Yam Lok Ka Rahasya: मनुष्य को पाप से डरकर निराश होने की आवश्यकता नहीं है। अपने गलत कर्मों का प्रायश्चित करें, जीवन को सुधारें और भगवान के नाम का निरंतर स्मरण करें।
Punishment in Yamlok: श्याम सुंदर पाराशर जी महाराज अपने प्रवचनों में बताते हैं कि राजा परीक्षित ने जब पाप और उसके परिणाम के बारे में प्रश्न किया, तब श्री शुकदेव जी महाराज ने बताया कि मृत्यु के बाद जीव अपने कर्मों के अनुसार विभिन्न लोकों में जाता है। पुराणों में यमपुरी का वर्णन करते हुए बताया गया है कि वहां अनेक प्रकार के नरक हैं, जहां पापी जीवों को उनके कर्मों के अनुसार यातनाएं भोगनी पड़ती हैं। तामिस्र, अंधतामिस्र, रौरव, महारौरव, कुम्भीपाक, असिपत्रवन, सूकरमुख, वैतरणी और अन्य अनेक नरकों का वर्णन शास्त्रों में मिलता है। इन नरकों का उद्देश्य केवल भय पैदा करना नहीं है, बल्कि यह समझाना है कि मनुष्य को अपने कर्मों के परिणाम अवश्य भोगने पड़ते हैं। जैसा कर्म किया जाता है, उसी के अनुरूप उसका फल प्राप्त होता है।
शास्त्रों में कहा गया है कि जो व्यक्ति दूसरों के धन, संपत्ति, स्त्री या परिवार को छल-कपट से छीनता है, उसे तामिस्र जैसे भयानक नरक में यातना भोगनी पड़ती है। वहां की परिस्थितियां अत्यंत कष्टदायक बताई गई हैं। तामिस्र का अर्थ ही अंधकार और भयंकर पीड़ा से जुड़ा हुआ है। इसका संदेश यह है कि किसी दूसरे के अधिकार को छीनकर सुख प्राप्त करने वाला व्यक्ति वास्तव में अपने लिए ही दुख का कारण तैयार करता है।
इसी प्रकार जो व्यक्ति अपने घर आए अतिथि का क्रोध और अपमान से स्वागत करता है, उसके लिए भी शास्त्रों में कठोर परिणाम बताए गए हैं। अतिथि को देवता के समान मानने की भारतीय परंपरा इसलिए बनी कि हमारे भीतर सेवा, प्रेम और विनम्रता का भाव बना रहे।
छल से धन कमाने वालों का रौरव नरक
जो व्यक्ति दूसरों से द्रोह करता है, धोखा देता है और छल-कपट से धन कमाकर केवल अपने परिवार का पालन-पोषण करता है, उसके लिए रौरव नरक का वर्णन मिलता है। वहां रूरू नामक अत्यंत भयानक जीवों द्वारा यातना दिए जाने की बात कही गई है। इसी कारण उस स्थान को रौरव कहा गया। इस कथा का सीधा संदेश है कि परिवार का पालन-पोषण करना अच्छी बात है, लेकिन उसके लिए अधर्म और दूसरों का शोषण करना उचित नहीं है। गलत तरीके से कमाया गया धन परिवार को सुख नहीं, बल्कि कर्मों का बोझ देता है।
जीवों की हत्या और मांस खाने की सजा
शास्त्रों में उन लोगों के लिए भी कठोर परिणाम बताए गए हैं जो जीवों को मारकर उनका मांस खाते हैं और इस प्रकार अपने शरीर का पालन करते हैं। ऐसे कर्मों के लिए कुम्भीपाक नरक का वर्णन मिलता है, जहां जीव को अत्यंत कष्टदायक यातनाएं सहनी पड़ती हैं। यहां एक महत्वपूर्ण बात समझाई गई है कि नरक में जीव को एक विशेष प्रकार की यातना-देह प्राप्त होती है। उस शरीर को कितनी भी यातना दी जाए, वह आसानी से मृत्यु को प्राप्त नहीं होता, बल्कि अपने कर्मों का फल भोगता रहता है। वहीं पुण्यात्मा को स्वर्ग में उसके अनुकूल दिव्य शरीर प्राप्त होने की बात कही गई है।
नरक से बचने का उपाय
इन भयानक वर्णनों को सुनकर राजा परीक्षित चिंतित हो गए। उन्होंने पूछा कि संसार में ऐसा कौन मनुष्य है जिसने जाने-अनजाने कोई पाप न किया हो? यदि सभी से पाप होते हैं तो क्या सभी को नरक जाना पड़ेगा? क्या इससे बचने का कोई उपाय नहीं है? शुकदेव जी महाराज ने समझाया कि नरक को एक प्रकार के धोबीघाट की तरह समझो। जैसे कपड़े पहनने पर गंदे हो जाते हैं और उन्हें साफ करना पड़ता है, वैसे ही संसार में रहते हुए मनुष्य से कर्मों के कारण मन और जीवन पर पाप के दाग लग जाते हैं। इन्हें प्रायश्चित और भक्ति के द्वारा साफ किया जा सकता है।
सबसे बड़ा साधन है भगवान का नाम
महाराज ने कहा कि पापों को धोने का सबसे प्रभावी साधन भगवान के नाम का संकीर्तन है। मनुष्य यदि श्रद्धा और निरंतरता के साथ भगवान का नाम जपता रहे तो उसके भीतर परिवर्तन आने लगता है। शास्त्रों में भगवान के नाम की महिमा का बार-बार वर्णन किया गया है। इस बात को समझाने के लिए अजामिल की कथा सुनाई जाती है। अजामिल विद्वान ब्राह्मण था, लेकिन बुरी संगति के कारण उसका जीवन पापपूर्ण हो गया। उसके दस पुत्र हुए और सबसे छोटे पुत्र का नाम नारायण रखा गया। अजामिल उस पुत्र से बहुत प्रेम करता था और बार-बार उसे नारायण कहकर पुकारता था। जब मृत्यु का समय आया और यमदूत उसे लेने पहुंचे, तब भयभीत अजामिल ने अपने पुत्र को पुकारते हुए “नारायण” नाम लिया। उसके मुख से भगवान का नाम निकलते ही विष्णुदूत वहां प्रकट हुए और यमदूतों को रोक दिया। अजामिल ने भगवान को प्रेम से नहीं, बल्कि अपने पुत्र को पुकारते हुए नाम लिया था, फिर भी भगवान के नाम की शक्ति ने उसके जीवन की दिशा बदल दी।
नाम के लिए मन लगना जरूरी नहीं
यहां एक बहुत बड़ी सीख मिलती है। कई लोग कहते हैं कि हमारा मन भगवान के नाम में नहीं लगता, इसलिए जप करने से क्या लाभ होगा? लेकिन शुरुआत में मन का लगना आवश्यक नहीं है। जैसे बच्चा स्कूल नहीं जाना चाहता, फिर भी माता-पिता उसे प्रेम या अनुशासन से स्कूल भेजते हैं। कुछ समय बाद वही बच्चा स्वयं स्कूल जाने के लिए तैयार हो जाता है। ठीक इसी प्रकार मन पहले संसार के विषयों का अभ्यस्त है। उसे भगवान के नाम में लगाने के लिए अभ्यास करना पड़ता है। शुरुआत में जप करते समय मन इधर-उधर भागेगा, पुराने विचार आएँगे और ध्यान भटकेगा। इससे घबराना नहीं चाहिए। धैर्य के साथ नाम जपते रहना चाहिए।
धीरे-धीरे नाम में आने लगता है स्वाद
कल्पना कीजिए कि कोई मकान दो वर्षों से बंद पड़ा है। जब उसकी सफाई शुरू होगी तो बहुत धूल उड़ेगी। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि सफाई गलत हो रही है। वास्तव में धूल का बाहर निकलना ही सफाई की प्रक्रिया है। उसी प्रकार जब हम भजन शुरू करते हैं तो मन में वर्षों से जमा विचार और इच्छाएं बाहर आने लगती हैं। इसलिए मन भटके तो जप छोड़ना नहीं चाहिए। माला हाथ से छूट जाए तो फिर उठा लीजिए। विचार आएं तो आने दीजिए और अपना अभ्यास जारी रखिए। धीरे-धीरे मन शांत होने लगेगा और भगवान के नाम में स्वाद आने लगेगा। जैसे समुद्र के ऊपर उड़ता हुआ पक्षी अंततः लौटकर अपने जहाज पर ही आता है, वैसे ही अभ्यास करने पर भटकता हुआ मन भी धीरे-धीरे भगवान के नाम में लौटने लगता है। पहले जबरदस्ती करनी पड़ती है, फिर आदत बनती है और अंत में उसी नाम में आनंद मिलने लगता है।
कलियुग में नाम ही सबसे बड़ा आधार
कलियुग में भगवान के नाम का विशेष महत्व बताया गया है। भगवान का नाम ऐसा अमूल्य साधन है जिसके लिए बड़े-बड़े कर्मकांड या कठिन साधनाएँ आवश्यक नहीं हैं। आवश्यकता है तो निरंतर अभ्यास, श्रद्धा और धैर्य की। जिस प्रकार एक छोटी-सी चिंगारी रूई या लकड़ियों के बड़े ढेर को जला सकती है, उसी प्रकार भगवान के नाम की शक्ति जन्म-जन्मांतर के पापों को नष्ट करने में समर्थ बताई गई है। इसलिए मनुष्य को पाप से डरकर निराश होने की आवश्यकता नहीं है। अपने गलत कर्मों का प्रायश्चित करें, जीवन को सुधारें और भगवान के नाम का निरंतर स्मरण करें। शुरुआत में मन न लगे तो भी नाम जपते रहें। क्योंकि जब भगवान के नाम का वास्तविक स्वाद जीवन में आ जाता है, तब संसार के विषयों की चमक फीकी पड़ने लगती है और मन को वास्तविक शांति तथा आनंद भगवान के नाम में ही मिलने लगता है।