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Govardhan Parvat Ka Rahasya: आखिर कब और कैसे शुरू हुई गोवर्धन परिक्रमा, जानिए इसकी पौराणिक कथा और महत्व

जीवांजलिPublished by:
राघवेंद्र तिवारी
सार

Govardhan Parvat Ka Rahasya: व्रज क्षेत्र मथुरा में भगवान श्री कृष्ण का जन्मस्थान माना जाता है। इसी क्षेत्र के आस-पास गोवर्धन पर्वत है, जिसका अपना अलग ही महत्व है। बता दें कि गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा का विशेष महत्व है और यह ब्रज क्षेत्र की आध्यात्मिक धरोहर का हिस्सा है।

Govardhan Parvat Ka Rahasya
Govardhan Parvat Ka Rahasya: व्रज क्षेत्र मथुरा में भगवान श्री कृष्ण का जन्मस्थान माना जाता है। इसी क्षेत्र के आस-पास गोवर्धन पर्वत है, जिसका अपना अलग ही महत्व है। बता दें कि गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा का विशेष महत्व है और यह ब्रज क्षेत्र की आध्यात्मिक धरोहर का हिस्सा है। इस पर्वत को भगवान श्रीकृष्ण का स्वरूप माना जाता है, जिन्होंने इसे अपनी उंगली पर उठाकर ब्रजवासियों को इंद्र के क्रोध से बचाया था। मान्यता है कि इसकी परिक्रमा से चार धाम यात्रा के समान पुण्य प्राप्त होता है और भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। तो आज इस खबर में जानेंगे कि आखिर गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करने के लाभ क्या है और इसका आध्यात्मिक महत्व क्या है। आइए इसके बारे में विस्तार से जानते हैं।

पौराणिक कथा

प्राचीन कथाओं के अनुसार, एक बार श्रीकृष्ण गायों को चराने के बाद नंदभवन लौटे। मां यशोदा ने बताया कि इंद्र की पूजा की जा रही है, क्योंकि उनकी कृपा से वर्षा होती है, जिससे फसलें उगती हैं और गायों को चारा मिलता है। श्रीकृष्ण ने सुझाव दिया कि गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए, क्योंकि यह पर्वत गायों का आश्रय है। इंद्र ने इस बात से क्रोधित होकर मूसलाधार वर्षा शुरू कर दी। तब श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठाकर ब्रजवासियों को बाढ़ और वर्षा से बचाया। इस घटना ने इंद्र का अभिमान तोड़ा और गोवर्धन पूजा की परंपरा शुरू हुई। तभी से इस पर्वत की परिक्रमा की प्रथा प्रचलित है।

परिक्रमा के प्रकार 

बड़ी परिक्रमा: यह 21 किलोमीटर लंबी है। पैदल पूरी करने में लगभग 4 घंटे और वाहन से 1 घंटा लगता है।

छोटी परिक्रमा: यह 3 कोस (लगभग 9 किमी) की होती है।

दंडवती परिक्रमा: कुछ भक्त लेटकर (दंडवत) यह परिक्रमा करते हैं, जिसमें 21 किलोमीटर की दूरी पूरी करने में 7 दिन लगते हैं।

आध्यात्मिक महत्व

ब्रज क्षेत्र में श्रीकृष्ण की लीलाएं हर कण में बसी हैं। गोवर्धन परिक्रमा भक्ति और समर्पण का प्रतीक है। परिक्रमा के दौरान भगवान का नाम जपने से मन शांत होता है और आध्यात्मिक उन्नति होती है। यह भी माना जाता है कि जो भक्त चार धाम यात्रा नहीं कर पाते, उनके लिए गोवर्धन की परिक्रमा समान फलदायी है और मोक्ष प्रदान करती है।

परिक्रमा की विशेषता

कई भक्त गहरी श्रद्धा के साथ दंडवती परिक्रमा करते हैं, जो तप और समर्पण का प्रतीक है। यह परिक्रमा न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक शक्ति को भी दर्शाती है। गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा ब्रज की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत को जीवंत रखती है।

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