Ramayana Story: हिंदू धर्म के महाकाव्य रामायण से लोग भली-भांति परिचित हैं। इस महाकाव्य ने भारत ही नहीं, बल्कि विश्व भर में अपनी अलग छाप छोड़ी है। रामायण के पात्रों की कथाएं लोगों को पूर्ण रूप से पता है। भगवान श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, हनुमान और रावण जैसे पात्रों की कहानियां हर घर में गूंजती हैं। यह महाकाव्य मर्यादा, धर्म और परिवार के मूल्यों का प्रतीक है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस महाकाव्य में एक ऐसी शख्सियत भी है, जिसका जिक्र बहुत कम हुआ और जिसके बारे में अधिकांश लोग अनजान हैं? यह हैं भगवान श्रीराम की बड़ी बहन, जिनका नाम था शांता। श्रीराम की बड़ी बहन का जिक्र वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण और तुलसीदास के रामचरितमानस जैसे प्रमुख ग्रंथों में नहीं किया गया है, लेकिन दक्षिण भारत की कुछ रामायण कथाओं और लोकमान्यताओं में उनकी कहानी छिपी है। आइए, आपको इस अनसुनी कहानी के बारे में विस्तार से बताते हैं...
कौन थीं शांता
पौराणिक कथाओं के अनुसार, शांता राजा दशरथ और उनकी पहली रानी कौशल्या की पुत्री थीं। वह भगवान राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न से बड़ी थीं। पौराणिक कथाओं और दक्षिण भारतीय रामायण के अनुसार, शांता एक अत्यंत गुणी, बुद्धिमान और सुंदर कन्या थीं। उन्हें वेदों, कलाओं और शिल्पों का गहन ज्ञान था। उन्हें न केवल धार्मिक और पारिवारिक मूल्यों का ज्ञान था, बल्कि वह विद्वान भी थीं। उन्हें गहराइयों से सभी बातों की समझ थी। हालांकि, फिर भी रामायण में उनकी कहानी का उल्लेख बहुत सीमित है, जिसके कई कारण बताए जाते हैं।
शांता को दिया गया गोद
शांता की कहानी में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया, जब राजा दशरथ और रानी कौशल्या ने उन्हें गोद देने का निर्णय लिया। पौराणिक कथाओं के अनुसार, रानी कौशल्या की बड़ी बहन वर्षिणी का विवाह अंगदेश के राजा रोमपद से हुआ था। वर्षिणी और रोमपद की कोई संतान नहीं थी, जिसके कारण वे दुखी रहने लगे। एक बार जब वे अयोध्या आए तो राजा दशरथ ने उनकी उदासी दूर करने के लिए अपनी पुत्री शांता को उन्हें गोद देने का फैसला किया। रोमपद द्वारा शांता को गोद लिए जाने के बाद वह अयोध्या छोड़कर अंगदेश की राजकुमारी बन गईं।
हालांकि, शांता को गोद दिए जाने के बारे में भी ग्रंथों में कई कहानियां उल्लेखित हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, शांता को गोद दिए जाने की एक वजह राजा दशरथ के राज में पड़े अकाल से भी जोड़ा गया। एक अन्य लोककथा के अनुसार, शांता के जन्म के समय अयोध्या में भयंकर अकाल पड़ा था, जो बारह वर्षों तक चला। कुछ ज्योतिषियों और सलाहकारों ने राजा दशरथ को सुझाव दिया कि इस अकाल का कारण शांता का जन्म हो सकता है। इस मान्यता के चलते राजा दशरथ ने अपनी पुत्री को वर्षिणी और रोमपद को गोद देने का फैसला किया, ताकि अयोध्या की यह विपदा टल सके। कहा जाता है कि इस निर्णय के पीछे राजा दशरथ की पुत्र प्राप्ति की इच्छा भी थी, क्योंकि उस समय उनके कोई पुरुष संतान नहीं थी।
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शांता का विवाह
शांता जब बड़ी हुईं तो उनका विवाह ऋषि श्रृंगी से हुआ, जो एक महान तपस्वी और विद्वान थे। श्रृंगी ऋषि का आश्रम उत्तर प्रदेश के बस्ती और अयोध्या के बीच सरयू नदी के तट पर शेखाघाट में स्थित था। पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार राजा रोमपद पुत्री शांता के साथ बातचीत में इतने मग्न थे कि उन्होंने एक ब्राह्मण की खेती के लिए सहायता की मांग को अनदेखा कर दिया। यह ब्राह्मण इंद्रदेव का भक्त था। ऐसे में उसकी उपेक्षा से इंद्रदेव क्रोधित हो गए और उन्होंने अंगदेश में वर्षा बंद कर दी, जिससे सूखा पड़ गया। इस संकट को दूर करने के लिए राजा रोमपद ने ऋषि श्रृंगी को यज्ञ करने के लिए आमंत्रित किया। ऋषि श्रृंगी के द्वारा यज्ञ किए जाने से वर्षा हुई, इस बात से प्रसन्न होकर राजा रोमपद ने अपनी पुत्री शांता का विवाह ऋषि श्रृंगी से कर दिया। श्रृंगी ऋषि का नाम रामायण में भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि उन्होंने ही राजा दशरथ के लिए पुत्रकामेष्टि यज्ञ किया था, जिसके फल से श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न का आगमन हुआ था।
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रामायण में शांता का जिक्र क्यों नहीं?
शांता भगवान राम की बड़ी बहन थीं, लेकिन उनका जिक्र रामायण में साफ तौर पर नहीं किया गया। ऐसे में कई बार ये सवाल उठे कि शांता का जिक्र रामायण में सीधे तौर पर क्यों नहीं हुआ, जिसके अलग अलग मत भी सामने आए। माना जाता है कि रामायण में शांता का जिक्र कम होने के कई कारण हो सकते हैं। पहला ये शांता को बचपन में ही गोद दे दिया गया था, इसलिए वह अयोध्या के राजपरिवार के मुख्य कहानी का हिस्सा नहीं रहीं। दूसरा कारण यह था कि उस समय की सामाजिक व्यवस्था में पुत्रियों को सिंहासन का उत्तराधिकारी नहीं माना जाता था, जिसके कारण शांता की कहानी को ज्यादा महत्व न दिया गया। एक अन्य कारण यह भी बताया गया कि वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस जैसे प्रमुख ग्रंथों ने श्रीराम के जीवन और उनके मर्यादा पुरुषोत्तम स्वरूप पर केंद्रित थी, जिस कारण अन्य पात्रों की कहानियों को कम स्थान दिया।
हालांकि, दक्षिण भारत की कुछ रामायण कथाओं, जैसे कंबन रामायण और लोककथाओं में शांता का जिक्र किया गया है। वहीं, कई पौराणिक कथाओं में यह भी कहा गया है कि शांता हर रक्षाबंधन में अपने भाइयों को राखी भी भेजती थीं।
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शांता की पूजा