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Mahakal Bhairav Stotra In Hindi: काल भैरव की कृपा पाने के लिए करें इस स्तत्रोत का पाठ

जीवांजलीPublished by:
राघवेंद्र तिवारी
सार

Mahakal Bhairav Stotra In Hindi: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बाबा काल भैरव को प्रसन्न करने के लिए खास दिन आता है। बता दें कि काल भैरव को प्रसन्न करने के लिए भैरव स्तोत्र का पाठ करना बहुत ही जरूरी है।

Mahakal Bhairav Stotra In Hindi
Mahakal Bhairav Stotra In Hindi: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बाबा काल भैरव को प्रसन्न करने के लिए खास दिन आता है। बता दें कि काल भैरव को प्रसन्न करने के लिए भैरव स्तोत्र का पाठ करना बहुत ही जरूरी है। मान्यता है कि जो जातक काल भैरव की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करने से सारी परेशानियों से मुक्ति मिल जाती हैं। इसके साथ ही बाबा काल भैरव को प्रसन्न करने के लिए काल भैरव स्तोत्र का भी पाठ करना बहुत ही जरूरी है। इसलिए शुद्ध उच्चारण पर ध्यान दिया जाता है। बता दें कि गलत उच्चारण करने से मंत्र जाप या स्तोत्र का पाठ जरूर करने चाहिए। मान्यता है कि जो जातक इस स्तोत्र का पाठ करते हैं उन्हें भगवान महादेव की कृपा भी प्राप्ति होती है। इसके साथ ही महादेव प्रसन्न भी होते हैं। इसके साथ ही हर दुख और संकट से मुक्ति मिल जाती है। तो आइए काल भैरव स्तोत्र के बारे में विस्तार से जानते हैं।

महाकाल भैरव स्तोत्र

ओम महाकाल भैरवाय नम:

जलद् पटलनीलं दीप्यमानोग्रकेशं, त्रिशिख डमरूहस्तं चन्द्रलेखावतंसं!
विमल वृष निरुढं चित्रशार्दूलवास:, विजयमनिशमीडे विक्रमोद्दण्डचण्डम्!!

सबल बल विघातं क्षेपाळैक पालम्, बिकट कटि कराळं ह्यट्टहासं विशाळम्!
करगतकरबालं नागयज्ञोपवीतं, भज जन शिवरूपं भैरवं भूतनाथम्!!

भैरव स्तोत्र

यं यं यं यक्ष रूपं दशदिशिवदनं भूमिकम्पायमानं।
सं सं सं संहारमूर्ती शुभ मुकुट जटाशेखरम् चन्द्रबिम्बम्।।
दं दं दं दीर्घकायं विकृतनख मुखं चौर्ध्वरोयं करालं।
पं पं पं पापनाशं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालम्।।1

रं रं रं रक्तवर्ण कटक कटितनुं तीक्ष्णदंष्ट्राविशालम्।
घं घं घं घोर घोष घ घ घ घ घर्घरा घोर नादम्।।
कं कं कं काल रूपं घगघग घगितं ज्वालितं कामदेहं।
दं दं दं दिव्यदेहं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालम्।।2

लं लं लं लम्बदंतं ल ल ल ल लुलितं दीर्घ जिह्वकरालं।
धूं धूं धूं धूम्र वर्ण स्फुट विकृत मुखं मासुरं भीमरूपम्।।
रूं रूं रूं रुण्डमालं रूधिरमय मुखं ताम्रनेत्रं विशालम्।
नं नं नं नग्नरूपं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालम्।।3

वं वं वं वायुवेगम प्रलय परिमितं ब्रह्मरूपं स्वरूपम्।
खं खं खं खड्ग हस्तं त्रिभुवननिलयं भास्करम् भीमरूपम्।।
चं चं चं चालयन्तं चलचल चलितं चालितं भूत चक्रम्।
मं मं मं मायाकायं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालम्।।4।।

खं खं खं खड्गभेदं विषममृतमयं काल कालांधकारम्।
क्षि क्षि क्षि क्षिप्रवेग दहदह दहन नेत्र संदिप्यमानम्।।
हूं हूं हूं हूंकार शब्दं प्रकटित गहनगर्जित भूमिकम्पं।
बं बं बं बाललील प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालम्।।5।।

ओम तीक्ष्णदंष्ट्र महाकाय कल्पांत दहन प्रभो!
भैरवाय नमस्तुभ्यं अनुज्ञां दातु महर्षि!!

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