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Bharat Ka Charitr: रामायण में कैसा था भरत का चरित्र , जानिए

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
कोमल शर्मा
सार

Bharat Ka Charitr: आज हम आपके सामने रामायण में श्रीराम के छोटे भाई भरत का चरित्र चित्रण  करने जा रहे हैं। यदि भरत के मन में जरा सा भी दोष होता या वे सत्ता के लालच में बहक जाते तो आज भरत नाम कोई भी पिता अपने पुत्र का नहीं रखता।

Bharat Ka Charitr
Bharat Ka Charitr :आज हम आपके सामने रामायण में श्रीराम के छोटे भाई भरत का चरित्र चित्रण  करने जा रहे हैं। यदि भरत के मन में जरा सा भी दोष होता या वे सत्ता के लालच में बहक जाते तो आज भरत नाम कोई भी पिता अपने पुत्र का नहीं रखता। ठीक उसी तरह जैसे  इतिहास में मंथरा और कैकई बस एक ही हुई है।किन्तु यह भरत राम का प्रेम ही था कि आज तक हम भाइयों के रिश्ते की व्याख्या करने के लिए इन दोनों का नाम लेते हैं। आज के इस लेख में हम आपके सामने भरत चरित्र की व्याख्या ही करने जा रहे हैं।

भरत का चरित्र  कैसा था

जब भगवान श्रीराम का राज्याभिषेक होने वाला था तब भरत अपने छोटे भाई शत्रुघ्न के साथ कैकेय राज्य में थे। उन्हें कैकेय से समाचार मिला था कि उनके नाना अश्वपति का स्वास्थ्य ख़राब चल रहा है। इसलिए वे उनका हाल चाल जानने वहाँ चले गए थे। पीछे से उनकी माँ कैकेयी ने मंथरा की चालों में आकर भगवान श्रीराम को 14 वर्षों का वनवास और भरत को अयोध्या का राजा नियुक्त करवा दिया। इसी दुःख में भरत के पिता राजा दशरथ ने अपने प्राण त्याग दिए थे।

दशरथ के प्राण त्यागते ही कैकेय राज्य में तुरंत अयोध्या के दूत भेज कर भरत को बुलावा भेजा गया। भरत अभी तक सभी बात से अनजान थे। अयोध्या आकर उन्हें पता चला कि उनके पीछे महल में किस प्रकार के षडयंत्र रचे गए थे। जिस कारण उनके प्रिय भाई राम को वनवास मिला व पिता की मृत्यु हो गई। इसके बाद उन्होंने जो कदम उठाए, वही भरत जी का चरित्र दिखाते हैं। आइए उनके 10 प्रमुख कार्यों को जानते हैं।

1. अयोध्या का राज सिंहासन ठुकराना

उन्होंने उसी समय अयोध्या का राज सिंहासन ठुकरा दिया व अयोध्या की प्रजा से क्षमा मांगी। उन्होंने अयोध्या का राजा केवल और केवल भगवान श्रीराम को माना व स्वयं को उनका दास बताया। यह सूचना उन्होंने अपने सभी मंत्रियों, गुरुओं तक भी पहुंचा दी।धार्मिक यात्रा

2. माता कैकेयी का त्याग

भरत का चरित्र चित्रण कितना शुद्ध था, इसका उदाहरण इस बात से देखने को मिलता है कि उन्होंने इस षड्यंत्र के लिए उत्तरदायी अपनी माँ कैकई तक का त्याग कर दिया था। उन्होंने ना केवल कैकई को माँ मानने से मना कर दिया था बल्कि यहाँ तक कह दिया था कि वे आगे से उनका मुँह तक नहीं देखेंगे। 

3. मंथरा को दंड

शत्रुघ्न मंथरा को भरी सभा में घसीटकर लेकर आए व उसकी हत्या करने लगे। तब भरत ने उन्हें स्त्री हत्या करने से रोका व कहा कि यह भगवान श्रीराम के आदर्शों के विरुद्ध है। इसलिए उन्होंने मंथरा को एक कमरे में बंद कर दिया व भगवान राम के लौटने पर उसका दंड निर्धारित करने का निर्णय लिया।

4. दशरथ का अंतिम संस्कार

चूँकि दशरथ के दो पुत्रों (राम व लक्ष्मण) को वनवास हुआ था व दो पुत्र (भरत व शत्रुघ्न) कैकेय में थे इसलिए उनका अंतिम संस्कार नहीं हो पाया था। बहुत दिनों तक उनका शव तेल व अन्य दिव्य पदार्थों की सहायता से सुरक्षित रखा गया था। इसलिए भरत ने सर्वप्रथम अपन पिता के शव का दाह संस्कार किया व उन्हें मुखाग्नि दी।

5. भरत राम का प्रेम

इसके बाद भरत अपने परिवार, गुरु व सेना के साथ भगवान श्रीराम को वापस लेने चित्रकूट  गए। वहाँ जाकर उन्होंने भगवान श्रीराम से क्षमा मांगी व उन्हें वापस अयोध्या चलने को कहा। तब भगवान श्रीराम ने अपना पिता को दिए वचन के अनुसार वापस चलने से मना कर दिया। इसलिए भरत केवल उनकी चरण पादुका लेकर वापस लौट आए।

6. सिंहासन पर राम चरण पादुका

अयोध्या आकर उन्होंने भगवान श्रीराम के चरण पादुका को सिंहासन पर रखा। उसे ही सांकेतिक रूप से राम का अंग मानकर अयोध्या का राज सिंहासन संभाला।

7. वनवासी का जीवन

चूँकि भगवान श्रीराम ने भरत को 14 वर्षों तक अयोध्या को संभालने का आदेश दिया था। इसलिए भरत ने अयोध्या का राज सिंहासन तो संभाला लेकिन श्रीराम की तरह वनवासी रहते हुए। उन्होंने अपना सब राजसी सुख त्याग दिया व अयोध्या के समीप नंदीग्राम वन में एक कुटिया बनाकर रहने लगे।

8. भगवान राम से नीचे सोना

चूँकि भगवान श्रीराम वन में भूमि पर सोते थे, इसलिए भरत ने भूमि पर एक फीट का गड्ढा किया व भगवान श्रीराम से नीचे सोना चुना। उनका स्थान भगवान श्रीराम से नीचे था। इसलिए वे उनसे भी नीचे सोते थे। भरत राम का प्रेम (Bharat Ram Ka Prem) कितना शुद्ध था, वह इसी बात से ही पता चल जाता है।

9. एक दिन की देरी तो भरत का आत्म दाह

जब चित्रकूट में भरत श्रीराम से मिले थे तो उन्होंने उनसे वचन लिया था कि यदि वे 14 वर्ष समाप्त होने के पश्चात एक दिन की भी देरी करेंगे तो वे अपना आत्म दाह कर लेंगे।

10. अयोध्या का राज श्रीराम को

जब प्रभु श्रीराम 14 वर्षों के पश्चात पुनः अयोध्या लौटे तो भरत ने उन्हें वैसी ही अयोध्या लौटाई जिस प्रकार वे छोड़कर गए थे। इस प्रकार भरत ने अपने भाई का संपूर्ण कर्तव्य निभाया व धर्म की स्थापना में अपना अमूल्य योगदान दिया।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)
 

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