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Shardiya Navratri: नवरात्रि के पहले दिन ही क्यों होती है मां शैलपुत्री की पूजा? जानें वजह और धार्मिक महत्व

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Shardiya Navratri: धार्मिक मान्यता के अनुसार मां शैलपुत्री पर्वतराज हिमालय की पुत्री हैं। इसी वजह से उन्हें शैलपुत्री कहा गया है। नवरात्रि में मां दुर्गा के जिन नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है, उनमें मां शैलपुत्री को पहला स्वरूप माना जाता है।

Shardiya Navratri
Shardiya Navratri: शारदीय नवरात्रि की शुरुआत होते ही मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा का विधान है। नवरात्रि के नौ दिनों में हर दिन देवी के एक अलग रूप की आराधना की जाती है। पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। मान्यता है कि मां शैलपुत्री को देवी दुर्गा का प्रथम स्वरूप माना गया है और नवरात्रि की पूजा की शुरुआत उन्हीं से होती है। लेकिन मां शैलपुत्री को ही पहले दिन पूजने की परंपरा क्यों है? इसके पीछे क्या धार्मिक मान्यता है और मां शैलपुत्री के स्वरूप का क्या महत्व है? आइए जानते हैं।

कौन हैं मां शैलपुत्री

धार्मिक मान्यता के अनुसार मां शैलपुत्री पर्वतराज हिमालय की पुत्री हैं। इसी वजह से उन्हें शैलपुत्री कहा गया है। नवरात्रि में मां दुर्गा के जिन नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है, उनमें मां शैलपुत्री को पहला स्वरूप माना जाता है। देवी का स्वरूप शांत और सौम्य बताया गया है। उनके एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में कमल का फूल रहता है। मां शैलपुत्री बैल पर सवार रहती हैं।

पहले दिन क्यों होती है पूजा

मां शैलपुत्री को मां दुर्गा का प्रथम स्वरूप माना जाता है, इसलिए नवरात्रि की साधना की शुरुआत उनकी पूजा से होती है। धार्मिक मान्यता है कि देवी के इस स्वरूप की पूजा करने से साधना की शुरुआत स्थिरता और श्रद्धा के साथ होती है। नवरात्रि के पहले दिन भक्त कलश स्थापना के बाद मां शैलपुत्री का ध्यान और पूजन करते हैं।

पूर्व जन्म से जुड़ी मान्यता

मां शैलपुत्री का संबंध देवी सती से भी माना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार देवी सती ने राजा दक्ष के यहां जन्म लिया था और उनका विवाह भगवान शिव से हुआ था। एक बार राजा दक्ष ने यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया गया। इस बात से देवी सती बहुत दुखी हुईं और उन्होंने यज्ञ की अग्नि में अपने प्राण त्याग दिए। इसके बाद देवी ने पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लिया। इस जन्म में उनका नाम शैलपुत्री पड़ा। आगे चलकर उन्होंने भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त किया। इसी वजह से मां शैलपुत्री को देवी पार्वती का स्वरूप भी माना जाता है।

मां शैलपुत्री के स्वरूप का महत्व

मां शैलपुत्री के एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में कमल होता है। त्रिशूल शक्ति का प्रतीक माना जाता है, जबकि कमल पवित्रता और शांति का प्रतीक है। उनका वाहन बैल है, जिसे धर्म और स्थिरता से जोड़कर देखा जाता है। मां का यह स्वरूप भक्तों को शक्ति के साथ संयम और स्थिरता का भाव प्रदान करने वाला माना जाता है।

नवरात्रि के पहले दिन पूजा का विधान

नवरात्रि के पहले दिन सुबह स्नान करने के बाद पूजा स्थल की सफाई की जाती है। इसके बाद कलश स्थापना कर मां शैलपुत्री का ध्यान किया जाता है। देवी को अक्षत, रोली, फूल, फल और नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं। कई स्थानों पर मां को सफेद रंग की वस्तुएं अर्पित करने की परंपरा भी है। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार मां की पूजा और मंत्र जाप करते हैं।

मां शैलपुत्री की पूजा का धार्मिक महत्व

मान्यता है कि मां शैलपुत्री की पूजा करने से भक्तों को मानसिक शांति और आत्मबल प्राप्त होता है। नवरात्रि की साधना में पहले दिन मां के इस स्वरूप की पूजा को विशेष महत्व दिया जाता है। देवी का पर्वत से जुड़ा स्वरूप दृढ़ता और स्थिरता का प्रतीक माना जाता है। इसलिए भक्त नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री से जीवन में शक्ति, स्थिरता और सुख-शांति की कामना करते हैं।

मां शैलपुत्री को क्या चढ़ाएं

नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री को सफेद रंग की वस्तुएं अर्पित करने की परंपरा बताई जाती है। भक्त देवी को सफेद फूल, दूध से बनी मिठाई, फल और अन्य सात्विक भोग अर्पित कर सकते हैं। पूजा में सामग्री से अधिक श्रद्धा और भक्ति को महत्व दिया जाता है।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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