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Sharad Purnima: शरद पूर्णिमा क्यों मनाई जाती हैं, जानें कैसे शुरू हुई परंपरा?

JeevanjaliPublished by:
नीरज पटेल
सार

Sharad Purnima 2025: शरद पूर्णिमा का पर्व आध्यात्मिक, धार्मिक और वैज्ञानिक सभी दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। इस दिन चंद्रमा की कृपा, मां लक्ष्मी की आराधना और भगवान श्रीकृष्ण की रासलीला की स्मृति लोगों के जीवन को भक्ति और आनंद से भर देती है। 

शरद पूर्णिमा क्यों मनाई जाती हैं, जानें कैसे शुरू हुई परंपरा?
Sharad Purnima Parampara Niyam: हिन्दू पंचांग के अनुसार, आश्विन माह की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहा जाता है। यह तिथि धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। मान्यता है कि इस दिन चंद्रमा अपनी पूर्ण कलाओं से युक्त होकर पृथ्वी पर अमृत बरसाता है। इसी कारण इसे कोजागरी पूर्णिमा और रास पूर्णिमा भी कहा जाता है। भारत के विभिन्न हिस्सों में यह पर्व अलग-अलग रीति-रिवाजों और मान्यताओं के साथ मनाया जाता है। आइए जानते हैं शरद पूर्णिमा का महत्व और इसकी परंपरा की शुरुआत कैसे हुई।

शास्त्रों में उल्लेख है कि शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा की किरणों में अमृत तत्व होता है। यह अमृत मानव जीवन के लिए स्वास्थ्यवर्धक और ऊर्जा प्रदान करने वाला माना गया है। इस दिन मां लक्ष्मी की आराधना का भी विशेष महत्व है। मान्यता है कि रातभर जागरण कर मां लक्ष्मी का स्मरण करने से घर में धन और समृद्धि का आगमन होता है।

वैष्णव परंपरा में शरद पूर्णिमा का महत्व और भी अधिक है। कहा जाता है कि इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने वृंदावन में गोपियों के साथ महानंद रास किया था। इस कारण इसे रास पूर्णिमा भी कहा जाता है।

परंपरा की शुरुआत

  1. चंद्रमा और अमृत की मान्यता: पुराणों में वर्णन मिलता है कि समुद्र मंथन के समय अमृत प्राप्त हुआ था और चंद्रमा को अमृत का कारक माना गया। शरद पूर्णिमा की रात जब चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से युक्त होता है, तब उसकी किरणों में अमृत बरसता है।
  2. मां लक्ष्मी की कथा: एक मान्यता यह भी है कि शरद पूर्णिमा की रात मां लक्ष्मी पृथ्वी पर विचरण करती हैं और जो व्यक्ति इस रात जागरण करके भक्ति करता है, उसे देवी विशेष कृपा प्रदान करती हैं।
  3. कृष्ण-रास लीला: भागवत पुराण के अनुसार, इसी तिथि को श्रीकृष्ण ने गोपियों के साथ दिव्य रास किया था। इसे आत्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक माना जाता है।

कैसे मनाई जाती है शरद पूर्णिमा

  1. चंद्रमा का दर्शन: इस रात लोग आकाश में पूर्णिमा के चंद्रमा का दर्शन करते हैं और उसे अर्घ्य अर्पित करते हैं।
  2. खीर की परंपरा: शरद पूर्णिमा की रात खीर बनाने और उसे खुले आकाश के नीचे रखने की परंपरा है। मान्यता है कि चंद्रमा की किरणों से स्पर्शित यह खीर अमृत तुल्य बन जाती है। अगले दिन इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।
  3. जागरण और भजन-कीर्तन: इस रात मंदिरों और घरों में भजन-कीर्तन और देवी-देवताओं की आराधना होती है। भक्त रातभर जागकर पूजा करते हैं।
  4. दान और व्रत: कई श्रद्धालु इस दिन उपवास करते हैं और गरीबों को दान देते हैं। विशेष रूप से अन्न, वस्त्र और दक्षिणा का दान शुभ माना जाता है।

शरद पूर्णिमा से जुड़ी मान्यताएं

मान्यता है कि इस दिन व्रत और पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इस दिन चंद्रमा का दर्शन मानसिक शांति और रोगों से मुक्ति दिलाता है। शरद पूर्णिमा की रात जागरण करने से घर में दरिद्रता का नाश होता है और मां लक्ष्मी का स्थायी वास होता है। जो दंपति संतान सुख की इच्छा रखते हैं, वे इस रात भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करके वरदान प्राप्त कर सकते हैं।

आयुर्वेद के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात में चंद्रमा की किरणों का सेवन करने से शरीर को शीतलता और रोग प्रतिरोधक शक्ति मिलती है। चंद्रमा की रोशनी में रखी खीर में विटामिन-डी और अन्य तत्वों का प्रभाव बढ़ जाता है। यही कारण है कि इसे प्रसाद रूप में ग्रहण करना स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना जाता है।

समाज और संस्कृति 

शरद पूर्णिमा केवल धार्मिक पर्व ही नहीं बल्कि सामाजिक उत्सव भी है। गांव-गांव में मेले लगते हैं, लोग सामूहिक भजन-कीर्तन करते हैं और खीर का प्रसाद बांटते हैं। इससे सामाजिक एकता और भाईचारा बढ़ता है।

शरद पूर्णिमा का धार्मिक महत्व

शरद पूर्णिमा का पर्व आध्यात्मिक, धार्मिक और वैज्ञानिक सभी दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। इस दिन चंद्रमा की कृपा, मां लक्ष्मी की आराधना और भगवान श्रीकृष्ण की रासलीला की स्मृति लोगों के जीवन को भक्ति और आनंद से भर देती है। खीर की परंपरा, जागरण और भजन-कीर्तन से यह रात आस्था और उल्लास का अद्भुत संगम बन जाती है। यही कारण है कि शरद पूर्णिमा आज भी हर घर और हर समाज में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जाती है।

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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।

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