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Aajan Bahu Srakar Temple: प्रमु श्री राम इस मंदिर में आजानुबाहु रूप में हैं विराजमान, जानें इसका रहस्य

जीवांजलिPublished by:
राघवेंद्र तिवारी
सार

Aajan Bahu Srakar Temple: छतरपुर जिले के जनराय टौरिया में राम जी का प्राचीन मंदिर है, जो 600 साल से भी ज्यादा पुराना है। निर्मोही अखाड़ा जनराय टौरिया आजान भुज सरकार के महंत भगवान दास महाराज के अनुसार जिले में यह राम जी का एकमात्र मंदिर है

Aajan Bahu Srakar Temple
Aajan Bahu Srakar Temple: छतरपुर जिले के जनराय टौरिया में राम जी का प्राचीन मंदिर है, जो 600 साल से भी ज्यादा पुराना है। निर्मोही अखाड़ा जनराय टौरिया आजान भुज सरकार के महंत भगवान दास महाराज के अनुसार जिले में यह राम जी का एकमात्र मंदिर है, जहां भगवान श्री राम अकेले विराजमान हैं। साथ ही यहां पर राम जी ने क्रोध में अपनी भुजाएं फैला दी थीं। राम जी के इस क्रोधित रूप को आजानबाहु या आजान भुज कहा गया। भगवान श्री राम इसी रूप में यहां विराजमान हैं।

ऋषि-मुनियों की हड्डियों का पहाड़

राम जी पन्ना क्षेत्र के सुतीक्षण आश्रम में रहे थे। यहां से जब वे आगे बढ़े तो रास्ते में हड्डियों का ढेर देखा और संतों से पूछा कि यह हड्डियों का ढेर कैसा है, तब संतों ने बताया कि यहां पर ऋषि-मुनियों की हत्या की गई थी। यह उनकी हड्डियों का ढेर है। यह सुनकर राम जी ने अपनी भुजाएं फैला दीं और धरती को राक्षस मुक्त करने का संकल्प लिया। राम जी के इस क्रोधित रूप को आजनबाहु या आजनभुज कहा गया।

राक्षस खर-दूषण का वध

जब राम जी ने खर-दूषण राक्षस का वध किया तो उन्होंने भाई लक्ष्मण से कहा कि सीता को लेकर गिर कंदर चले जाओ, क्योंकि यहां राक्षस आते हैं। उस समय राम जी ने अकेले ही खर-दूषण जैसे राक्षसों का वध किया था। इसके बाद देवताओं ने पुष्प वर्षा कर उनकी पूजा की थी। यहां विराजमान राम जी अकेले हैं। क्योंकि उस समय राम जी अकेले रह गए थे। इसलिए छतरपुर जिले का यह मंदिर दुनिया का एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां राम जी अकेले विराजमान हैं।

मंदिर की मूर्ति पत्थर से बनी है

1440 ई. में गोस्वामी तुलसीदास के चाचा गुरु नरहर दास थे। उनके गुरु भाई हरिदेव दास जी थे। हरिदेव दास जी महाराज को राम जी की यह मूर्ति एक पहाड़ी पर स्वप्न में मिली थी और उन्होंने इसे लाकर यहां रख दिया था। वे यहां से हिले नहीं, इसलिए इसे यहीं स्थापित कर दिया गया। श्री महंत भगवंत दास 13 पीढ़ियों से अंजान भुज मंदिर की सेवा कर रहे हैं।

यहां मिलता है आजन भुज रूप का उल्लेख

रामजी के आजन भुज रूप का वर्णन रामजी की स्तुति की 7वीं पंक्ति और रामचरित मानस में भी मिलता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि रामजी ने कभी आजन भुज रूप धारण किया था। वह आजन भुज रूप केवल छतरपुर में ही देखने को मिलता है।

मंदिर की मूर्ति पत्थर से बनी है

1440 ई. में गोस्वामी तुलसीदास के चाचा गुरु नरहर दास थे। उनके गुरु भाई हरिदेव दास जी थे। हरिदेव दास जी महाराज को राम जी की यह मूर्ति एक पहाड़ी पर स्वप्न में मिली थी और उन्होंने इसे यहां लाकर रख दिया था। यह यहां से हिली नहीं, इसलिए इसे यहां स्थापित कर दिया गया। श्री महंत भगवंत दास 13 पीढ़ियों से अंजन भुज मंदिर की सेवा कर रहे हैं।

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