Jivitputrika Vrat Niyam: जीवत्पुत्रिका व्रत मातृभाव, त्याग और संतान के प्रति समर्पण का प्रतीक है। यह व्रत कठिन होने के बावजूद माताएं पूरी श्रद्धा और आस्था से इसे निभाती हैं। माना जाता है कि इस व्रत के प्रभाव से संतान की रक्षा होती है, उसके जीवन में कोई बाधा नहीं आती है।
Jivitputrika Vrat 2025 Importance: सनातन परंपरा में महिलाओं के लिए कई ऐसे व्रत-उपवास बताए गए हैं जिनका सीधा संबंध संतान की रक्षा और सुख-समृद्धि से है। इन्हीं में से एक है जीवत्पुत्रिका व्रत, जिसे प्रायः जिउतिया या जीवित्पुत्रिका भी कहा जाता है। यह व्रत मुख्य रूप से बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और नेपाल क्षेत्र में बड़ी श्रद्धा और आस्था से किया जाता है। इसे मातृशक्ति अपने बच्चों की लंबी आयु और उनके स्वस्थ जीवन के लिए करती हैं।
मान्यता है कि यह व्रत माताओं द्वारा अपने संतान की रक्षा हेतु किया जाता है। इस व्रत को करने से संतान पर आने वाला हर संकट टल जाता है। बच्चों की दीर्घायु और उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। माता-पिता के प्रेम और संतान के प्रति समर्पण की भावना इस व्रत से प्रकट होती है।
व्रत की तैयारी
व्रत से एक दिन पहले यानी अष्टमी तिथि को माताएं विशेष पकवान बनाती हैं, जिसे नहाय-खाय कहा जाता है।
इस दिन स्नान कर सात्विक भोजन ग्रहण कर व्रत का संकल्प लिया जाता है।
अगले दिन यानी नवमी तिथि को निर्जला उपवास रखा जाता है।
व्रत और पूजा विधि
निर्जला उपवास
व्रती स्त्रियां पूरे दिन जल तक का त्याग करती हैं। यह व्रत अत्यंत कठिन माना जाता है और माताएं इसे संतान की भलाई के लिए पूरे विश्वास के साथ निभाती हैं।
पूजा स्थल की तैयारी
घर के पूजाघर या स्वच्छ स्थान को गंगाजल से पवित्र करें।
मिट्टी से देवी माताओं की प्रतिमा या चित्र बनाए जाते हैं।
सूर्य, चंद्रमा, नदी और नाग की भी पूजा की जाती है।
दीप प्रज्वलित कर माता जीउतिया की आराधना करें।
हल्दी, रोली, सिंदूर, सुपारी, फूल और धूप-दीप अर्पित करें।
कथा सुनना और सुनाना अनिवार्य है। जीउतिया व्रत कथा में राजा जीमूतवाहन की कथा प्रमुख है।
रात्रि जागरण कर भजन-कीर्तन करना शुभ माना जाता है।
व्रत का पारण
अगले दिन सुबह सूर्योदय के बाद व्रती स्नान करती हैं।
देवी-देवताओं को अर्घ्य देकर व्रत का समापन किया जाता है।
इसके बाद फलाहार और प्रसाद के रूप में घर के बने पकवान ग्रहण किए जाते हैं।
ब्राह्मणों और सुहागिन स्त्रियों को दान देने की परंपरा भी है।
विशेष नियम
व्रत के दौरान किसी प्रकार का अनाज, जल या फल नहीं लिया जाता।
झूठ, क्रोध और अपशब्दों से बचना चाहिए।
पूजा करते समय संतान के मंगल और लंबी आयु की मनोकामना करनी चाहिए।
कथा श्रवण किए बिना व्रत अधूरा माना जाता है।
जानें क्या है मान्यता
जीवत्पुत्रिका व्रत मातृभाव, त्याग और संतान के प्रति समर्पण का प्रतीक है। यह व्रत कठिन होने के बावजूद माताएं पूरी श्रद्धा और आस्था से इसे निभाती हैं। माना जाता है कि इस व्रत के प्रभाव से संतान की रक्षा होती है, उसके जीवन में कोई बाधा नहीं आती और उसका जीवन स्वस्थ और दीर्घायु होता है। यही कारण है कि यह व्रत आज भी समाज में अपार आस्था और विश्वास के साथ मनाया जाता है।