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Vivah Mantra: विवाह में 7 फेरों के समय कौन से मंत्र बोलते हैं पंडित, जानिए हर एक का मतलब

JeevanjaliPublished by:
नीरज के. पटेल
सार

Vivah Mantra Niyam: हिंदू विवाह के सात फेरे जीवन के सबसे पवित्र क्षणों में से एक हैं। हर फेरा एक वचन है, हर वचन एक भावना, और हर भावना एक जीवन सिद्धांत। इन मंत्रों के माध्यम से दंपत्ति न केवल एक-दूसरे से, बल्कि ईश्वर से भी वचन लेते हैं कि वे जीवनभर प्रेम, विश्वास, धर्म और जिम्मेदारी से बंधे रहेंगे।

विवाह में 7 फेरों के समय कौन से मंत्र बोलते हैं पंडित, जानिए हर एक का मतलब
Vivah Mantra Importance: हिंदू धर्म में विवाह केवल एक सामाजिक बंधन नहीं, बल्कि दो आत्माओं के पवित्र मिलन का संस्कार माना जाता हैं। इसे “सप्तपदी संस्कार” भी कहा गया है, जिसका अर्थ है सात पग एक साथ चलना। इन सात पगों के साथ पति-पत्नी जीवनभर एक-दूसरे के सुख-दुख, धर्म-अधर्म, प्रेम और जिम्मेदारी में सहभागी बनने का संकल्प लेते हैं। विवाह के इन सात फेरों के दौरान पंडित जी विशिष्ट वैदिक मंत्रों का उच्चारण करते हैं। हर फेरा न केवल एक वचन होता है, बल्कि जीवन के एक नए अध्याय की नींव भी रखता है। आइए जानते हैं कि विवाह में बोले जाने वाले सात फेरों के मंत्र और उनके अर्थ व महत्व।

सात फेरे और उनके मंत्र व अर्थ

पहला फेरा: अन्न और जीवन की समृद्धि का वचन

मंत्र: “ॐ ईषे एकपदी भव, ईषे त्वा मनुष्या उप ब्रूमि। संसृज्यव साचं भव, रायस्पोषाय त्वा मनुष्या उप ब्रूमि॥”

अर्थ: पहले फेरे में वर (दूल्हा) वधू (दुल्हन) से यह वचन लेता है कि वे दोनों मिलकर अपने परिवार की अन्न-वृद्धि, समृद्धि और स्वस्थ जीवन का संकल्प करेंगे। यह वचन है कि हम जीवन की शुरुआत भोजन, स्वास्थ्य और समृद्धि से करेंगे। हम एक-दूसरे की भूख-प्यास, सुख-दुख और जीवन के हर संघर्ष में सहभागी रहेंगे।

पहला फेरा जीवन की भौतिक नींव का प्रतीक माना जाता है। अन्न, स्वास्थ्य और आजीविका की स्थिरता। दंपत्ति एक-दूसरे का साथ देने और परिवार के पालन-पोषण की जिम्मेदारी उठाने का प्रण लेते हैं।

दूसरा फेरा: शक्ति, साहस और जीवन की मजबूती का वचन

मंत्र: “ॐ ऊर्जे जारदस्तय। ऊर्जस्वती त्वं भवा। ऊर्जे त्वा मनुष्या उप ब्रूमि॥”

अर्थ: दूसरे फेरे में वर वधू से कहता है कि तुम मेरी जीवनसंगिनी बनो, मेरे साथ मिलकर हर परिस्थिति में साहस, ऊर्जा और उत्साह से आगे बढ़ो। हम दोनों मिलकर घर की रक्षा और जीवन के हर तूफान से सामना करेंगे।

यह फेरा मानसिक और शारीरिक शक्ति का प्रतीक माना जाता है। पति-पत्नी एक-दूसरे को ऊर्जा, आत्मबल और सहयोग देने का संकल्प लेते हैं।

तीसरा फेरा: धर्म, संपत्ति और चरित्र की रक्षा का वचन

मंत्र: “ॐ रायस्पोषाय त्रिपदी भव। अन्तरायो अरिष्टान् मेविध्वंसय। तृतीयं त्वा मनुष्या उप ब्रूमि॥”

अर्थ: तीसरे फेरे में वर और वधू प्रतिज्ञा करते हैं कि वे एक-दूसरे के साथ मिलकर धर्म का पालन करेंगे, सदाचार में रहेंगे, और धन का उपयोग उचित कर्मों में करेंगे। हम एक-दूसरे के धर्म, आस्था और कर्मपथ का सम्मान करेंगे, और अपने घर को सत्य और ईमानदारी से चलाएंगे।

यह फेरा धार्मिकता, निष्ठा और चरित्र की शुद्धता का प्रतीक है। इसमें यह वचन होता है कि पति-पत्नी धर्म और नीति के मार्ग से विचलित नहीं होंगे।

चौथा फेरा: प्रेम और परस्पर सम्मान का वचन

मंत्र: “ॐ मायोभव्या जायमानाय त्वा। मामयन्तु मायिनः। चतुर्थं त्वा मनुष्या उप ब्रूमि॥”

अर्थ: इस फेरे में वर कहता है कि हे प्रिये! तुम मेरे जीवन का आधार बनो। हम दोनों एक-दूसरे के सुख में सुखी और दुख में दुखी रहेंगे। हमारे बीच सदा स्नेह, प्रेम और आपसी सम्मान बना रहे।

यह फेरा प्रेम और आत्मीयता का प्रतीक होता है। इस समय पंडित जी आशीर्वाद देते हैं कि दंपत्ति के जीवन में प्रेम, मधुरता और परस्पर सम्मान कभी कम न हो।

पांचवां फेरा: संतान और परिवार की वृद्धि का वचन

मंत्र: “ॐ प्रजाभ्यः पंचपदी भव। प्रजाभ्यो मनुष्या उप ब्रूमि। प्रजावतां नः स्यान्माविराधीः॥”

अर्थ: इस फेरे में दोनों संतान की प्राप्ति और उनके उत्तम पालन का वचन देते हैं। हम अपने परिवार को आगे बढ़ाने, बच्चों के संस्कार, शिक्षा और चरित्र निर्माण में मिलकर योगदान देंगे।

यह फेरा वंशवृद्धि और परिवार के दायित्व का प्रतीक है। इसमें यह संकल्प होता है कि दंपत्ति आने वाली पीढ़ियों को धर्म, शिक्षा और संस्कारों से युक्त करेंगे।

छठा फेरा: हर परिस्थिति में साथ निभाने का वचन

मंत्र: “ॐ ऋतुभ्यः षष्ठपदी भव। ऋतुभ्यः मनुष्या उप ब्रूमि। सखासप्तपदी भव॥”

अर्थ: इस फेरे में दोनों एक-दूसरे के जीवन साथी बनने का दृढ़ संकल्प लेते हैं  कि हम हर मौसम, हर परिस्थिति और हर समय एक-दूसरे के साथ रहेंगे। चाहे जीवन में कितनी भी कठिनाइयां क्यों न आएं, हम एक-दूसरे का हाथ नहीं छोड़ेंगे।

यह फेरा सद्भाव, साथ और समर्पण का प्रतीक है। पति-पत्नी यह वचन लेते हैं कि वे एक-दूसरे के बिना जीवन अधूरा मानेंगे।

सातवां फेरा: आजीवन मित्रता, निष्ठा और साथ का वचन

मंत्र: “ॐ सख्यं सप्तपदी भव। सखायं ते गेम्यं। सख्यं ते मयोज्ञं। सख्यं ते मयोस्मि॥”

अर्थ: इस अंतिम फेरे में वर वधू से कहता है कि अब जब हम सात पग साथ चल चुके हैं, तुम मेरी सच्ची मित्र और जीवन संगिनी बन गई हो। हम सदा एक-दूसरे के प्रति निष्ठावान, ईमानदार और विश्वासपूर्ण रहेंगे।

सातवां फेरा मित्रता, विश्वास और अटूट बंधन का प्रतीक है। यह फेरा पति-पत्नी को आत्मिक रूप से एक कर देता है। अब दोनों के जीवन, विचार और कर्म एक-दूसरे से जुड़े माने जाते हैं।

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सप्तपदी का क्या है आध्यात्मिक अर्थ

विवाह के समय. सात फेरे केवल सात वचन नहीं, बल्कि जीवन के सात सूत्र हैं जो वैवाहिक जीवन की दिशा तय करते हैं। 
  1. पहला फेरा: अन्न, स्वास्थ्य और समृद्धि की स्थापना
  2. दूसरा फेरा: शक्ति, साहस और आत्मविश्वास
  3. तीसरा फेरा: धर्म, सत्य और चरित्र की रक्षा
  4. चौथा फेरा: प्रेम, स्नेह और आपसी सम्मान
  5. पांचवां फेरा: संतान और परिवार की वृद्धि
  6. छठा फेरा: हर परिस्थिति में साथ निभाने की प्रतिज्ञा
  7. सातवां फेरा: मित्रता, निष्ठा और आत्मीय संबंध की स्थिरता
इन सात फेरों के साथ विवाह संस्कार पूर्ण होता है, और पंडित जी वर-वधू को आशीर्वाद देते हैं कि “सप्तपदा भव सखा सखेति।” अर्थात “अब तुम दोनों सात पग साथ चल चुके हो, अतः तुम सच्चे मित्र और जीवन साथी बन गए हो।

धार्मिक दृष्टि से क्या है महत्व

वैदिक काल में विवाह संस्कारों के सोलह प्रमुख संस्कारों में से एक माना गया है। “सप्तपदी” के बाद ही विवाह पूर्ण और वैध माना जाता है। प्रत्येक मंत्र में ईश्वर साक्षी होता है और वह नवदंपत्ति को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार पुरुषार्थों की दिशा देता है।

आधुनिक संदर्भ में सात फेरों मतलब

आज भले ही जीवन की गति बदल गई हो, पर सात फेरों का संदेश आज भी उतना ही सार्थक है। ये हमें याद दिलाते हैं कि विवाह केवल आकर्षण या दिखावा नहीं, बल्कि विश्वास और त्याग का बंधन है। सात वचन केवल उस क्षण के नहीं, बल्कि पूरे जीवन के लिए हैं। पति-पत्नी दोनों को समान रूप से प्रेम, सम्मान और दायित्व निभाना चाहिए।

क्या मिलता है संदेश? 

हिंदू विवाह के सात फेरे जीवन के सबसे पवित्र क्षणों में से एक हैं। हर फेरा एक वचन है, हर वचन एक भावना, और हर भावना एक जीवन सिद्धांत। इन मंत्रों के माध्यम से दंपत्ति न केवल एक-दूसरे से, बल्कि ईश्वर से भी वचन लेते हैं कि वे जीवनभर प्रेम, विश्वास, धर्म और जिम्मेदारी से बंधे रहेंगे। अतः कहा गया है कि “सप्तपदी सखा सखेति।” अर्थात सात पग साथ चलने के बाद पति-पत्नी का संबंध केवल सांसारिक नहीं, बल्कि आत्मिक हो जाता है। जो जन्म-जन्मांतर तक साथ रहता है।

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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।

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