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Pitru Paksha: हरिद्वार में पिंडदान क्यों माना जाता है खास? जानें गंगा तट पर पितरों की मुक्ति का धार्मिक महत्व

जीवांजलि, धर्म डेस्कPublished by:
Shakshi
सार

Pitru Paksha: हिंदू धर्म में गंगा को मां का स्वरूप माना गया है। पुराणों में गंगा के पृथ्वी पर अवतरण की कथा राजा भगीरथ से जुड़ी हुई है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों की मुक्ति के लिए कठोर तपस्या की थी। 

Pitru Paksha: 
Pitru Paksha: पितृ पक्ष को हिंदू धर्म में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और तर्पण का विशेष समय माना गया है। इन दिनों लोग अपने दिवंगत पितरों के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करते हैं। देश में कई ऐसे तीर्थस्थल हैं, जहां पितरों के निमित्त किए गए कर्मकांड का विशेष धार्मिक महत्व बताया गया है। इनमें हरिद्वार का स्थान भी बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। हरिद्वार में गंगा तट पर पिंडदान और तर्पण करने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। धार्मिक मान्यता है कि गंगा के पवित्र जल में पितरों के लिए किए गए तर्पण और पिंडदान से उन्हें शांति और मुक्ति की प्राप्ति होती है।

हरिद्वार को केवल गंगा नगरी ही नहीं, बल्कि देवभूमि का प्रमुख तीर्थ माना जाता है। यहां हर की पौड़ी सहित गंगा के विभिन्न घाटों पर पितृ कर्म किए जाते हैं। पितृ पक्ष के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग अपने पूर्वजों के निमित्त गंगा तट पर पहुंचते हैं। मान्यता के अनुसार, गंगा में स्नान, तर्पण और पिंडदान का धार्मिक फल इसलिए विशेष माना जाता है, क्योंकि गंगा को स्वयं मोक्षदायिनी और पापों का नाश करने वाली पवित्र नदी माना गया है।

हरिद्वार में गंगा तट पर पिंडदान की धार्मिक मान्यता

हिंदू धर्म में गंगा को मां का स्वरूप माना गया है। पुराणों में गंगा के पृथ्वी पर अवतरण की कथा राजा भगीरथ से जुड़ी हुई है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों की मुक्ति के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर मां गंगा पृथ्वी पर आने के लिए तैयार हुईं। गंगा के पृथ्वी पर आने की कथा में भगवान शिव की भी महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। मान्यता है कि जब गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर उतरने वाली थीं, तब उनके वेग को संभालना सामान्य नहीं था। राजा भगीरथ ने भगवान शिव की आराधना की। इसके बाद भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में धारण किया और उनकी धाराओं को नियंत्रित करके पृथ्वी पर प्रवाहित किया।

राजा भगीरथ गंगा की धारा को अपने साथ उस स्थान तक लेकर गए, जहां उनके पूर्वजों के अवशेष थे। गंगा के पवित्र जल के स्पर्श से उनके पूर्वजों को मुक्ति प्राप्त हुई। इसी कथा के कारण गंगा को पितरों की मुक्ति से जोड़कर देखा जाता है। हरिद्वार में गंगा की पूजा और गंगा तट पर किए जाने वाले पितृ कर्मों के पीछे इसी धार्मिक मान्यता का विशेष प्रभाव माना जाता है।

राजा भगीरथ और पितरों की मुक्ति की कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, राजा सगर के हजारों पुत्रों का संबंध पितरों की मुक्ति से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ किया था। यज्ञ का घोड़ा देवताओं के राजा इंद्र से संबंधित एक घटना के कारण कपिल मुनि के आश्रम के पास पहुंच गया। राजा सगर के पुत्र घोड़े की खोज करते हुए कपिल मुनि के आश्रम तक पहुंचे और वहां उन्होंने कपिल मुनि पर घोड़ा चुराने का संदेह किया। कथा के अनुसार, राजा सगर के पुत्रों ने कपिल मुनि का अपमान किया। इससे कपिल मुनि के तेज से वे भस्म हो गए। उनके उद्धार के लिए गंगा को पृथ्वी पर लाना आवश्यक माना गया। कई पीढ़ियों के बाद राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए कठोर तपस्या की।

ब्रह्मा जी ने भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर गंगा को पृथ्वी पर भेजने की अनुमति दी। लेकिन गंगा का वेग इतना प्रचंड था कि पृथ्वी उसे सहन नहीं कर सकती थी। तब भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में धारण किया। इसके बाद गंगा की धारा पृथ्वी पर उतरी और भगीरथ के पीछे-पीछे चलती हुई उस स्थान तक पहुंची, जहां उनके पूर्वजों की भस्म पड़ी थी। गंगा के जल के स्पर्श से राजा सगर के पुत्रों को मुक्ति मिली। इसी वजह से गंगा को मोक्षदायिनी कहा गया और पितरों के उद्धार से उनका संबंध स्थापित हुआ। यही धार्मिक कथा गंगा के किनारे किए जाने वाले पितृ कर्मों की मान्यता का एक प्रमुख आधार मानी जाती है।

हरिद्वार में पिंडदान को क्यों माना जाता है विशेष

हरिद्वार में गंगा हिमालय से निकलकर मैदानी क्षेत्र में प्रवेश करती हैं। धार्मिक दृष्टि से यह स्थान अत्यंत पवित्र माना जाता है। हर की पौड़ी को हरिद्वार का प्रमुख धार्मिक स्थल माना जाता है, जहां गंगा स्नान और पूजा के साथ पितरों के लिए तर्पण भी किया जाता है। पिंडदान में सामान्य रूप से चावल, जौ, तिल और अन्य पूजन सामग्री से पिंड बनाए जाते हैं। इन पिंडों को पितरों को समर्पित किया जाता है। इसके साथ मंत्रोच्चार के बीच गंगा जल से तर्पण किया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि पिंड के माध्यम से पितरों का स्मरण और उनका पूजन किया जाता है तथा गंगा जल के माध्यम से उन्हें अर्पित किया गया तर्पण उनके लिए कल्याणकारी माना जाता है।

पितृ पक्ष में हरिद्वार के घाटों पर विशेष रूप से पितृ कर्म किए जाते हैं। पुरोहितों की देखरेख में परिवार के लोग अपने पूर्वजों के नाम और गोत्र का स्मरण करते हुए तर्पण और पिंडदान करते हैं। धार्मिक विधि के अनुसार पहले संकल्प लिया जाता है और इसके बाद पिंड अर्पित किए जाते हैं। अंत में गंगा में तर्पण किया जाता है।

गंगा तट पर तर्पण और श्राद्ध की मान्यता

श्राद्ध और तर्पण हिंदू धार्मिक परंपरा में पितरों के प्रति किए जाने वाले प्रमुख कर्म माने गए हैं। पितृ पक्ष के दौरान प्रत्येक तिथि का संबंध किसी न किसी पूर्वज की मृत्यु तिथि से माना जाता है। जिस तिथि को व्यक्ति के पितर का निधन हुआ हो, उसी तिथि पर श्राद्ध करने की परंपरा है। यदि मृत्यु तिथि ज्ञात न हो तो सर्वपितृ अमावस्या को श्राद्ध करने की धार्मिक परंपरा बताई गई है। हरिद्वार में गंगा तट पर किए जाने वाले तर्पण में पितरों के नाम, गोत्र और स्मरण के साथ जल अर्पित किया जाता है। इसमें काले तिल का भी विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक विधि में तिल मिश्रित जल को पितरों को अर्पित किया जाता है। इसके बाद पिंड अर्पित करके पितरों के लिए प्रार्थना की जाती है।

गंगा को मोक्षदायिनी क्यों कहा गया

हिंदू धर्मग्रंथों में गंगा को पवित्र और मोक्षदायिनी नदी के रूप में वर्णित किया गया है। गंगा के पृथ्वी पर अवतरण की कथा स्वयं पितरों के उद्धार से जुड़ी हुई है। राजा भगीरथ ने गंगा को पृथ्वी पर लाकर अपने पूर्वजों को मुक्ति दिलाई थी। इसी कारण गंगा के जल को पितृ कर्मों के लिए अत्यंत पवित्र माना गया। धार्मिक मान्यता के अनुसार गंगा में स्नान और गंगा जल का प्रयोग कई प्रकार के धार्मिक संस्कारों में किया जाता है। मृत्यु के बाद भी गंगा जल का प्रयोग धार्मिक संस्कारों में किया जाता है। इसी धार्मिक परंपरा के कारण गंगा तट पर श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान को विशेष महत्व मिला।

हरिद्वार के घाटों पर पितृ पक्ष में बढ़ती है धार्मिक गतिविधियां

पितृ पक्ष के दौरान हरिद्वार के गंगा घाटों पर विशेष धार्मिक गतिविधियां देखने को मिलती हैं। सुबह से ही लोग अपने पितरों के निमित्त स्नान, तर्पण और पिंडदान के लिए घाटों पर पहुंचते हैं। पुरोहितों द्वारा विधि-विधान से श्राद्ध कर्म कराया जाता है। परिवार के सदस्य पितरों का नाम और गोत्र लेकर संकल्प करते हैं और गंगा जल में तर्पण अर्पित करते हैं।

धार्मिक मान्यता में पिंडदान केवल मृत व्यक्ति के लिए किया जाने वाला कर्म नहीं है, बल्कि इसे पितृ ऋण से जुड़े महत्वपूर्ण संस्कार के रूप में देखा जाता है। हरिद्वार जैसे पवित्र तीर्थ में गंगा के सानिध्य में यह कर्म किए जाने के कारण इसकी धार्मिक महत्ता और अधिक मानी जाती है। हरिद्वार में पिंडदान की परंपरा का संबंध गंगा, राजा भगीरथ और पितरों की मुक्ति की प्राचीन पौराणिक कथा से जुड़ा हुआ है। यही वजह है कि पितृ पक्ष के दौरान गंगा तट पर अपने पूर्वजों के निमित्त पिंडदान और तर्पण करने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार मोक्षदायिनी गंगा के पवित्र जल में पितरों को अर्पित किया गया तर्पण और पिंडदान उनके प्रति श्रद्धा और उनके उद्धार के लिए किया जाने वाला महत्वपूर्ण धार्मिक कर्म माना जाता है।


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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।) 

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