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Ramayana Story: रामायण में खर-दूषण और सुबाहु कौन थे ? जानिए

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
कोमल शर्मा
सार

Khar Dooshan Aur Shubhu Kaun The :  खरदूषण और सुबाहु रामायण काल के अत्यंत शक्तिशाली और भयानक राक्षस थे, जिनका संबंध त्रेतायुग में भगवान श्री राम के अवतार काल से है।

Khar Dooshan Aur Shubhu Kaun The :
Khar Dooshan Aur Shubhu Kaun The : खरदूषण और सुबाहु रामायण काल के अत्यंत शक्तिशाली और भयानक राक्षस थे, जिनका संबंध त्रेतायुग में भगवान श्री राम के अवतार काल से है। ये दोनों ही राक्षस राज रावण के खेमे से जुड़े थे और उनके अत्याचारों से ऋषि-मुनि तथा साधारण जनमानस त्रस्त था। रामायण की कथा में इन दोनों का वध भगवान राम के हाथों हुआ, जो इस बात का प्रतीक है कि अधर्म और आतंक का अंत निश्चित होता है।

सुबाहु कौन था ?

सुबाहु राक्षस राज रावण का अनुयायी और प्रसिद्ध राक्षसी ताड़का का पुत्र था। उसका भाई मारीच था। सुबाहु का मुख्य कार्य ऋषि-मुनियों के पवित्र कार्यों में बाधा डालना और धर्म का विनाश करना था।

विश्वामित्र का यज्ञ और सुबाहु का आतंक

महर्षि विश्वामित्र जब सिद्धाश्रम में लोक कल्याण और देवताओं की संतुष्टि के लिए महायज्ञ कर रहे थे, तब सुबाहु और मारीच अपनी मायावी सेना के साथ वहां पहुंच जाते थे। वे यज्ञ वेदी पर रक्त, मांस और मदिरा जैसी अपवित्र चीजें आसमान से बरसाते थे, जिससे यज्ञ खंडित हो जाता था।ऋषि विश्वामित्र अत्यंत शक्तिशाली थे और वे चाहते तो अपने श्राप से उन्हें भस्म कर सकते थे, लेकिन यज्ञ के नियमों के अनुसार वे क्रोध नहीं कर सकते थे और न ही श्राप दे सकते थे। इसलिए, वे इस आतंक को समाप्त करने के लिए अयोध्या के राजा दशरथ के पास गए और उनके दो राजकुमारों श्री राम और लक्ष्मण को अपने साथ वन ले आए।
 सुबाहु का वध

जब महर्षि विश्वामित्र ने पुनः यज्ञ प्रारंभ किया, तो सुबाहु और मारीच अपनी राक्षसी सेना के साथ आकाश में काले बादलों की तरह छा गए और यज्ञ शाला पर अपवित्र वस्तुओं की वर्षा करने लगे। श्री राम ने सबसे पहले मानवास्त्र का प्रयोग किया, जिससे मारीच बिना मरे ही सौ योजन दूर समुद्र में जाकर गिरा इसके बाद श्री राम ने आग्नेयास्त्र का संधान किया और उसे सुबाहु पर छोड़ दिया। यह बाण सीधे सुबाहु के हृदय को चीरता हुआ निकल गया, जिससे वह लहूलुहान होकर धरती पर गिर पड़ा और उसके प्राण पखेरू उड़ गए। लक्ष्मण जी ने भी उसकी बची हुई सेना का संहार कर दिया। सुबाहु के वध से वन के ऋषियों को भय से मुक्ति मिली।

खर-दूषण कौन थे 

"खर" और "दूषण" वास्तव में दो अलग-अलग राक्षस भाई थे, लेकिन रामायण में इनका नाम हमेशा एक साथ 'खर-दूषण' के रूप में लिया जाता है क्योंकि ये दोनों मिलकर शासन और युद्ध करते थे। ये रिश्ते में लंकापति रावण के ममेरे भाई लगते थे और रावण की बहन शूर्पणखा के बेहद करीबी थे।रावण ने खर और दूषण को भारत के दक्षिण में स्थित दंडकारण्य  के 'जनस्थान' नामक क्षेत्र का गवर्नर या शासक नियुक्त किया था। उनके साथ १४,००० (चौदह हजार) भयानक राक्षसों की एक विशाल सेना रहती थी। इनका काम उस क्षेत्र में रावण के वर्चस्व को बनाए रखना और वहां रहने वाले ऋषियों को प्रताड़ित करना था।

शूर्पणखा का अपमान और युद्ध की शुरुआत

जब भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण अपने १४ वर्ष के वनवास के दौरान पंचवटी में कुटिया बनाकर रह रहे थे, तब रावण की बहन शूर्पणखा वहां आई। वह श्री राम और लक्ष्मण के सौंदर्य पर मोहित हो गई और उनसे विवाह का प्रस्ताव रखा। जब उसने माता सीता को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की, तो लक्ष्मण जी ने क्रोध में आकर उसके नाक और कान काट दिए।रोती-बिलखती शूर्पणखा सीधे अपने भाई खर और दूषण के पास पहुंची। अपनी बहन की यह दुर्दशा देख कर दोनों भाई क्रोध से आगबबूला हो गए।

 १४,००० राक्षसों की सेना और अद्भुत युद्ध

खर और दूषण ने अपनी चौदह हजार राक्षसों की चतुरंगिणी सेना को तैयार किया और श्री राम पर आक्रमण कर दिया। यह युद्ध रामायण के सबसे भीषण युद्धों में से एक माना जाता है।श्री राम ने लक्ष्मण जी को माता सीता की रक्षा के लिए एक सुरक्षित गुफा में रहने को कहा और खुद अकेले ही उस विशाल राक्षसी सेना का सामना करने के लिए खड़े हो गए। खर और दूषण अत्यंत मायावी थे। वे आकाश से पत्थरों, गदाओं और त्रिशूलों की वर्षा कर रहे थे। लेकिन श्री राम ने अपने तीखे बाणों से उनकी पूरी सेना को कुछ ही घंटों में समाप्त कर दिया।

खर और दूषण का अंत

सेना के नष्ट हो जाने पर दूषण एक विशाल परिघ (लोहे की गदा) लेकर श्री राम की ओर झपटा। श्री राम ने दो तीखे बाणों से उसकी दोनों भुजाएं काट दीं और अगले ही क्षण एक घातक बाण से उसका वध कर दिया।अपने भाई दूषण की मृत्यु देखकर खर का क्रोध चरम पर पहुंच गया। उसने श्री राम के धनुष की प्रत्यंचा काट दी और उन पर कई प्रहार किए। तब भगवान राम ने दूसरा धनुष संभाला और वैष्णवास्त्र का प्रयोग किया। यह दिव्य बाण खर के रथ को तोड़ते हुए उसके सीने के पार निकल गया। खर के गिरते ही जनस्थान से राक्षसों का आतंक सदा के लिए समाप्त हो गया।

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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)
 

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