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Swami Ashutoshanand Giri Ji: नियमित पूजा को सही ढंग से कैसे करें, स्वामी आशुतोषानंद गिरि जी ने बताई सरल विधि

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
स्वामी आशुतोषानंद गिरि जी महाराज
सार

Religious Life: पूजा को कठिन या बोझिल न समझें। श्रद्धा, नियमितता और सरलता के साथ पंचदेवों का स्मरण, सूर्य को जल अर्पण, गुरु मंत्र का जप और भगवान की उपासना ही दैनिक पूजा का सर्वोत्तम मार्ग है। 
 

Swami Ashutoshanand Giri Ji Maharaj
Regular Puja in Life: अक्सर लोग प्रतिदिन पूजा तो करते हैं, अनेक मंत्रों का पाठ भी करते हैं, लेकिन उनके मन में यह प्रश्न बना रहता है कि पूजा का सही क्रम क्या होना चाहिए और किस प्रकार पूजा करने से उसका पूर्ण लाभ प्राप्त हो सकता है। स्वामी आशुतोषानंद गिरि जी महाराज कहते हैं कि पूजा का मूल उद्देश्य भगवान के प्रति श्रद्धा, समर्पण और आत्मिक शुद्धि है। पूजा केवल कर्मकांड नहीं है, बल्कि ईश्वर के साथ जुड़ने का एक माध्यम है। यदि श्रद्धा और नियमपूर्वक पूजा की जाए तो जीवन में शांति, सकारात्मकता और आत्मबल का विकास होता है।

महाराज जी बताते हैं कि सनातन धर्म में पंचदेव उपासना की परंपरा अत्यंत प्राचीन और महत्वपूर्ण है। इन पांच देवताओं में भगवान शिव, माता पार्वती या दुर्गा, भगवान गणेश, भगवान विष्णु और सूर्य भगवान शामिल हैं। इनमें से तीन देवता भगवान शिव के परिवार से हैं- भगवान शिव, माता जगदंबा और श्रीगणेश। चौथे भगवान विष्णु हैं और पांचवें सूर्य देव हैं।

इन पंचदेवों का स्मरण और पूजन करने से जीवन में संतुलन, सुख और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है। इसलिए प्रत्येक सनातनी को इन पांच देवताओं के प्रति श्रद्धा रखनी चाहिए और प्रतिदिन उनका स्मरण करना चाहिए।

सूर्य उपासना से करें दिन की शुरुआत 

महाराज जी के अनुसार दैनिक पूजा की शुरुआत सूर्य भगवान को जल अर्पित करने से करनी चाहिए। प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करने के बाद एक लोटा जल लेकर सूर्य देव को अर्पित करें। सूर्य जीवन, ऊर्जा और स्वास्थ्य के प्रतीक हैं। नियमित रूप से सूर्य को जल अर्पित करने से शारीरिक स्वास्थ्य बेहतर रहता है, मन में उत्साह बना रहता है और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है। यह एक अत्यंत सरल लेकिन प्रभावशाली साधना है, जिसे हर व्यक्ति आसानी से कर सकता है।

घर के मंदिर में सरल पूजा विधि

सूर्य उपासना के बाद घर के मंदिर में जाकर भगवान का स्मरण करना चाहिए। यदि घर में शिवलिंग स्थापित है तो भगवान शिव को जल अर्पित करें। यदि बिल्वपत्र या पुष्प उपलब्ध हों तो उन्हें भी अर्पित करें। यदि कुछ भी उपलब्ध न हो तो केवल श्रद्धा से जल चढ़ाना भी पर्याप्त है। इसके बाद भगवान विष्णु को पुष्प अर्पित करें और प्रणाम करें। माता दुर्गा का स्मरण करके उन्हें प्रणाम करें तथा भगवान गणेश की पूजा करें। पूजा के दौरान प्रत्येक देवता के लिए कम से कम एक श्लोक या मंत्र का उच्चारण अवश्य करें। महाराज जी का कहना है कि बच्चों को भी इन पांच देवताओं के छोटे-छोटे श्लोक याद कराए जाने चाहिए ताकि वे भी श्रद्धा और ज्ञान के साथ पूजा कर सकें।

गुरु मंत्र और साधना का महत्व

यदि किसी व्यक्ति ने किसी गुरु से दीक्षा प्राप्त की है और गुरु मंत्र मिला है, तो दैनिक पूजा के बाद उस मंत्र का जप अवश्य करना चाहिए। गुरु द्वारा बताए गए पाठ, स्तोत्र या साधना का नियमित अभ्यास आध्यात्मिक प्रगति का महत्वपूर्ण साधन है। गुरु मंत्र का जप मन को एकाग्र करता है, नकारात्मक विचारों को दूर करता है और साधक को ईश्वर के निकट ले जाता है। नियमित साधना से आत्मविश्वास बढ़ता है और जीवन की कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति मिलती है।

वासनाओं को कैसे दूर करें?

जब महाराज जी से पूछा गया कि मन में उत्पन्न होने वाली वासनाओं और विकारों को कैसे समाप्त किया जाए, तो उन्होंने बहुत सरल उत्तर दिया- “वासना का उपाय उपासना है।” उनके अनुसार जब मन संसार की इच्छाओं, मोह और विकारों में भटकता है तो वासनाएं बढ़ती हैं, लेकिन जब वही मन भगवान की भक्ति, जप, ध्यान और उपासना में लग जाता है तो धीरे-धीरे वासनाएं कमजोर होने लगती हैं। मन शुद्ध और शांत बनने लगता है।

उपासना से मन होता है निर्मल

‘उपासना’ शब्द का अर्थ है- भगवान के समीप बैठना। जब व्यक्ति प्रतिदिन कुछ समय भगवान के निकट बैठकर उनका स्मरण करता है, उनका नाम जपता है और अपने मन को ईश्वर में लगाता है, तब उसके भीतर सकारात्मक परिवर्तन शुरू हो जाते हैं। मन की अशांति कम होती है, विचार पवित्र बनते हैं और जीवन में आध्यात्मिक जागरण होने लगता है। स्वामी आशुतोषानंद गिरि जी महाराज का संदेश है कि पूजा को कठिन या बोझिल न समझें। श्रद्धा, नियमितता और सरलता के साथ पंचदेवों का स्मरण, सूर्य को जल अर्पण, गुरु मंत्र का जप और भगवान की उपासना ही दैनिक पूजा का सर्वोत्तम मार्ग है। यही साधना धीरे-धीरे मन की वासनाओं को समाप्त कर व्यक्ति को शांति, शक्ति और ईश्वर की कृपा के निकट ले जाती है।

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