Shiva Ki Nagri Kashi: बनारस का नाम सुनते ही बड़े-बुजुर्गों की जुबान पर एक ही नाम आता है और वो है शिव की नगरी काशी। बनारस शहर बेहद खास है, क्योंकि यहां के कण-कण में शिव बसते हैं। भोलेनाथ का वाराणसी से नाता बेहद पुराना है।
Shiva Ki Nagri Kashi: बनारस का नाम सुनते ही बड़े-बुजुर्गों की जुबान पर एक ही नाम आता है और वो है शिव की नगरी काशी। बनारस शहर बेहद खास है, क्योंकि यहां के कण-कण में शिव बसते हैं। भोलेनाथ का वाराणसी से नाता बेहद पुराना है। यही वजह है कि बनारस की गलियों में भी भोलेनाथ के मंदिर हैं। गलियों की बात तो छोड़िए, काशी विश्वनाथ.. जिनकी खूबसूरती.. भव्यता और मान्यता देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी मशहूर है। काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग भगवान भोलेनाथ के सबसे प्रसिद्ध और लोकप्रिय मंदिरों में से एक है। भगवान शिव का यह मंदिर वाराणसी में गंगा नदी के तट पर स्थित है। सावन के महीने में यहां दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। कहा जाता है कि सावन में बाबा काशी विश्वनाथ का नाम जपने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।
जहाँ जीवन के 'अंत' का उत्सव मनाया जाता है
काशी वो जगह है जहाँ जीवन के अंत का उत्सव मनाया जाता है। यहाँ दिन में भोले के दर्शन होते हैं और रात में मणिकर्णिका घाट पर इस जीवन का अंत होता है। लोग गंगा में डुबकी लगाकर पुण्य प्राप्त करते हैं और उसी गंगा में डुबकी लगाकर लोग अपने जीवन के दूसरे सार का दर्शन करते हैं।
जय भोले बनारस के बच्चे-बच्चे की जुबान पर है। काशी से जुड़ी भगवान शिव की कई मान्यताएँ हैं.. तो आइए जानते हैं भगवान शिव और काशी के बीच क्या है कनेक्शन
काशी भोलेनाथ के शिव पर टिकी है
पुराणों के अनुसार काशी भगवान शिव के त्रिशूल पर टिकी है। भगवान शिव के त्रिशूल पर टिकी होने के कारण यह ज़मीन पर नहीं बल्कि ऊपर है। यहाँ के कण-कण में शिव मौजूद हैं। जीवन यहीं से शुरू होता है और यहीं खत्म भी होता है। कहा जाता है कि काशी नगरी में मरने वाले को मोक्ष की प्राप्ति होती है, इसलिए यहाँ मरना शुभ माना जाता है, चिता की राख यहाँ आभूषण की तरह है। काशी में साधु-संतों का डेरा है। यहां बड़ी संख्या में अघोरियों का निवास है।
भोलेनाथ देवी पार्वती के साथ काशी आए थे
हिंदू धर्म में इसे देवभूमि माना जाता है। इसका नाम वाराणसी इसलिए पड़ा क्योंकि यह वरुणा और असी दो नदियों के बीच बसा है। इसे पवित्र स्थलों में से एक माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान भोलेनाथ अपनी पत्नी माता पार्वती के साथ काशी आए थे। एक कथा के अनुसार जब भगवान शंकर पार्वती जी से विवाह कर कैलाश पर्वत पर रहने लगे तो पार्वती जी इससे नाराज हो गईं। उन्होंने भगवान शिव के सामने अपनी इच्छा व्यक्त की।
अपनी प्रियतमा से यह सुनकर भोलेनाथ कैलाश छोड़कर चले गए। कैलाश पर्वत छोड़कर भगवान शिव देवी पार्वती के साथ काशी नगरी में रहने लगे। इस तरह काशी नगरी में आकर भगवान शिव ज्योतिर्लिंग के रूप में यहां स्थापित हो गए।
काशी विश्वनाथ के दर्शन करने से खुल जाती है किस्मत
काशी देश के पवित्र स्थलों में से एक है। यहां स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक है। काशी विश्वनाथ मंदिर भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह मंदिर हिंदू धर्म के लिए बेहद खास है। मान्यता है कि यहां जल चढ़ाने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इस मंदिर का अब जीर्णोद्धार हो चुका है और इसी के साथ इस मंदिर ने बनारस की भव्यता में चार चांद लगा दिए हैं। सावन का महीना शुरू होते ही वाराणसी में शिव भक्तों की भीड़ उमड़ने लगेगी। भोलेनाथ को जल चढ़ाने के लिए भक्त यहां जरूर पहुंचते हैं। यह भी पढ़ें- Manikarnika Ghat: आखिर क्यों मणिकर्णिका घाट पर हमेशा जलती रहती है चिता, जानें इसका रहस्य
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