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Mahakumbh 2025: सरस्वती पूजा से शुरू होगा महाकुंभ की सबसे कठीन तपस्या, 350 साधु करेंगे कठोर साधना

जीवांजलिPublished by:
राघवेंद्र तिवारी
सार

Mahakumbh 2025: प्रयागराज में इस समय महाकुंभ की धूम जारी है। दुनिया भर से श्रद्धालु गंगा स्नान के लिए आ रहे हैं। इस बीच वैष्णव परंपरा के तपस्वी वसंत पंचमी से कुंभनगरी में सबसे कठिन पारंपरिक साधना शुरू करने जा रहे हैं।

Mahakumbh 2025
Mahakumbh 2025: प्रयागराज में इस समय महाकुंभ की धूम जारी है। दुनिया भर से श्रद्धालु गंगा स्नान के लिए आ रहे हैं। इस बीच वैष्णव परंपरा के तपस्वी वसंत पंचमी से कुंभनगरी में सबसे कठिन पारंपरिक साधना शुरू करने जा रहे हैं। इसके लिए खाक चौक में तैयारियां भी शुरू हो गई हैं। इस बार 350 साधक खप्पर तपस्या करेंगे। धूनी साधना की खप्पर तपस्या अंतिम श्रेणी की होती है। इसी के आधार पर अखाड़े में साधुओं की वरिष्ठता तय होती है। 

वैष्णव परंपरा में श्रीसंप्रदाय में धूनी तप को सबसे बड़ी तपस्या माना जाता है। पंचांग के अनुसार यह तपस्या शुरू होती है। तेरह भाई त्यागी आश्रम के परमात्मा दास ने बताया कि यह तपस्या सूर्य उत्तरायण के शुक्ल पक्ष से शुरू होती है। तपस्या से पहले साधक निर्जली व्रत रखता है। इसके बाद धूनी में बैठता है। तपस्या छह चरणों में पूरी होती है। इन छह चरणों में पंच, सप्त, द्वादश, चौरासी, कोटि और खप्पर श्रेणियां हैं। प्रत्येक श्रेणी तीन वर्ष में पूरी होती है। इस प्रकार तपस्या पूरी होने में 18 वर्ष लगते हैं।

दिगंबर अखाड़े का क्या कहना है?

दिगंबर अखाड़े के सीताराम दास कहते हैं कि सभी छह श्रेणियों में तपस्या की अलग-अलग विधि है। सबसे प्रारंभिक पंच श्रेणी है। यह साधुओं द्वारा दीक्षा लेने के बाद की प्रारंभिक तपस्या है। इसमें साधक पांच स्थानों पर जल रही अग्नि की लपटों के बीच बैठकर तपस्या करते हैं। दूसरी श्रेणी में सात स्थानों पर जल रही अग्नि की लपटों के बीच बैठकर तपस्या करनी होती है। इसी प्रकार द्वादश श्रेणी में 12 स्थानों पर जल रही अग्नि की लपटों के बीच बैठकर तपस्या करनी होती है, 84 श्रेणी में सैकड़ों स्थानों पर जल रही अग्नि की लपटों के बीच बैठकर तपस्या करनी होती है।

सबसे कठिन साधना कपाल तपस्या है

कपाल श्रेणी की कपाल तपस्या सबसे कठिन होती है। परमात्मा दास के अनुसार सिर पर घड़े में अग्नि रखकर उसे प्रज्वलित किया जाता है। इसकी ज्वाला के बीच साधक को प्रतिदिन 6 से 16 घंटे तक तप करना होता है। यह बसंत से गंगा दशहरा तक चलता है। यह क्रम तीन वर्ष तक चलता है। इसके पूर्ण होने पर साधक की 18 वर्ष की तपस्या पूर्ण मानी जाती है। उनका कहना है कि अखाड़ों, आश्रमों सहित खालसा में इसके लिए तैयारियां शुरू हो गई हैं। खाक चौक में दिगंबर, निर्मोही और निर्वाणी सहित करीब साढ़े तीन सौ तपस्वी इस कठिन साधना को करेंगे, जबकि अन्य साधक अपनी अन्य तपस्या के चरण करेंगे।

कई संत दोबारा करते हैं खप्पर तपस्या

खाक चौक के तपस्वियों में इस साधना के साथ ही संत समुदाय में उनकी वरिष्ठता भी तय होती है। कई साधक महाकुंभ से अपनी साधना शुरू करते हैं। वे पंच धुना से शुरुआत करते हैं। इसी तरह क्रम आगे बढ़ने पर खप्पर श्रेणी आती है, जो सबसे अंतिम होती है। खप्पर श्रेणी के साधक सबसे वरिष्ठ माने जाते हैं। कई साधक खप्पर तपस्या पूरी करने के बाद दोबारा तपस्या शुरू कर देते हैं।

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