हिंदू धर्म में कालाष्टमी का पर्व भगवान शिव के रौद्र रूप काल भैरव को समर्पित एक अत्यंत महत्वपूर्ण और पवित्र दिन माना जाता है। प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व भक्तों के लिए संकटमोचन और भय नाशक भगवान भैरव की आराधना का विशेष अवसर होता है। कालाष्टमी के दिन व्रत, पूजा और मंत्र जाप करने से जीवन की सभी बाधाएं दूर होती हैं, नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। आइए जानते हैं कि कब है कालाष्टमी।
कब शुरू होगी अष्टमी तिथि?
विशेष संयोग
धनिष्ठा नक्षत्र 20 मई को सुबह 8:12 बजे तक रहेंगे। इसके बाद शतभिषा नक्षत्र शुरू होंगे। धार्मिक कार्यों के लिए ये नक्षत्र शुभ माने जाते हैं। इस दिन सिद्ध योग और शिववास योग का संयोग होता है, जो पूरा और व्रत के लिए अधिक शुभ माना जाता है। सिद्ध योग में काल भैरव की पूजा से कार्यों में सफलता मिलती है। वहीं, शिववास योग में पूजा से दोगुना फल मिलता है।
कालाष्टमी का धार्मिक महत्व
कालाष्टमी को काला अष्टमी या भैरव अष्टमी भी कहा जाता है। भगवान शिव के काल भैरव स्वरूप की उपासना का दिन है। मान्यता है कि भगवान शिव ने ब्रह्मा, विष्णु और महेश के बीच श्रेष्ठता के विवाद के दौरान ब्रह्मा के अहंकार को नष्ट करने के लिए अपने रौद्र रूप काल भैरव को प्रकट किया था। काल भैरव को समय का देवता और संकटों का नाश करने वाला माना जाता है।
कालाष्टमी का सबसे महत्वपूर्ण रूप कालभैरव जयंती है, जो उत्तर भारतीय पूर्णिमांत पंचांग के अनुसार मार्गशीर्ष मास और दक्षिण भारतीय अमांत पंचांग के अनुसार कार्तिक मास में मनाई जाती है। यह वह दिन है, जब भगवान शिव काल भैरव के रूप में प्रकट हुए थे। मान्यता है कि काल भैरव की पूजा से भक्तों को भय, शत्रु बाधा, और नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति मिलती है। इस दिन व्रत रखने और मंत्र जाप करने से जीवन में सुख-समृद्धि और सुरक्षा प्राप्त होती है। भक्त प्रायः काल भैरव मंदिरों में जाकर दीपदान, तेल अभिषेक और विशेष प्रसाद अर्पित करते हैं।
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