ्ज निवास कुरु, कामादि खल दल गञ्जनम्॥
मनु जाहि राचेउ मिलिहि सो बरु, सहज सुन्दर साँवरो।
करुना निधान सुजान सीलु, सनेहु जानत रावरो॥
एहि भाँति गौरी असीस सुनि, सिय सहित हियँ हरषीं।
तुलसी भवानिहि पूजि पुनि-पुनि, मुदित मन मन्दिर चली॥
दोहा
जानि गौरी अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि।
मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे।।
भगवान राम की दूसरी आरती
आरती कीजे श्रीरामलला की । पूण निपुण धनुवेद कला की ।।
धनुष वान कर सोहत नीके । शोभा कोटि मदन मद फीके ।।
सुभग सिंहासन आप बिराजैं । वाम भाग वैदेही राजैं ।।
कर जोरे रिपुहन हनुमाना । भरत लखन सेवत बिधि नाना ।।
शिव अज नारद गुन गन गावैं । निगम नेति कह पार न पावैं ।।
नाम प्रभाव सकल जग जानैं । शेष महेश गनेस बखानैं
भगत कामतरु पूरणकामा । दया क्षमा करुना गुन धामा ।।
सुग्रीवहुँ को कपिपति कीन्हा । राज विभीषन को प्रभु दीन्हा ।।
खेल खेल महु सिंधु बधाये । लोक सकल अनुपम यश छाये ।।
दुर्गम गढ़ लंका पति मारे । सुर नर मुनि सबके भय टारे ।।
देवन थापि सुजस विस्तारे । कोटिक दीन मलीन उधारे ।।
कपि केवट खग निसचर केरे । करि करुना दुःख दोष निवेरे ।।
देत सदा दासन्ह को माना । जगतपूज भे कपि हनुमाना ।।
आरत दीन सदा सत्कारे । तिहुपुर होत राम जयकारे ।।
कौसल्यादि सकल महतारी । दशरथ आदि भगत प्रभु झारी ।।
सुर नर मुनि प्रभु गुन गन गाई । आरति करत बहुत सुख पाई ।।
धूप दीप चन्दन नैवेदा । मन दृढ़ करि नहि कवनव भेदा ।।
राम लला की आरती गावै । राम कृपा अभिमत फल पावै ।।