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Maa kushmanda Stotra: नवरात्रि के चौथे दिन करें मां कुष्मांडा के कवच और स्तोत्र का पाठ, जीवन रहेगा खुशहाल

जीवांजलिPublished by:
राघवेंद्र तिवारी
सार

Chaitra Navratri Maa kushmanda Stotra: हिंदू धर्म में चैत्र नवरात्रि का बहुत ही ज्यादा महत्व है। चैत्र नवरात्रि के 9 दिनों में मां दुर्गा के 9 अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है। बता दें कि हर दिन अलग-अलग मांओं की पूजा करने सें देवी दुर्गा मां प्रसन्न हो जाती हैं।

Maa kushmanda Stotra
Chaitra Navratri Maa kushmanda Stotra: हिंदू धर्म में चैत्र नवरात्रि का बहुत ही ज्यादा महत्व है। चैत्र नवरात्रि के 9 दिनों में मां दुर्गा के 9 अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है। बता दें कि हर दिन अलग-अलग मांओं की पूजा करने सें देवी दुर्गा मां प्रसन्न हो जाती हैं। इसके साथ ही जीवन के हर दुख-दर्द को दूर करती हैं। चैत्र नवरात्रि का चौथा दिन मां कुष्मांडा को समर्पित है। यदि आप मां कुष्मांडा को प्रसन्न करना चाहते हैं तो उनके स्त्रोत और कवच पढ़कर कर सकते हैं। तो आज इस खबर में मां कुष्मांडा की स्त्रोत और कवच के बारे में विस्तार से जानेंगे।

मां कुष्मांडा का स्तोत्र (Maa kushmanda Stotra)

पहला स्तोत्र

वन्दे वांछित कामर्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
सिंहरूढा अष्टभुजा कुष्माण्डा यशस्वनीम्॥

भास्वर भानु निभां अनाहत स्थितां चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्राम्।
कमण्डलु चाप, बाण, पदमसुधाकलश चक्र गदा जपवटीधराम्॥

पटाम्बर परिधानां कमनीया कृदुहगस्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर हार केयूर किंकिण रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥

प्रफुल्ल वदनां नारू चिकुकां कांत कपोलां तुंग कूचाम्।
कोलांगी स्मेरमुखीं क्षीणकटि निम्ननाभि नितम्बनीम् ॥

दूसरा स्तोत्र

दुर्गतिनाशिनी त्वंहि दारिद्रादि विनाशिनीम्।
जयंदा धनदां कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥

जगन्माता जगतकत्री जगदाधार रूपणीम्।
चराचरेश्वरी कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥

त्रैलोक्यसुंदरी त्वंहि दु:ख शोक निवारिणाम्।
परमानंदमयी कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥

मां कुष्मांडा का कवच

हंसरै में शिर पातु कूष्माण्डे भवनाशिनीम्।
हसलकरीं नेत्रेच, हसरौश्च ललाटकम्॥

कौमारी पातु सर्वगात्रे, वाराही उत्तरे तथा,
पूर्वे पातु वैष्णवी इन्द्राणी दक्षिणे मम।
दिग्विदिक्षु सर्वत्रेव कूं बीजम् सर्वदावतु॥

मां कुष्मांडा का ध्यान

वन्दे वाञ्छित कामार्थे चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्विनीम्॥

भास्वर भानु निभाम् अनाहत स्थिताम् चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्राम्।
कमण्डलु, चाप, बाण, पद्म, सुधाकलश, चक्र, गदा, जपवटीधराम्॥

पटाम्बर परिधानां कमनीयां मृदुहास्या नानालङ्कार भूषिताम्।
मञ्जीर, हार, केयूर, किङ्किणि, रत्नकुण्डल, मण्डिताम्॥

प्रफुल्ल वदनांचारू चिबुकां कान्त कपोलाम् तुगम् कुचाम्।
कोमलाङ्गी स्मेरमुखी श्रीकंटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥

मां कुष्मांडा की आरती

कूष्माण्डा जय जग सुखदानी। 
मुझ पर दया करो महारानी॥

पिङ्गला ज्वालामुखी निराली। 
शाकम्बरी माँ भोली भाली॥

लाखों नाम निराले तेरे। 
भक्त कई मतवाले तेरे॥

भीमा पर्वत पर है डेरा। 
स्वीकारो प्रणाम ये मेरा॥

सबकी सुनती हो जगदम्बे। 
सुख पहुँचती हो माँ अम्बे॥

तेरे दर्शन का मैं प्यासा। 
पूर्ण कर दो मेरी आशा॥

माँ के मन में ममता भारी। 
क्यों ना सुनेगी अरज हमारी॥

तेरे दर पर किया है डेरा। 
दूर करो माँ संकट मेरा॥

मेरे कारज पूरे कर दो। 
मेरे तुम भंडारे भर दो॥

तेरा दास तुझे ही ध्याए। 
भक्त तेरे दर शीश झुकाए॥

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