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Avdheshanand Giri Ji Maharaj: समुद्र मंथन से प्रकट हुई मां लक्ष्मी ने किसे वरण किया और क्यों? जानें पूरी कहानी

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
स्वामी अवधेशानंद गिरी जी महाराज
सार

Samudra Manthan: स्वामी अवधेशानंद गिरी महाराज का मानना है कि लक्ष्मी केवल धन का नाम नहीं है, बल्कि समृद्धि, सुख, शांति और सौभाग्य का प्रतीक हैं। ये सभी वहीं टिकते हैं जहां सत्य, धर्म, सदाचार, विनम्रता और संतुलन होता है। 
 

Avdheshanand Giri Ji Maharaj
Goddess Lakshmi story: जूनापीठाधीश्वर आचार्यमहामण्डलेश्वर स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज अपने प्रवचनों में कहते हैं कि जब देवताओं और असुरों ने अमृत प्राप्त करने के लिए समुद्र मंथन किया, तब उस मंथन से अनेक दिव्य रत्न प्रकट हुए। उन्हीं दिव्य रत्नों में धन, ऐश्वर्य, सौभाग्य और समृद्धि की अधिष्ठात्री देवी मां लक्ष्मी भी प्रकट हुईं। मां लक्ष्मी के प्रकट होते ही देवता, ऋषि और सभी दिव्य शक्तियां उनकी ओर आकर्षित हो गईं। हर कोई चाहता था कि मां लक्ष्मी उन्हें अपना लें और उनके साथ रहें, लेकिन मां लक्ष्मी ने स्पष्ट कर दिया कि केवल उनका अनुसरण करने या उनकी इच्छा रखने से वे किसी की नहीं हो जाएंगी।

स्वामी अवधेशानंद गिरी जी महाराज बताते हैं कि मां लक्ष्मी ने सभी को यह संदेश दिया कि यदि कोई उन्हें पाना चाहता है तो केवल उनके पीछे चलने से काम नहीं चलेगा। उनका अनुसरण करना होगा, उनकी आराधना करनी होगी और अपने जीवन को योग्य बनाना होगा। उन्होंने कहा कि लोग उनकी पूजा करें, उनका सम्मान करें और अपने जीवन में अच्छे गुणों को अपनाएं, लेकिन वे किसी के पास केवल आग्रह करने से नहीं रहेंगी। वे उसी के साथ रहेंगी जो वास्तव में उनके योग्य होगा।

ब्रह्मा जी को भी किया मना

कथा के अनुसार, सबसे पहले ब्रह्मा जी के सामने मां लक्ष्मी का वरण करने का अवसर आया, लेकिन मां लक्ष्मी ने उन्हें विनम्रता से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि आपकी सृष्टि में भेदभाव और द्वैत का भाव दिखाई देता है। संसार में अनेक प्रकार के अंतर और विभाजन हैं। इसलिए मैं आपको अपना जीवनसाथी नहीं बना सकती। यह कोई अपमान नहीं था, बल्कि यह एक गहरा आध्यात्मिक संकेत था कि लक्ष्मी वहां स्थायी रूप से नहीं रहतीं, जहां केवल सृष्टि का विस्तार हो, लेकिन पूर्ण समता और सत्य का आधार न हो।

महादेव को भी क्यों नहीं चुना?

भगवान शिव के सामने भी यही प्रश्न आया। महादेव ने मुस्कुराकर पूछा कि मुझमें ऐसा कौन-सा दोष है, जिसके कारण तुम मुझे स्वीकार नहीं कर रही हो? इस पर मां लक्ष्मी ने अत्यंत आदर के साथ उत्तर दिया कि आपमें कोई दोष नहीं है। आप तो अत्यंत करुणामय और उदार हैं। आपकी दयालुता इतनी अधिक है कि कोई भी राक्षस कठिन तपस्या करके आपको प्रसन्न कर लेता है और आप उसे मनचाहा वरदान दे देते हैं। यदि मैं आपके साथ रहूं तो संभव है कि आप अपनी उदारता के कारण मुझे भी किसी को दे दें। इसलिए मैं आपके साथ स्थायी रूप से नहीं रह सकती।

सत्य की खोज में थीं मां लक्ष्मी

स्वामी अवधेशानंद गिरी जी महाराज कहते हैं कि मां लक्ष्मी धन की देवी अवश्य हैं, लेकिन उनका वास्तविक निवास केवल धन में नहीं, बल्कि सत्य, धर्म और पवित्रता में है। उन्होंने कहा कि मैं उस पुरुष का अनुसरण करूंगी जो सर्वथा निर्दोष हो, जो सत्यस्वरूप हो, जो सच्चिदानंद हो और जिसमें किसी प्रकार का छल, कपट या भेद न हो। मैं सत्य की खोज में हूं और जहां मुझे सत्य मिलेगा, मैं उसी का वरण करूंगी।

भगवान नारायण को किया वरण

कुछ समय बाद सभी ने देखा कि मां लक्ष्मी भगवान सत्यनारायण अर्थात भगवान विष्णु के चरणों में जाकर बैठ गईं। उन्होंने भगवान नारायण को अपना पति स्वीकार किया। भगवान विष्णु धर्म के रक्षक, सत्य के पालनकर्ता, मर्यादा के प्रतीक और संपूर्ण सृष्टि के पालनहार हैं। उनमें करुणा भी है, न्याय भी है, संतुलन भी है और सत्य भी। यही कारण है कि मां लक्ष्मी ने उनका वरण किया और सदा के लिए उनके साथ रहने का निर्णय लिया।

इस कथा से मिलने वाली सीख

यह प्रसंग केवल एक पौराणिक कथा नहीं, बल्कि जीवन का गहरा संदेश भी देता है। स्वामी अवधेशानंद गिरी जी महाराज के अनुसार लक्ष्मी केवल धन का नाम नहीं है, बल्कि समृद्धि, सुख, शांति और सौभाग्य का प्रतीक हैं। ये सभी वहीं टिकते हैं जहां सत्य, धर्म, सदाचार, विनम्रता और संतुलन होता है। यदि व्यक्ति अपने जीवन में सत्य का पालन करता है, अच्छे कर्म करता है और ईश्वर के बताए मार्ग पर चलता है, तो लक्ष्मी की कृपा भी उस पर बनी रहती है। इसलिए केवल धन कमाने का प्रयास ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि अपने चरित्र, व्यवहार और जीवन मूल्यों को भी श्रेष्ठ बनाना आवश्यक है। यही इस कथा का सबसे बड़ा संदेश है।

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