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Bhadrapada Bhaum Pradosh Vrat: भाद्रपद भौम प्रदोष व्रत पर करें इस कथा का पाठ, भगवान शिव की होगी विशेष कृपा

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Bhadrapada Bhaum Pradosh Vrat: प्रदोष व्रत हर महीने कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को रखा जाता है। प्रदोष काल को भगवान शिव की पूजा के लिए विशेष माना गया है।

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Bhadrapada Bhaum Pradosh Vrat: भाद्रपद मास में पड़ने वाला प्रदोष व्रत भगवान शिव की आराधना के लिए बेहद खास माना जाता है। जब त्रयोदशी तिथि मंगलवार के दिन पड़ती है, तो इसे भौम प्रदोष या मंगल प्रदोष कहा जाता है। इस दिन प्रदोष काल में भगवान शिव की पूजा करने और उनकी कथा का पाठ करने की परंपरा है। शिव पुराण और स्कंद पुराण से जुड़ी प्रदोष व्रत की कथाओं में भगवान शिव की उपासना से मिलने वाली कृपा और जीवन में आने वाले संकटों से मुक्ति का वर्णन मिलता है। क्या आपको पता है कि प्रदोष व्रत की ऐसी कौन सी कथा है, जिसमें भगवान शिव की भक्ति से एक राजकुमार का खोया हुआ राजपाट वापस मिल जाता है? आइए जानते हैं..

प्रदोष काल में होती है शिव पूजा

प्रदोष व्रत हर महीने कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को रखा जाता है। प्रदोष काल को भगवान शिव की पूजा के लिए विशेष माना गया है। धार्मिक ग्रंथों में इस समय भगवान शिव की आराधना, स्तुति और कथा श्रवण का महत्व बताया गया है। भौम प्रदोष में यही व्रत मंगलवार के दिन पड़ने के कारण विशेष नाम से जाना जाता है। 

राजा सत्यरथ की कथा

प्रदोष व्रत से जुड़ी प्रचलित शिव-केंद्रित कथा राजा सत्यरथ और उनके पुत्र धर्मगुप्त की है। कथा के अनुसार, विदर्भ देश में सत्यरथ नाम के एक राजा राज्य करते थे। वह धर्मपरायण और अपनी प्रजा के प्रति न्याय करने वाले राजा थे। उनके राज्य में सुख-शांति थी, लेकिन समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता। शाल्व देश के शत्रुओं ने विदर्भ पर आक्रमण कर दिया। दोनों पक्षों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। युद्ध के दौरान राजा सत्यरथ वीरगति को प्राप्त हुए और उनका राज्य भी शत्रुओं के हाथों चला गया। राजा की मृत्यु के बाद उनकी रानी भी संकट में पड़ गईं।

राजकुमार धर्मगुप्त हुए अनाथ

राजा सत्यरथ की रानी उस समय गर्भवती थीं। कुछ समय बाद उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम धर्मगुप्त रखा गया। लेकिन परिस्थितियां ऐसी बनीं कि बालक जन्म के बाद ही पिता के स्नेह से वंचित हो गया। कथा के अनुसार, राजा की मृत्यु और राज्य के नष्ट होने के बाद राजकुमार धर्मगुप्त का जीवन राजमहल में नहीं, बल्कि बेहद कठिन परिस्थितियों में बीता। आगे चलकर एक ब्राह्मण महिला ने उस बालक का पालन-पोषण किया। उसके साथ उसका अपना पुत्र शुचिव्रत भी था। इस तरह दोनों बालक साथ बड़े हुए। 

ऋषि शांडिल्य ने बताया प्रदोष व्रत

समय बीतने पर दोनों बालक ऋषि शांडिल्य के आश्रम पहुंचे। वहां उन्हें भगवान शिव की आराधना और प्रदोष व्रत के बारे में बताया गया। ऋषि ने प्रदोष व्रत की महिमा समझाते हुए बताया कि त्रयोदशी के प्रदोष काल में भगवान शिव की पूजा करने से उनकी विशेष कृपा प्राप्त होती है। इसके बाद दोनों बालकों ने श्रद्धा के साथ प्रदोष व्रत करना शुरू किया। धर्मगुप्त के जीवन में इस समय राजपाट, धन और वैभव कुछ भी नहीं था। इसके बावजूद उसने भगवान शिव की भक्ति नहीं छोड़ी और गुरु के बताए अनुसार प्रदोष व्रत करता रहा।

शिव भक्ति से बदली किस्मत

कथा के अनुसार, धर्मगुप्त ने लंबे समय तक भगवान शिव की आराधना और प्रदोष व्रत किया। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव की कृपा उस पर हुई> इसी दौरान धर्मगुप्त की भेंट गंधर्वराज की पुत्री अंशुमती से हुई। अंशुमती धर्मगुप्त से प्रभावित हुईं और आगे चलकर दोनों का विवाह हुआ। इसके बाद गंधर्वराज ने धर्मगुप्त की सहायता की। भगवान शिव की कृपा से धर्मगुप्त को अपनी खोई हुई शक्ति और अधिकार वापस पाने का अवसर मिला। गंधर्वों की सहायता से उसने अपने शत्रुओं का सामना किया और अंत में अपना खोया हुआ राज्य फिर से प्राप्त कर लिया। 

शिव पूजा से मिला राजपाट

प्रदोष व्रत की इस कथा में धर्मगुप्त की सबसे बड़ी विशेषता यही बताई गई है कि विपरीत परिस्थितियों में भी उसने भगवान शिव की पूजा नहीं छोड़ी। उसके पास धन नहीं था, राजपाट नहीं था, लेकिन उसने प्रदोष व्रत की साधना जारी रखी। कथा के अनुसार, उसकी इसी शिव भक्ति और प्रदोष व्रत के प्रभाव से उसके जीवन की परिस्थितियां बदलीं और उसे अपना खोया हुआ राज्य वापस मिला। इसलिए प्रदोष व्रत की कथा में भगवान शिव की आराधना को विशेष स्थान दिया गया है। 

पिछले जन्म से जुड़ा प्रसंग

कथा में राजा सत्यरथ के पूर्व जन्म का भी प्रसंग आता है। ऋषि शांडिल्य बताते हैं कि पूर्व जन्म में भी सत्यरथ एक राजा थे और भगवान शिव की पूजा किया करते थे। लेकिन एक बार प्रदोष काल में उनकी शिव पूजा अधूरी रह गई। कथा के अनुसार, उस समय राजा एक राजकीय समस्या के कारण पूजा बीच में छोड़कर चले गए और बाद में पूजा को विधि से पूरा नहीं किया। इसी प्रसंग को उनके अगले जन्म में आने वाले संकटों से जोड़ा गया है। धर्मगुप्त के संबंध में भी कथा में पूर्व जन्म के कर्मों का उल्लेख मिलता है। इस तरह प्रदोष व्रत की कथा में भगवान शिव की पूजा को केवल एक धार्मिक अनुष्ठान के रूप में नहीं, बल्कि जीवन में विशेष महत्व रखने वाली साधना के रूप में प्रस्तुत किया गया है। 

प्रदोष काल में करें शिव पूजा

भौम प्रदोष के दिन भक्तों को भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करनी चाहिए। शाम के समय प्रदोष काल में शिवलिंग का जलाभिषेक करके बेलपत्र, फूल, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित किया जाता है। इसके बाद भगवान शिव की स्तुति और प्रदोष व्रत की कथा का पाठ या श्रवण किया जाता है। धार्मिक परंपरा में प्रदोष काल को शिव पूजा का विशेष समय माना गया है। इसी समय भगवान शिव का ध्यान करके ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप भी किया जाता है।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।) 

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