Valmiki Ramayan Sundarkand Sarg 17: वाल्मीकि रामायण के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि हनुमान जी ने देखा, माता सीता की शोभा नष्ट हो रही है।
Valmiki Ramayan Sundarkand Sarg 17: वाल्मीकि रामायण के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि हनुमान जी ने देखा, माता सीता की शोभा नष्ट हो रही है। तदनन्तर वह दिन बीतने के पश्चात् कुमुदसमूह के समान श्वेत वर्णवाले तथा निर्मल रूप से उदित हुए चन्द्रदेव स्वच्छ आकाश में कुछ ऊपर को चढ़ आये। उस समय ऐसा जान पड़ता था, मानो कोई हंस किसी नील जलराशि में तैर रहा हो। निर्मल कान्तिवाले चन्द्रमा अपनी प्रभा से सीताजी के दर्शन आदि में पवनकुमार हनुमान जी की सहायतासी करते हुए अपनी शीतल किरणों द्वारा उनकी सेवा करने लगे। वायुपुत्र हनुमान जी ने जब विदेहकुमारी सीता को देखने के लिये अपनी दृष्टि दौड़ायी, तब उन्हें उनके पास ही बैठी हुई भयानक दृष्टिवाली बहुत-सी राक्षसियाँ दिखायी दीं।
उनमें से किसी के एक आँख थी तो दूसरी के एक कान। किसी-किसी के कान इतने बड़े थे कि वह उन्हें चादर की भाँति ओढ़े हुए थीं। किसी के कान ही नहीं थे और किसी के कान ऐसे दिखायी देते थे मानो खूटे गड़े हुए हों। किसी-किसी की साँस लेने वाली नाक उसके मस्तक पर थी। किसी का शरीर बहुत बड़ा था और किसी का बहुत उत्तम। किसी की गर्दन पतली और बड़ी थी। किसी के केश उड़ गये थे और किसी-किसी के माथे पर केश उगे ही नहीं थे। कोई-कोई राक्षसी अपने शरीर के केशों का ही कम्बल धारण किये हुए थी।
किसी के कान और ललाट बड़े-बड़े थे तो किसी के पेट और स्तन लंबे थे। किसी के ओठ बड़े होने के कारण लटक रहे थे तो किसी के ठोड़ी में ही सटे हुए थे। किसी का मुँह बड़ा था और किसी के घुटने। कोई नाटी, कोई लंबी, कोई कुबड़ी, कोई टेढ़ीमेढ़ी, कोई बवनी, कोई विकराल, कोई टेढ़े मुँहवाली, कोई पीली आँखवाली और कोई विकट मुँहवाली थीं। कितनी ही राक्षसियाँ बिगड़े शरीर वाली, काली, पीली, क्रोध करने वाली और कलह पसंद करने वाली थीं। उन सबने काले लोहे के बने हुए बड़े-बड़े शूल, कूट और मुद्गर धारण कर रखे थे।
कितनी ही राक्षसियों के मुख सूअर, मृग, सिंह, भैंस, बकरी और सियारिनों के समान थे। किन्हीं के पैर हाथियों के समान, किन्हीं के ऊँटोंके समान और किन्हीं के घोड़ों के समान थे। किन्हीं-किन्हीं के सिर कबन्ध की भाँति छाती में स्थित थे; अतः गड्डे के समान दिखायी देते थे। किन्हीं के पैर हाथियों के समान थे और किन्हीं के गौओं के समान। कोई बड़े-बड़े पैर धारण करती थीं और कितनी ही ऐसी थीं जिनके पैरों में चोटी के समान केश उगे हुए थे। बहुत-सी राक्षसियाँ बेहद लंबे सिर और गर्दनवाली थीं और कितनों के पेट तथा स्तन बहुत बड़े-बड़े थे।
किन्हीं के मुँह और नेत्र सीमा से अधिक बड़े थे, किन्हीं-किन्हीं के मुखों में बड़ी-बड़ी जिह्वाएँ थीं और कितनी ही ऐसी राक्षसियाँ थीं, जो बकरी, हाथी, गाय, सूअर, घोड़े, ऊँट और गदहों के समान मुँह धारण करती थीं। इसीलिये वे देखने में बड़ी भयंकर थीं। कितनी ही अपने अंगों में रक्त और मांस का लेप लगाये रहती थीं। रक्त और मांस ही उनके भोजन थे। उन्हें देखते ही रोंगटे खड़े हो जाते थे। कपिश्रेष्ठ हनुमान जी ने उन सबको देखा। उस समय शोभाशाली हनुमान जी ने जनककिशोरी जानकीजी की ओर विशेष रूप से लक्ष्य किया। उनकी कान्ति फीकी पड़ गयी थी। वे शोक से संतप्त थीं और उनके केशों में मैल जम गयी थी।
जैसे कोई हथिनी अपने यूथ से अलग हो गयी हो, यूथपति के स्नेह से बँधी हो और उसे किसी सिंह ने रोक लिया हो। रावण की कैद में पड़ी हुई सीता की भी वैसी ही दशा थी। वे वर्षाकाल बीत जाने पर शरद्ऋतु के श्वेत बादलों से घिरी हुई चन्द्ररेखा के समान प्रतीत होती थीं। क्रूर ग्रह से आक्रान्त हुई रोहिणी की भाँति वे वहाँ उन राक्षसियों से घिरी हुई थीं। हनुमान् जी ने उन्हें देखा। वे पुष्पहीन लता की भाँति श्रीहीन हो रही थीं। यद्यपि देवी सीता के मुख पर दीनता छा रही थी तथापि अपने पति के तेज का स्मरण हो आने से उनके हृदय से वह दैन्य दूर हो जाता था। कजरारे नेत्रों वाली सीता अपने शील से ही सुरक्षित थीं।
यद्यपि वे विरह-शोक से दुर्बल हो गयी थीं तथापि आभूषणों के बिना ही शोभा पाती थीं। इस अवस्था में मिथिलेशकुमारी सीता को देखकर पवनपुत्र हनुमान् को उनका पता लग जाने के कारण अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ। मनोहर नेत्रवाली सीता को वहाँ देखकर हनुमान जी हर्ष के आँसू बहाने लगे। उन्होंने मन-ही-मन श्रीरघुनाथजी को नमस्कार किया। सीता के दर्शन से उल्लसित हो श्रीराम और लक्ष्मण को नमस्कार करके पराक्रमी हनुमान् वहीं छिपे रहे।