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Pradyumna Ganesh Chaturthi Vrat Katha : प्रद्युम्न गणेश चतुर्थी के दिन जरूर पढ़ें ये व्रत कथा, होगा लाभ

jeevanjaliPublished by:
कोमल शर्मा
सार

Pradyumna Ganesh Chaturthi Vrat Katha : हिंदू धर्म में चतुर्थी तिथि का बहुत खास महत्व है। हर साल ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि के दिन प्रद्युम्न गणेश चतुर्थी का व्रत रखा जाता है। यह दिन देवों के देव महादेव के पुत्र गणेश जी को समर्पित है।

Pradyumna Ganesh Chaturthi Vrat Katha
Pradyumna Ganesh Chaturthi Vrat Katha : हिंदू धर्म में चतुर्थी तिथि का बहुत खास महत्व है। हर साल ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि के दिन प्रद्युम्न गणेश चतुर्थी का व्रत रखा जाता है। यह दिन देवों के देव महादेव के पुत्र गणेश जी को समर्पित है। माना जाता है कि इस दिन पूरे विधि-विधान से और सच्चे मन से बप्पा की पूजा करने से और व्रत रखने से जीवन में आने वाली हर परेशानी दूर होती है और शुभ फलों की प्राप्ति होती है। साथ ही पूजा करने के साथ बप्पा के नामों और मंत्रों का जाप करने से घर-परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है और मन की हर मुराद पूरी होती है। तो आइए जानते हैं कि प्रद्युम्न गणेश चतुर्थी क्यों मनाई जाती है और इसकी कथा क्या है 

प्रद्युम्न चतुर्थी व्रत कथा


पौराणिक कथा के अनुसार, द्वापर युग में जब भगवान श्रीकृष्ण और देवी रुक्मणी के घर पुत्र का जन्म हुआ, तो उसका नाम प्रद्युम्न रखा गया। प्रद्युम्न वास्तव में कामदेव के अवतार थे। उनके जन्म के छठे दिन ही शंबरासुर नाम का एक भयानक असुर उन्हें पालने से चुराकर ले गया। शंबरासुर को ज्ञात था कि उसका वध केवल रुक्मणी का पुत्र ही कर सकता है। इसलिए उसने शिशु प्रद्युम्न को गहरे समुद्र में फेंक दिया। समुद्र में एक बड़ी मछली ने प्रद्युम्न को निगल लिया। संयोगवश, वह मछली मछुआरों द्वारा पकड़ी गई और शंबरासुर की रसोई में पहुँच गई। जब रसोई के रसोइयों ने मछली को काटा, तो उसके पेट से एक दिव्य और सुंदर बालक निकला। शंबरासुर की दासी (जो वास्तव में कामदेव की पत्नी रति का पुनर्जन्म थीं और 'मायावती' नाम से रह रही थीं) ने उस बालक को पहचान लिया और चुपचाप उसका पालन-पोषण करने लगीं।

संकट और व्रत का संकल्प


जब प्रद्युम्न बड़े हुए, तब मायावती ने उन्हें उनके असली माता-पिता, शंबरासुर के छल और उनके वास्तविक स्वरूप (कामदेव) के बारे में बताया। प्रद्युम्न ने शंबरासुर का वध करने का निश्चय किया, लेकिन शंबरासुर अत्यंत मायावी और शक्तिशाली था। उसे हराना और उसके चंगुल से मुक्त होकर वापस द्वारका पहुँचना एक अत्यंत कठिन कार्य था।इस महासंकट से उबरने और विजय प्राप्त करने के लिए, प्रद्युम्न ने भगवान गणेश की शरण ली। उन्होंने नारद मुनी के परामर्श पर चतुर्थी तिथि का कठिन व्रत रखने का संकल्प लिया।

 व्रत का प्रभाव और विजय


प्रद्युम्न ने पूरे विधि-विधान से गणेश चतुर्थी का व्रत किया, निराहार रहकर गणपति की पूजा की और "ॐ गं गणपतये नमः" मंत्र का जाप किया। भगवान  गणेश प्रद्युम्न की भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने प्रद्युम्न को अमोघ शक्तियाँ, बुद्धि और सभी प्रकार की मायावी विद्याओं को काटने का वरदान दिया।गणपति जी के वरदान और शक्तियों के बल पर प्रद्युम्न ने शंबरासुर को युद्ध के लिए ललकारा। दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। शंबरासुर ने अपनी सभी मायावी शक्तियों का प्रयोग किया, लेकिन प्रद्युम्न पर गणपति की कृपा थी। अंततः प्रद्युम्न ने शंबरासुर का वध कर दिया।

शंबरासुर का वध करने के बाद, प्रद्युम्न अपनी पत्नी मायावती (रति) के साथ द्वारका लौट आए। अपने खोए हुए पुत्र को सकुशल और विजयी रूप में वापस पाकर माता रुक्मणी और भगवान श्रीकृष्ण की प्रसन्नता का ठिकाना नहीं रहा। पूरे द्वारका में उत्सव मनाया गया। चूंकि इस व्रत के प्रभाव से प्रद्युम्न ने असमय आए संकट को पार किया और विजय प्राप्त की, इसीलिए इस चतुर्थी को प्रद्युम्न चतुर्थी या संकट नाशक चतुर्थी कहा जाता है। माताएं इस व्रत को अपनी संतान की लंबी आयु, अच्छी सेहत और उनकी प्रगति के लिए करती हैं।मान्यता है कि जो भी व्यक्ति जीवन के घोर संकटों से घिरा हो, यदि वह इस दिन निष्ठापूर्वक व्रत रखकर गणेश जी की पूजा करता है, तो उसके सभी विघ्न दूर हो जाते हैं।

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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)

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