Spiritual Love: प्रेम का सबसे सुंदर रूप वही है जिसमें अधिकार से अधिक विश्वास, बंधन से अधिक स्वतंत्रता और पाने से अधिक समर्पण हो। सच्चा प्रेम किसी को रोकता नहीं, बल्कि उसकी उड़ान को और ऊंचा होने का आशीर्वाद देता है।
Bhakti and Love: देवी चित्रलेखा जी प्रेम के वास्तविक स्वरूप को समझाते हुए कहती हैं कि सच्चा प्रेम कभी किसी को बंधन में नहीं बांधता। जब हम किसी से प्रेम करते हैं और उसके ऊपर अपना अधिकार जमाने लगते हैं, उसकी स्वतंत्रता छीन लेते हैं और यह सोचते हैं कि अब वह केवल हमारा है, तो वह प्रेम नहीं, बल्कि मोह और आसक्ति बन जाता है। प्रेम का अर्थ किसी को अपने पास कैद करके रखना नहीं, बल्कि उसे खुश देखना है। जिस व्यक्ति से हम प्रेम करते हैं, उसकी खुशी में अपनी खुशी महसूस करना ही प्रेम की सच्ची पहचान है। यदि किसी को अपने साथ रखने के लिए उसकी इच्छाओं और स्वतंत्रता को समाप्त करना पड़े, तो हमें अपने प्रेम पर विचार करना चाहिए।
देवी चित्रलेखा जी बताती हैं कि संसार के प्रेम और भगवत प्रेम में बहुत बड़ा अंतर है। संसार में अक्सर प्रेम के नाम पर अधिकार की भावना पैदा हो जाती है। मनुष्य जिसे चाहता है, उसे अपने पास रखना चाहता है। उसे खोने का डर उसके मन में बना रहता है और इसी डर के कारण वह प्रेम को बंधन में बदल देता है। इसके विपरीत भगवत प्रेम में अधिकार नहीं, समर्पण होता है। वहां प्रेम करने वाला सामने वाले को स्वतंत्रता देता है। वह यह नहीं सोचता कि जिसे मैं प्रेम करता हूं, वह हमेशा मेरे पास ही रहे। बल्कि वह उसकी प्रसन्नता और स्वतंत्रता को सबसे अधिक महत्व देता है।
तोता और सच्चे प्रेम की कहानी
इसे एक तोते के उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है। कोई व्यक्ति एक सुंदर तोते को पकड़कर पिंजरे में बंद कर देता है। वह उसके लिए अच्छे दाने और पानी रखता है, उसकी देखभाल करता है और लोगों से कहता है कि वह इस तोते से बहुत प्रेम करता है। तोते के लिए सबसे बड़ी खुशी खुले आकाश में उड़ना है। उसके पंख उड़ान के लिए हैं, पिंजरे में बंद रहने के लिए नहीं। यदि कोई व्यक्ति सच में उस तोते से प्रेम करता है, तो वह उसे खुले आकाश में उड़ने देगा। यही सच्चे प्रेम की पहचान है।
प्रेम में पंख भी हैं और आसमान भी
सच्चा प्रेम वही है जो सामने वाले को उड़ने के लिए पंख दे और उसके लिए पूरा आसमान छोड़ दे। जो प्रेम किसी की उड़ान रोक दे, उसके सपनों को दबा दे और उसकी स्वतंत्रता छीन ले, वह प्रेम नहीं हो सकता। प्रेम का स्वभाव विस्तार है। प्रेम हमें जोड़ता है, लेकिन बांधता नहीं। प्रेम हमें अपनापन देता है, लेकिन किसी पर अधिकार जमाने की शिक्षा नहीं देता। जहां प्रेम है, वहां विश्वास है; जहां विश्वास है, वहां स्वतंत्रता है।
भगवान से प्रेम का अर्थ
भगवान के प्रति प्रेम भी ऐसा ही होना चाहिए। भगवत प्रेम में व्यक्ति अपनी इच्छाओं को भगवान के चरणों में समर्पित करता है। वह भगवान को अपने अनुसार चलाने की कोशिश नहीं करता, बल्कि स्वयं भगवान की इच्छा के अनुसार चलना सीखता है। सच्चा प्रेम हमें भीतर से मुक्त करता है। वह हमारे मन में डर नहीं, विश्वास पैदा करता है। इसलिए यदि प्रेम करना है तो ऐसा प्रेम करें जिसमें सामने वाले के लिए पिंजरा नहीं, बल्कि खुला आकाश हो। क्योंकि जो किसी की उड़ान को समझता है, वही वास्तव में प्रेम को समझता है।