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Swami Yogeshwaracharya Ji Maharaj: जीवन में कौन बन सकता है जगद्गुरु? स्वामी योगेश्वराचार्य जी महाराज ने बताया

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
नीरज के. पटेल
सार

Akhara Tradition: जगद्गुरु बनना कोई साधारण बात नहीं है। यह पद वर्षों की साधना, शास्त्रज्ञान, त्याग और समाज के कल्याण के लिए किए गए कार्यों का परिणाम होता है।

Swami Yogeshwacharya Ji Maharaj
Religious Recognition: स्वामी योगेश्वराचार्य जी महाराज बताते हैं कि हमारे सनातन धर्म में प्रत्येक पद और सम्मान के लिए कुछ निश्चित योग्यताएं होती हैं। जिस प्रकार कोई व्यक्ति आईएएस, आईपीएस या किसी अन्य उच्च पद पर पहुंचने के लिए कठिन परीक्षाएं उत्तीर्ण करता है, उसी प्रकार धार्मिक क्षेत्र में भी बड़े पद और उपाधियां बिना योग्यता के प्राप्त नहीं होती हैं। जगद्गुरु की उपाधि भी अत्यंत सम्मानित और गौरवशाली मानी जाती है, जिसे केवल योग्य संतों और आचार्यों को ही प्रदान किया जाता है।

प्राचीन समय से ही जगद्गुरु की एक निश्चित परंपरा रही है। स्वामी जी के अनुसार पहले चार वैष्णवाचार्य और एक शैवाचार्य इस पद की प्रतिष्ठा और मान्यता प्रदान करते थे। बाद में एक और वैष्णवाचार्य को इस परंपरा में सम्मिलित किया गया। इस प्रकार पाँच वैष्णवाचार्य और एक शैवाचार्य मिलकर किसी योग्य संत को जगद्गुरु की उपाधि प्रदान करते थे। यह केवल एक सम्मान नहीं, बल्कि धर्म, शास्त्र और समाज के प्रति उनकी उत्कृष्ट सेवाओं की स्वीकृति होती थी।

क्या केवल धन से मिल सकती है उपाधि?

आज के समय में कई लोगों के मन में यह प्रश्न उठता है कि क्या धन के बल पर कोई भी व्यक्ति जगद्गुरु की उपाधि प्राप्त कर सकता है। इस विषय में स्वामी योगेश्वराचार्य जी स्पष्ट रूप से कहते हैं कि वास्तविक परंपरा में ऐसा नहीं होता। जगद्गुरु बनने के लिए व्यक्ति को शास्त्रों का गहन ज्ञान, आध्यात्मिक साधना, धर्म के प्रति समर्पण और समाज में व्यापक सम्मान प्राप्त होना आवश्यक है। केवल आर्थिक सामर्थ्य किसी को इस पद का अधिकारी नहीं बना सकती।

अखाड़ों और धार्मिक संस्थाओं की भूमिका

अखाड़े और धार्मिक संस्थाएं सनातन परंपराओं के संरक्षण और संवर्धन का कार्य करती हैं। वे किसी भी संत या आचार्य की विद्वत्ता, साधना, चरित्र और धर्मसेवा का मूल्यांकन करने के बाद ही उसे विशेष सम्मान प्रदान करती हैं। यद्यपि समय-समय पर विभिन्न प्रकार की चर्चाएँ और आरोप सामने आते रहते हैं, लेकिन सनातन परंपरा का मूल सिद्धांत यही है कि सम्मान और उपाधि योग्यता, तपस्या और धर्मसेवा के आधार पर ही मिलनी चाहिए।

धर्म के प्रति समर्पण 

स्वामी योगेश्वराचार्य जी महाराज के अनुसार, जगद्गुरु बनना कोई साधारण बात नहीं है। यह पद वर्षों की साधना, शास्त्रज्ञान, त्याग और समाज के कल्याण के लिए किए गए कार्यों का परिणाम होता है। इसलिए जगद्गुरु की उपाधि का वास्तविक आधार धन नहीं, बल्कि व्यक्ति की आध्यात्मिक योग्यता, विद्वत्ता और धर्म के प्रति उसका समर्पण है।

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