Valmiki Ramayan Sundarkand Sarg 18: वाल्मीकि रामायण के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि हनुमान जी ने माता सीता को भयानक राक्षसियों से घिरा हुआ देखा।
Valmiki Ramayan Sundarkand Sarg 18: वाल्मीकि रामायण के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि हनुमान जी ने माता सीता को भयानक राक्षसियों से घिरा हुआ देखा। इस प्रकार फूले हुए वृक्षों से सुशोभित उस वन की शोभा देखते और विदेहनन्दिनी का अनुसंधान करते हुए हनुमान जी की वह सारी रात प्रायः बीत चली। केवल एक पहर रात बाकी रही। रात के उस पिछले पहर में छहों अंगोंसहित सम्पूर्ण वेदों के विद्वान् तथा श्रेष्ठ यज्ञों द्वारा यजन करने वाले ब्रह्म-राक्षसों के घर में वेदपाठ की ध्वनि होने लगी, जिसे हनुमान जी ने सुना। महाबली महाबाहु दशमुख रावण जैसे ही जागा उसने सीता का ही चिंतन किया।
उसने सब प्रकार के आभूषण धारण किये और परम उत्तम शोभा से सम्पन्न हो उस अशोकवाटिका में ही प्रवेश किया, जो सब प्रकार के फूल और फल देने वाले भाँति-भाँति के वृक्षों से सुशोभित थी। जैसे देवताओं और गन्धर्वो की स्त्रियाँ देवराज इन्द्र के पीछे चलती हैं, उसी प्रकार अशोकवन में जाते हुए पुलस्त्यनन्दन रावण के पीछे-पीछे लगभग एक सौ सुन्दरियाँ गयीं। जैसे बादल के साथ-साथ बिजलियाँ चलती हैं, उसी प्रकार रावण की सुन्दरी स्त्रियाँ अपने वीर पति के पीछे-पीछे जा रही थीं। उस समय नींद के नशे में उनकी आँखें झपी जाती थीं।
जिनकी आँखें मदमत्त बना देने वाली थीं, वे राक्षसराज की प्यारी पत्नियाँ अशोक वन में जाते हुए पति के साथ बड़े आदर से और अनुरागपूर्वक जा रही थीं। उन सबका पति महाबली मन्दबुद्धि रावण काम के अधीन हो रहा था। वह सीता में मन लगाये मन्दगति से आगे बढ़ता हुआ अद्भुत शोभा पा रहा था। उस समय वायुनन्दन कपिवर हनुमान जी ने उन परम सुन्दरी रावणपत्नियों की करधनी का कलनाद और नूपुरों की झनकार सुनी। रावण उस समय काम, दर्प और मद से युक्त था। उसकी आँखें टेढ़ी, लाल और बड़ी-बड़ी थीं। वह धनुषरहित साक्षात् कामदेव के समान जान पड़ता था।
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अशोक-वृक्ष के पत्तों और डालियों में छिपे हुए हनुमान् जी सैकड़ों पत्रों तथा पुष्पों से ढक गये थे। उसी अवस्था में उन्होंने निकट आये हुए रावण को पहचानने का प्रयत्न किया। उसकी ओर देखते समय कपिश्रेष्ठ हनुमान् ने रावण की सुन्दरी स्त्रियों को भी लक्ष्य किया, जो रूप और यौवन से सम्पन्न थीं।
ताराओं से घिरे हुए चन्द्रमा की भाँति वह परम सुन्दरी युवतियों से घिरा हुआ था। महातेजस्वी महाकपि हनुमान् ने उस तेजस्वी राक्षस को देखा और देखकर यह निश्चय किया कि यही महाबाहु रावण है। पहले यही नगर में उत्तम महल के भीतर सोया हुआ था। ऐसा सोचकर वे वानरवीर महातेजस्वीपवनकुमार हनुमान् जी जिस डाली पर बैठे थे, वहाँ से कुछ नीचे उतर आये।
यद्यपि मतिमान् हनुमान जी भी बड़े उग्र तेजस्वी थे, तथापि रावण के तेज से तिरस्कृत-से होकर सघन पत्तों में घुसकर छिप गये। उधर रावण काले केश, कजरारे नेत्र, सुन्दर कटिभाग और परस्पर सटे हुए स्तनवाली सुन्दरी सीता को देखने के लिये उनके पास गया।