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Ekadashi: एकादशी के दिन अन्न वर्जित क्यों है, स्वामी योगेश्वराचार्य जी महाराज ने बताया ये कारण

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
स्वामी योगेश्वराचार्य जी महाराज
सार

Ekadashi Vrat: एकादशी के दिन अन्न न खाने की परंपरा केवल डर या अंधविश्वास पर आधारित नहीं है, बल्कि इसके पीछे आत्मशुद्धि, संयम और आध्यात्मिक उन्नति का उद्देश्य छिपा हुआ है। 
 

एकादशी के दिन अन्न वर्जित क्यों है, स्वामी योगेश्वराचार्य जी महाराज ने बताया ये कारण
Ekadashi Vrat Niyam: एकादशी के दिन अन्न न खाने की परंपरा के पीछे धार्मिक और आध्यात्मिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। स्वामी योगेश्वराचार्य जी महाराज ने इस विषय को एक सरल कथा के माध्यम से समझाया है, जिससे आम व्यक्ति भी इसका अर्थ आसानी से समझ सके। कथा के अनुसार, एक बार एक भक्त ने गंगा जी से प्रश्न किया। उसने कहा कि माता, दुनिया भर के लोग अपने पाप धोने के लिए आपके पास आते हैं। इतने सारे पाप आप कहां ले जाती हैं? उनका क्या करती हैं?” यह एक स्वाभाविक सवाल था, क्योंकि हर व्यक्ति अपने पापों से मुक्त होने के लिए गंगा स्नान करता है।

गंगा जी ने मुस्कुराकर उत्तर दिया कि वे उन पापों को अपने पास नहीं रखतीं। जब भक्त ने पूछा कि फिर उन पापों का क्या होता है, तो गंगा जी ने बताया कि वे उन पापों को एक विशेष प्रक्रिया के माध्यम से आगे भेज देती हैं। उन्होंने कहा कि सर्दी के समय वे उन पापों को वाष्प (भाप) के रूप में सूर्य देव को सौंप देती हैं। सूर्य की गर्मी से वह वाष्प आकाश में चली जाती है। इसके बाद जब वर्षा का समय आता है, तो वही पापयुक्त जल बारिश बनकर धरती पर गिरता है। यह जल पेड़-पौधों पर पड़ता है और उन्हीं के माध्यम से अन्न का उत्पादन होता है।

भक्ति, उपवास और आत्मशुद्धि 

इस प्रकार, जो अन्न उत्पन्न होता है, उसमें सूक्ष्म रूप से वे पाप भी शामिल माने जाते हैं। अब प्रश्न यह उठता है कि फिर यह अन्न हम रोज खाते हैं, तो उसमें समस्या क्या है? इसका उत्तर एकादशी से जुड़ा हुआ है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, एकादशी का दिन अत्यंत पवित्र माना जाता है। यह दिन भगवान की भक्ति, उपवास और आत्मशुद्धि के लिए विशेष होता है। कहा जाता है कि इस दिन अन्न में पापों का प्रभाव अधिक सक्रिय रहता है। इसलिए जो व्यक्ति इस दिन अन्न का सेवन करता है, वह अनजाने में उन पापों को अपने भीतर ले लेता है।

इसी कारण से एकादशी के दिन अन्न खाने की मनाही बताई गई है। इसके स्थान पर फल, दूध या अन्य हल्के और सात्विक पदार्थों का सेवन करने की सलाह दी जाती है। इसका उद्देश्य केवल शारीरिक उपवास नहीं, बल्कि मानसिक और आत्मिक शुद्धि भी है।

कर्मों का प्रभाव 

यह कथा हमें सिखाती है कि हमारे कर्मों का प्रभाव कहीं न कहीं बना रहता है। हम जो करते हैं, उसका परिणाम हमें किसी न किसी रूप में मिलता है। इसलिए जीवन में अच्छे कर्म करना, संयम रखना और समय-समय पर आत्मचिंतन करना बहुत जरूरी है। एकादशी का व्रत केवल भोजन से जुड़ा नियम नहीं है, बल्कि यह एक अनुशासन है। यह हमें अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखने, भगवान का स्मरण करने और अपने भीतर की अशुद्धियों को दूर करने का अवसर देता है। एकादशी के दिन अन्न न खाने की परंपरा केवल डर या अंधविश्वास पर आधारित नहीं है, बल्कि इसके पीछे आत्मशुद्धि, संयम और आध्यात्मिक उन्नति का उद्देश्य छिपा हुआ है। जो व्यक्ति इस नियम का पालन करता है, वह अपने जीवन में शांति, संतुलन और सकारात्मकता का अनुभव कर सकता है।

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