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Gajanana Sankashti Chaturthi: गजानन संकष्टी चतुर्थी कब मनाई जाएगी? जानें सही तिथि और धार्मिक महत्व

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Gajanana Sankashti Chaturthi: भाद्रपद कृष्ण पक्ष की संकष्टी चतुर्थी भगवान गणेश के गजानन स्वरूप को समर्पित मानी जाती है। 'गजानन' का अर्थ है हाथी के समान मुख वाले भगवान।

Gajanana Sankashti Chaturthi
Gajanana Sankashti Chaturthi: हिंदू धर्म में भगवान श्रीगणेश को विघ्नहर्ता, प्रथम पूज्य और बुद्धि के देवता के रूप में पूजा जाता है। प्रत्येक माह कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान गणेश की विधिपूर्वक पूजा और व्रत करने से जीवन के संकट दूर होते हैं तथा सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली संकष्टी चतुर्थी को गजानन संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। इस व्रत का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है, क्योंकि यह भगवान गणेश के गजानन स्वरूप को समर्पित होता है। आइए जानते हैं गजानन संकष्टी चतुर्थी की सही तिथि, पूजा का समय और इसका धार्मिक महत्व...

गजानन संकष्टी चतुर्थी 2026 कब है?

वर्ष 2026 में गजानन संकष्टी चतुर्थी 2 अगस्त, रविवार को मनाई जाएगी। इस दिन श्रद्धालु पूरे दिन व्रत रखकर भगवान गणेश की आराधना करेंगे और रात्रि में चंद्रमा के दर्शन के बाद व्रत का पारण करेंगे।

चतुर्थी तिथि का प्रारंभ: 1 अगस्त 2026 को रात्रि लगभग 9:33 बजे
चतुर्थी तिथि का समापन: 2 अगस्त 2026 को रात्रि लगभग 10:34 बजे

संकष्टी चतुर्थी का व्रत उदया तिथि के अनुसार 2 अगस्त को रखा जाएगा। इस दिन चंद्रोदय के बाद भगवान गणेश की पूजा कर व्रत खोला जाएगा।

 

Bhagavan Ganesh Ke Avataar:

गजानन संकष्टी चतुर्थी क्यों कहलाती है?

भाद्रपद कृष्ण पक्ष की संकष्टी चतुर्थी भगवान गणेश के गजानन स्वरूप को समर्पित मानी जाती है। 'गजानन' का अर्थ है हाथी के समान मुख वाले भगवान। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव द्वारा हाथी का मस्तक लगाए जाने के बाद गणेश जी गजानन कहलाए। इस स्वरूप की पूजा करने से बुद्धि, विवेक, धैर्य और सफलता की प्राप्ति होने की धार्मिक मान्यता है।

संकष्टी चतुर्थी का धार्मिक महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार संकष्टी चतुर्थी का व्रत भगवान गणेश को अत्यंत प्रिय है। इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत रखने और विधि-विधान से पूजा करने पर भगवान गणेश भक्तों के कष्टों का निवारण करते हैं। मान्यता है कि इस व्रत से कार्यों में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं, परिवार में सुख-शांति बनी रहती है और शुभ कार्यों में सफलता प्राप्त होती है। भाद्रपद मास की गजानन संकष्टी चतुर्थी का महत्व इसलिए भी अधिक माना जाता है, क्योंकि यह गणेश भक्ति के प्रमुख काल में आने वाली विशेष चतुर्थी होती है। इस दिन भगवान गणेश के गजानन स्वरूप की आराधना का विशेष फल बताया गया है।

व्रत और पूजा का धार्मिक विधान

गजानन संकष्टी चतुर्थी के दिन प्रातःकाल स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर भगवान गणेश का स्मरण किया जाता है। इसके बाद व्रत का संकल्प लिया जाता है। पूजा स्थल पर भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर उन्हें दूर्वा, लाल पुष्प, अक्षत, सिंदूर, चंदन और मोदक अर्पित किए जाते हैं। पूजन के दौरान गणेश मंत्रों का जाप, गणपति अथर्वशीर्ष, गणेश स्तोत्र अथवा संकटनाशन गणेश स्तोत्र का पाठ करना शुभ माना जाता है। दिनभर श्रद्धालु अपनी क्षमता और परंपरा के अनुसार निर्जल, फलाहार या एक समय का व्रत रखते हैं।

 

Gajanana Sankashti Chaturthi

चंद्रोदय के बाद क्यों खोला जाता है व्रत?

संकष्टी चतुर्थी के व्रत की सबसे महत्वपूर्ण परंपरा चंद्रोदय के बाद व्रत का पारण करना है। धार्मिक मान्यता के अनुसार रात्रि में चंद्रमा के दर्शन कर उन्हें अर्घ्य अर्पित किया जाता है। इसके बाद भगवान गणेश की पुनः पूजा की जाती है और प्रसाद ग्रहण कर व्रत पूरा किया जाता है। संकष्टी चतुर्थी का व्रत चंद्र दर्शन के बिना पूर्ण नहीं माना जाता।

भगवान गणेश को क्या अर्पित करें?

गजानन संकष्टी चतुर्थी पर भगवान गणेश को दूर्वा विशेष रूप से प्रिय मानी जाती है। इसके साथ लाल रंग के पुष्प, मोदक, लड्डू, गुड़, नारियल, केला और पान अर्पित किए जाते हैं। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा और नियमपूर्वक अर्पित किया गया यह पूजन भगवान गणेश को प्रसन्न करता है।

इन मंत्रों का किया जाता है जप

पूजा के समय श्रद्धालु भगवान गणेश के मंत्रों का जप भी करते हैं। 

"ॐ गं गणपतये नमः"

"वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥"


इन मंत्रों के साथ भगवान गणेश की आरती करने की भी परंपरा है।

गणेश पूजा में किन बातों का रखें ध्यान?

पूजा के दौरान भगवान गणेश को तुलसी दल अर्पित नहीं किया जाता। पूजा में दूर्वा, मोदक और लाल पुष्प का विशेष महत्व माना गया है। पूजा पूरी होने के बाद भगवान गणेश की आरती की जाती है और चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया जाता है। 




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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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