Dahi Handi : पूरे देश में जन्माष्टमी के अगले दिन दही-हांडी का त्योहार मनाया जाता है। जहाँ जन्माष्टमी भगवान कृष्ण के जन्म का उत्सव है वहीं दही-हांडी उनके बचपन की शरारतों को दिखाने वाला त्योहार है। हालाँकि दही-हांडी मूल रूप से मुख्य रूप से महाराष्ट्र और गुजरात में मनाया जाता था लेकिन अब इसे पूरे देश में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। आइए इस त्योहार के कुछ खास पहलुओं को जानें
दही-हांडी की परंपरा
भगवान कृष्ण का जन्म भाद्रपद महीने की अष्टमी को आधी रात को हुआ था। भगवान के जन्म का जश्न मनाने के लिए, युवा और बच्चे जिन्हें 'गोविंदा' कहा जाता है जन्माष्टमी के अगले दिन दही-हांडी कार्यक्रम आयोजित करते हैं। पूरे देश में सड़कों के चौराहों पर दही और मक्खन से भरे मिट्टी के बर्तन लटकाए जाते हैं फिर गोविंदा इंसानी पिरामिड बनाते हैं और इन बर्तनों को तोड़ने के लिए एक-दूसरे के ऊपर चढ़ते हैं।
दही-हांडी का इतिहास
भगवान कृष्ण का जन्म माता देवकी की कोख से भाद्रपद महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। कंस ने देवकी और उनके पति वासुदेव को कैद कर लिया था। एक आकाशवाणी ने पहले ही भविष्यवाणी कर दी थी कि देवकी और वासुदेव की आठवीं संतान कंस की मृत्यु का कारण बनेगी। नतीजतन, कंस देवकी की संतानों को एक-एक करके मार रहा था। जब आठवीं संतान कृष्ण का जन्म हुआ तो वासुदेव उन्हें सुरक्षित रूप से गोकुल ले जाने में सफल रहे इसके साथ ही यशोदा और नंद भगवान कृष्ण की देखरेख करने में सफल रहे । यहीं से कृष्ण की बचपन की लीलाएँ शुरू हुईं।
'माखन चोर' क्यों कहा जाता था
बचपन में भगवान कृष्ण को दही और मक्खन बहुत पसंद था। वे अक्सर गोपियों के बर्तनों से मक्खन चुराकर खाते थे। उनकी इन हरकतों से परेशान होकर गोपियाँ अक्सर माता यशोदा से उनकी शिकायत करती थीं। माता यशोदा अपने कान्हा को समझाने की कोशिश करती थीं लेकिन उन पर इसका कोई असर नहीं होता था।
मटकियां फोड़ने का सिलसिला शुरू हुआ
कन्हैया से अपना दही और मक्खन बचाने के लिए, गोपियां अपनी मटकियां और बर्तन काफी ऊंचाई पर लटका देती थीं। लेकिन कान्हा चालाकी से अपने दोस्तों के कंधों पर चढ़कर मटकियों से दही और मक्खन चुरा लेते थे। अक्सरअपनी शरारतों में वे दही से भरी मटकियां फोड़ भी देते थे। भगवान कृष्ण की बचपन की इन्हीं शरारतों की याद में 'दही-हांडी' का त्योहार मनाया जाता है।
दही-हांडी त्योहार का महत्व
जन्माष्टमी के दौरान दही-हांडी का खास महत्व है। यह त्योहार भगवान कृष्ण की बचपन की लीलाओं को दिखाने के लिए मनाया जाता है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, मटकी फोड़ने का काम जो मक्खन चुराने की घटनाओं की याद दिलाता है घर के दुखों को दूर करता है और खुशियां लाता है। बचपन में भगवान कृष्ण घरों से दही और मक्खन चुराते थे और गोपियों की मटकियां भी फोड़ देते थे। इससे परेशान होकर गोपियां मक्खन और दही की मटकियां ऊंचाई पर लटकाने लगीं। फिर भी कान्हा इतने शरारती थे कि अपने दोस्तों की मदद से वे मटकियां फोड़ देते और मक्खन-दही खा लेते थे। दही-हांडी त्योहार की शुरुआत भगवान कृष्ण की बचपन की इन्हीं शरारतों की याद में हुई थी।
दही-हांडी त्योहार क्यों मनाया जाता है?
दही-हांडी मनाने की परंपरा द्वापर युग से चली आ रही है। यह त्योहार भगवान कृष्ण की बचपन की लीलाओं के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। कान्हा को दही, दूध और मक्खन बहुत पसंद था। वे और उनके दोस्त पड़ोस से मक्खन चुराकर खाते थे जिससे उन्हें 'माखन चोर' का नाम मिला। मक्खन चुराने की इस आदत से तंग आकर गोपियां अपना दही और मक्खन काफी ऊंचाई पर लटकाने लगीं। लेकिन कृष्ण ने गोपियों की इस कोशिश को भी नाकाम कर दिया। अपने दोस्तों के साथ मिलकर उन्होंने मक्खन चुराने के लिए इंसानी पिरामिड बनाया। इसीलिए तब से दही-हांडी का त्योहार मनाया जा रहा है। भगवान कृष्ण के बचपन की ये शरारतें बहुत मशहूर हैं और दही-हांडी का त्योहार इन्हीं शरारतों की याद में मनाया जाता है।
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(Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।)