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Humility Power: बुद्धिमान के सामने 'मूर्ख' क्यों बनना चाहिए? राजन जी महाराज ने बताया कारण

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
श्री राजन जी महाराज
सार

Motivational Thoughts: जो व्यक्ति स्वयं को खाली पात्र मानता है, वही नए ज्ञान से भर पाता है। इसलिए जीवन में जब भी किसी ज्ञानी, अनुभवी या श्रेष्ठ व्यक्ति का सान्निध्य मिले, तो अपनी विद्वता दिखाने के बजाय शिष्य भाव से उसकी बात सुनें। 
 

Rajan Ji Maharaj
Positive Thinking in Life: जीवन में हम अक्सर ऐसे लोगों से मिलते हैं जिनके पास हमसे अधिक अनुभव, ज्ञान और समझ होती है। ऐसे लोगों की संगति हमारे जीवन को नई दिशा दे सकती है। राजन जी महाराज लोगों को शिक्षा देते हैं कि जब किसी बुद्धिमान व्यक्ति के सामने बैठें, तो अपने ज्ञान का प्रदर्शन करने के बजाय सीखने का भाव रखना चाहिए। इसी संदर्भ में एक बहुत सुंदर बात कही जाती है कि “अपने से बुद्धिमान के सामने मूर्ख बनकर बैठना चाहिए।” इसका अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति वास्तव में मूर्ख बन जाए, बल्कि इसका मतलब है कि वह अपने अहंकार को छोड़कर विनम्रता के साथ सीखने की मानसिकता अपनाए।

जब किसी व्यक्ति को यह लगता है कि वह सब कुछ जानता है, तब उसके लिए नया ज्ञान ग्रहण करना कठिन हो जाता है। उसका मन बंद हो जाता है और वह हर बात को अपनी समझ के आधार पर ही परखने लगता है। इसके विपरीत जो व्यक्ति विनम्रता से बैठता है और यह मानता है कि अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है, उसके लिए ज्ञान के नए द्वार खुल जाते हैं।

बुद्धिमान व्यक्ति के सामने यदि हम स्वयं को बहुत ज्ञानी साबित करने का प्रयास करेंगे, तो हमारा ध्यान सीखने से हटकर स्वयं को श्रेष्ठ दिखाने में लग जाएगा। परिणाम यह होगा कि हम उस अमूल्य अनुभव और ज्ञान से वंचित रह जाएंगे जो हमें प्राप्त हो सकता था।

ज्ञान प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधा है अहंकार 

अहंकार मनुष्य को भीतर से कमजोर बना देता है। वह उसे यह विश्वास दिलाता है कि अब उसे किसी से कुछ सीखने की आवश्यकता नहीं है। यही कारण है कि अनेक बार व्यक्ति अपने विकास की संभावनाओं को स्वयं ही समाप्त कर देता है। जब कोई श्रेष्ठ व्यक्ति कोई बात कहे, तो उसे इस भाव से सुनना चाहिए कि जैसे जीवन में पहली बार सुन रहे हों। भले ही वह विषय पहले से ज्ञात हो, फिर भी हर बार कोई नया दृष्टिकोण, नई गहराई या नया अनुभव प्राप्त हो सकता है। यही दृष्टि व्यक्ति को निरंतर आगे बढ़ाती है।

अनुभव की कीमत पुस्तकों से भी अधिक 

किताबें हमें ज्ञान देती हैं, लेकिन अनुभव उस ज्ञान को जीवन में उतारने की कला सिखाता है। जो लोग उम्र, संघर्ष और साधना के माध्यम से जीवन को गहराई से समझ चुके हैं, उनकी बातों में केवल जानकारी नहीं बल्कि जीवन का सार छिपा होता है। यदि हम उनके सामने यह जताने लगें कि हमें सब पता है, तो हम उनके अनुभवों का लाभ नहीं उठा पाएंगे, लेकिन यदि हम जिज्ञासु शिष्य की तरह बैठेंगे, तो उनकी छोटी-सी बात भी हमारे जीवन के लिए बड़ी सीख बन सकती है।

सच्चे ज्ञानी की पहचान

राजन जी महाराज कहते हैं कि यह भी एक रोचक सत्य है कि जितना बड़ा ज्ञानी होता है, वह उतना ही विनम्र होता है। उसे अपने ज्ञान का घमंड नहीं होता। वह हमेशा सीखने के लिए तैयार रहता है। संसार के महान वैज्ञानिकों, दार्शनिकों और संतों ने भी यही बताया है कि ज्ञान का अंत नहीं है। इसलिए जो व्यक्ति स्वयं को पूर्ण मान लेता है, उसकी प्रगति रुक जाती है। जबकि जो व्यक्ति हर दिन कुछ नया सीखने की इच्छा रखता है, वह लगातार आगे बढ़ता रहता है।

जीवन में सफलता का सरल मंत्र

हमारे बुजुर्ग अक्सर कहा करते थे कि अपने से बुद्धिमान व्यक्ति के सामने विनम्र होकर बैठो। यह केवल व्यवहार की बात नहीं है, बल्कि सफलता का एक महत्वपूर्ण सूत्र है। जब हम दूसरों के ज्ञान और अनुभव का सम्मान करते हैं, तब हमें भी सम्मान मिलता है और हमारा व्यक्तित्व निखरता है। जीवन में चाहे कितनी भी जानकारी, शिक्षा या उपलब्धियां क्यों न हों, सीखने की भावना कभी समाप्त नहीं होनी चाहिए। जब कोई श्रेष्ठ, अनुभवी या बुद्धिमान व्यक्ति कोई बात कहे, तो उसे पूरे मन से सुनना चाहिए। ऐसा करने से न केवल हमारा ज्ञान बढ़ता है, बल्कि हमारा दृष्टिकोण भी व्यापक होता है।

शिष्य भाव से सुनें ज्ञानी की बात 

“बुद्धिमान के सामने मूर्ख बनकर बैठना चाहिए” का वास्तविक अर्थ है कि हमें अपने अहंकार को त्यागकर विनम्रता और जिज्ञासा के साथ सीखने का प्रयास करना चाहिए। जो व्यक्ति स्वयं को खाली पात्र मानता है, वही नए ज्ञान से भर पाता है। इसलिए जीवन में जब भी किसी ज्ञानी, अनुभवी या श्रेष्ठ व्यक्ति का सान्निध्य मिले, तो अपनी विद्वता दिखाने के बजाय शिष्य भाव से उसकी बात सुनें। यही आदत हमें निरंतर सीखने, आगे बढ़ने और जीवन में सच्ची सफलता प्राप्त करने की दिशा में ले जाती है।

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