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Jivitputrika Vrat 2025: जीवत्पुत्रिका व्रत के क्या हैं रीति-रिवाज? जानें कैसे होता है अनुष्ठान

JeevanjaliPublished by:
नीरज पटेल
सार

Jivitputrika Vrat Niyam: जीवत्पुत्रिका व्रत के समय संतान सुख और बच्चों की लंबी आयु के लिए माता का ध्यान विशेष रूप से किया जाता है। जीवत्पुत्रिका व्रत मातृत्व और संतानों की रक्षा का प्रतीक है। 

जीवत्पुत्रिका व्रत के क्या हैं रीति-रिवाज? जानें कैसे होता है अनुष्ठान
Jivitputrika Vrat 2025 Niyam and Importance: हिन्दू धर्म में जीवत्पुत्रिका व्रत (जिसे जीवित्पुत्रिका व्रत, जीवित्पुत्रिका पर्व या बोलचाल में जिउतिया भी कहा जाता है) एक खास व्रत है जो मुख्यतः बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और नेपाल के कुछ हिस्सों में महिलाएं करती हैं। यह व्रत संतान की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और मंगलमय जीवन के लिए रखा जाता है। यह व्रत केवल संतानवती स्त्रियां करती हैं। मान्यता है कि जो स्त्री इस व्रत को श्रद्धा और नियम से करती है, उसके बच्चों की आयु लंबी होती है और उन्हें कभी संकट का सामना नहीं करना पड़ता। यह व्रत खासकर मातृत्व भाव, त्याग और ममता का प्रतीक माना जाता है।

जीवत्पुत्रिका व्रत की रीति-रिवाज

नहाय-खाय (पहला दिन)

व्रत शुरू होने से एक दिन पहले महिलाएं नदी या तालाब में स्नान करती हैं। उस दिन शुद्ध-सात्विक भोजन (अरवा चावल, दाल, घी आदि) किया जाता है।

खर व्रत / उपवास (दूसरा दिन)

व्रत का मुख्य दिन यही होता है। इस दिन महिलाएं निर्जला उपवास करती हैं – न तो अन्न खाती हैं, न पानी पीती हैं। व्रत के दौरान महिलाएं नदी किनारे या घर पर मिट्टी से बने जीवत्पुत्रिका माता, जीउतिया माता और पुत्रजीविका देवी की पूजा करती हैं। कथा श्रवण किया जाता है जिसमें “जीउतिया व्रत कथा” सुनाई जाती है (जिसमें भेड़िया और सियारिन की कथा विशेष रूप से कही जाती है)।

पारण (तीसरा दिन)

व्रत के अगले दिन सूर्योदय के बाद व्रत का पारण किया जाता है। महिलाएं स्नान कर पूजन करती हैं और फिर फलाहार, भोजन और जल ग्रहण करती हैं। व्रत पूरा होने के बाद अपने बच्चों को आशीर्वाद देती हैं और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।

विशेष नियम

यह व्रत तीन दिन का होता है। दूसरे दिन निर्जला उपवास सबसे कठिन माना जाता है। इस दौरान महिलाएं लाल या पीली साड़ी पहनकर पूजा करती हैं। व्रत के समय संतान सुख और बच्चों की लंबी आयु के लिए माता का ध्यान विशेष रूप से किया जाता है। जीवत्पुत्रिका व्रत मातृत्व और संतानों की रक्षा का प्रतीक है। महिलाएं संपूर्ण त्याग और भक्ति से इसे करती हैं ताकि उनके बच्चों पर कभी कोई संकट न आए।

जीवत्पुत्रिका व्रत कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, बहुत समय पहले एक सियारिन और एक भेड़िन (भेड़िया) दोनों ही गर्भवती थीं। संयोगवश उन्होंने एक ही दिन बच्चों को जन्म दिया। भेड़िन के बच्चे अधिक शक्तिशाली थे और भोजन भी अधिक पाते थे, लेकिन सियारिन के बच्चे कमजोर और भूखे रहते थे। धीरे-धीरे भेड़िन के बच्चे पलने लगे, लेकिन सियारिन के बच्चे भूख-प्यास से मर गए। सियारिन बहुत दुखी हुई। वह सोचने लगी कि “मेरे बच्चों की मृत्यु क्यों हुई और भेड़िन के बच्चे कैसे जीवित रह गए?”

तपस्या और आशीर्वाद

सियारिन ने कठोर तपस्या की और देवताओं से प्रार्थना की कि उसकी आने वाली संतानें जीवित रहें। देवताओं ने कहा कि “अगर माताएं अपने बच्चों की दीर्घायु और रक्षा के लिए व्रत करेंगी, तो उनकी संतानें जीवित रहेंगी।” इसी के बाद से स्त्रियां जीवत्पुत्रिका व्रत करने लगीं, ताकि उनके बच्चे लंबी आयु प्राप्त करें और किसी भी संकट से सुरक्षित रहें। यह व्रत मातृत्व की शक्ति और त्याग का प्रतीक है। स्त्रियां अपने बच्चों के जीवन के लिए निर्जला उपवास करती हैं। इससे यह विश्वास है कि बच्चों का जीवन लंबा और सुखमय होगा।

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