विज्ञापन
Home  dharm  saint stories  jagadguru rambhadracharya ji maharaj told what is the significance of sashtang pranam in life

Jagadguru Rambhadracharya Ji: जीवन में साष्टांग प्रणाम का क्या है महत्व? जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी ने बताया

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
श्री रामभद्राचार्य जी महाराज
सार

Spiritual Life: साष्टांग प्रणाम केवल धार्मिक क्रिया नहीं है, बल्कि यह जीवन में विनम्रता, अनुशासन और आदर की भावना विकसित करता है। यह व्यक्ति को अहंकार से दूर रखकर उसे सरल और शांत बनाता है।
 

Jagadguru Rambhadracharya Ji
Sashtang Pranam Ka Mahatva: साष्टांग प्रणाम भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा में अत्यंत पवित्र और गहरा आध्यात्मिक महत्व रखने वाली एक विधि है। यह केवल शरीर से किया जाने वाला झुकाव नहीं है, बल्कि यह मन, बुद्धि और आत्मा की पूर्ण समर्पण की अवस्था को दर्शाता है। जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी महाराज के अनुसार साष्टांग प्रणाम का अर्थ केवल “आठ अंगों से भूमि को स्पर्श करना” नहीं है, बल्कि यह जीवन के आठ प्रकार के समर्पण का प्रतीक है।

साष्टांग शब्द का अर्थ होता है “आठ अंगों सहित” और प्रणाम का अर्थ होता है “नमन या आदरपूर्वक झुकना”। परंपरागत रूप से साष्टांग प्रणाम में शरीर के आठ अंगों का उपयोग किया जाता है, जिनमें व्यक्ति भूमि पर पूरी श्रद्धा के साथ झुककर अपने अहंकार का त्याग करता है। यह प्रक्रिया केवल शारीरिक नहीं होती, बल्कि इसके पीछे गहरी भावनात्मक और आध्यात्मिक भावना होती है।

आठ अंगों का आध्यात्मिक अर्थ

जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी महाराज बताते हैं कि साष्टांग प्रणाम केवल शरीर के अंगों का कार्य नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के पूरे व्यक्तित्व का समर्पण है। इसमें सिर, हृदय, दृष्टि, मन, वाणी, चरण, हाथ और घुटने- इन सभी का प्रतीकात्मक उपयोग होता है। सिर से व्यक्ति अहंकार का त्याग करता है और झुककर विनम्रता प्रकट करता है। हृदय से वह श्रद्धा और प्रेम अर्पित करता है। दृष्टि से वह सामने वाले में ईश्वर के दर्शन करने का भाव रखता है।

मन और वाणी का समर्पण

साष्टांग प्रणाम में मन का विशेष महत्व है क्योंकि सच्चा प्रणाम तभी माना जाता है जब मन में कोई अहंकार या द्वेष न हो। मन पूरी तरह से श्रद्धा में लीन होना चाहिए। वाणी का अर्थ है कि व्यक्ति अपने शब्दों से भी सम्मान और आदर प्रकट करे। केवल शरीर से झुक जाना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि वाणी में भी विनम्रता और मधुरता आवश्यक होती है।

हाथों और चरणों का महत्व

हाथों का उपयोग सेवा और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। जब व्यक्ति प्रणाम करता है तो वह अपने हाथों से यह दर्शाता है कि वह सेवा के लिए सदैव तैयार है। चरणों का अर्थ है जीवन की दिशा और गति। साष्टांग प्रणाम में चरणों को समर्पित करना यह दिखाता है कि व्यक्ति अपने जीवन के मार्ग को भी गुरु या ईश्वर के चरणों में समर्पित कर रहा है।

घुटनों और शरीर का भाव

घुटनों के माध्यम से झुकना विनम्रता और समर्पण की चरम अवस्था को दर्शाता है। जब व्यक्ति अपने घुटनों के बल भूमि पर झुकता है, तो वह अपने शरीर के अहंकार को समाप्त करता है। यह स्थिति बताती है कि व्यक्ति अपने आप को छोटा मानकर भी महान शक्ति के सामने पूर्ण श्रद्धा के साथ उपस्थित है।

साष्टांग प्रणाम का जीवन में महत्व

साष्टांग प्रणाम केवल धार्मिक क्रिया नहीं है, बल्कि यह जीवन में विनम्रता, अनुशासन और आदर की भावना विकसित करता है। यह व्यक्ति को अहंकार से दूर रखकर उसे सरल और शांत बनाता है। जब कोई व्यक्ति सच्चे भाव से साष्टांग प्रणाम करता है, तो उसके भीतर आत्मिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह अभ्यास हमें सिखाता है कि जीवन में चाहे हम कितने भी बड़े क्यों न हो जाएं, विनम्रता हमेशा सर्वोपरि रहती है। इस प्रकार साष्टांग प्रणाम एक ऐसी साधना है जो शरीर, मन और आत्मा तीनों को एक साथ शुद्ध करती है और व्यक्ति को आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाती है।

ये भी पढ़ें -  जीवन को सरल बनाने का क्या है सही तरीका? देवी नेहा सारस्वत ने बताया आसान मार्ग

ये भी देखें

Swami Gyananand Ji Maharaj
स्वामी श्री ज्ञानानंद जी महाराज
18 June 2026
Sadhvi Krishnapriya ji
कथावाचक साध्वी कृष्णप्रिया जी
18 June 2026
Devi Neha Saraswat
देवी नेहा निधि सारस्वत
18 June 2026
Swami Ashutoshanand Giri Ji Maharaj
स्वामी आशुतोषानंद गिरि जी महाराज
18 June 2026
Rajan Ji Maharaj
श्री राजन जी महाराज
18 June 2026

धार्मिक कहानियां सुनने और पढ़ने के लिए हमारे WhatsApp चैनल से जुड़ें।

WhatsApp Channel