Ram Darbar Pran Pratishtha: मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की पावन नगरी अयोध्या आज एक और ऐतिहासिक क्षण का साक्षी बना, जब राम मंदिर में श्रीराम मंदिर में श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न और भक्त हनुमान जी की मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा संपन्न हुई।
Ram Darbar Pran Pratishtha: मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की पावन नगरी अयोध्या आज एक और ऐतिहासिक क्षण का साक्षी बना, जब राम मंदिर में श्रीराम मंदिर में श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न और भक्त हनुमान जी की मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा संपन्न हुई। तीन दिवसीय भव्य समारोह के अंतिम दिन आज, अभिजीत मुहूर्त में वैदिक मंत्रोच्चार और विधि-विधान के साथ यह अनुष्ठान पूरा हुआ। इस समारोह में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए, और देश-विदेश से आए हजारों भक्त ने इस पवित्र अवसर का हिस्सा बने। ऐसे में चलिए जानते है कि आखिरकार मंदिर में मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा क्यों की जाती है और क्या है इसका धार्मिक महत्व...
प्राण प्रतिष्ठा का अर्थ
प्राण प्रतिष्ठा एक संस्कृत शब्द है, जिसमें 'प्राण' का अर्थ है जीवन शक्ति और 'प्रतिष्ठा' का अर्थ है स्थापना। इस प्रकार प्राण प्रतिष्ठा का शाब्दिक अर्थ है मूर्ति में जीवन शक्ति की स्थापना करना। यह एक वैदिक और तांत्रिक विधि है, जिसमें मंत्रों, यज्ञ और विशेष अनुष्ठानों के माध्यम से मूर्ति को सजीव और चेतन बनाया जाता है। इसके बाद मूर्ति केवल एक शिल्प कृति न रहकर भगवान का जीवंत स्वरूप बन जाती है, जिसमें ईश्वरीय चेतना का निवास माना जाता है।
प्राण प्रतिष्ठा के दौरान मूर्ति को इस तरह से तैयार किया जाता है कि वह भक्तों की पूजा, प्रार्थना और भक्ति का केंद्र बन सके। यह प्रक्रिया मूर्ति को भगवान का प्रत्यक्ष प्रतीक बनाती है, जिसके समक्ष भक्त अपनी श्रद्धा अर्पित करते हैं।
प्राण प्रतिष्ठा क्यों की जाती है?
हिंदू धर्म में मूर्ति पूजा का आधार यह विश्वास है कि ईश्वर सर्वव्यापी है, लेकिन भक्तों के लिए उनकी भक्ति को केंद्रित करने हेतु एक साकार रूप की आवश्यकता होती है। प्राण प्रतिष्ठा कई कारणों से की जाती है। मूर्ति को सजीव करने के लिए उसमें ईश्वर की चेतना का आह्वान किया जाता है, ताकि वह भक्तों की प्रार्थनाओं को स्वीकार कर सके। प्राण प्रतिष्ठा के बाद मूर्ति भक्तों के लिए एक केंद्र बिंदु बन जाती है, जिसके माध्यम से वे भगवान के साथ भावनात्मक और आध्यात्मिक संबंध स्थापित करते हैं। वेदों, पुराणों, और आगम शास्त्रों में प्राण प्रतिष्ठा को पूजा की अनिवार्य प्रक्रिया बताया गया है, जिसके बिना मूर्ति पूजा अधूरी मानी जाती है।
प्राण प्रतिष्ठा का धार्मिक महत्व
प्राण प्रतिष्ठा हिंदू धर्म में एक अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान है, जिसके माध्यम से मूर्तियों में दैवीय चेतना का संचार किया जाता है। यह प्रक्रिया मूर्ति को केवल पत्थर, धातु या अन्य सामग्री का रूप न रहने देती, बल्कि उसे जीवंत और ईश्वरीय शक्ति से परिपूर्ण करती है। प्राण प्रतिष्ठा का अर्थ है मूर्ति में 'प्राण' यानी जीवन शक्ति का स्थापन करना, जिसके बाद वह मूर्ति भगवान का स्वरूप बन जाती है और भक्त उसमें अपने आराध्य की उपस्थिति का अनुभव करते हैं।
हिंदू शास्त्रों के अनुसार, प्राण प्रतिष्ठा के दौरान मंत्रोच्चार, यज्ञ, हवन और विशेष पूजन के माध्यम से देवता की चेतना को मूर्ति में आमंत्रित किया जाता है। यह अनुष्ठान न केवल मंदिर को एक पवित्र तीर्थस्थल बनाता है, बल्कि भक्तों को अपने इष्टदेव के साथ आत्मिक और आध्यात्मिक संबंध स्थापित करने का अवसर भी प्रदान करता है। प्राण प्रतिष्ठा के बाद मूर्ति में भगवान का वास माना जाता है और भक्त वहां दर्शन, पूजा और प्रार्थना के माध्यम से अपनी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।
अयोध्या में श्रीराम दरबार की प्राण प्रतिष्ठा
आज अयोध्या में संपन्न हुई प्राण प्रतिष्ठा समारोह में श्रीराम दरबार की मूर्तियों को स्थापित किया गया। यह समारोह श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट द्वारा आयोजित किया गया, जिसमें आठ देवालयों में वैदिक अनुष्ठान संपन्न हुए। समारोह की शुरुआत 3 जून को सरयू नदी के तट से जल कलश यात्रा के साथ हुई थी, जिसमें वेदी पूजन, वास्तु पूजन, नवग्रह पूजन, यज्ञकुंड संस्कार, और हनुमान चालीसा के पाठ जैसे कर्मकांड शामिल थे। आज 5 जून को अभिजीत मुहूर्त में श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न और हनुमान जी की मूर्तियों का शुद्धिकरण और प्राण प्रतिष्ठा संपन्न हुई। इस समारोह में शुक्ल यजुर्वेद के 1975 मंत्रों के साथ अग्नि देवता को आहुति दी गई। मंदिर परिसर में राम कथा, प्रवचन और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने भक्ति का माहौल और गहरा किया।